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वर्ष 1997 से लागू करें पूर्व सैनिकों को वरिष्ठता न देने का फैसला : संघ
Updated Sun, 15 Jul 2018 11:24 PM IST
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हमीरपुर। प्रदेश विज्ञान अध्यापक संघ ने पूर्व सैनिकों को वरिष्ठता न देने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर प्रदेश सरकार की ओर से लिए फैसले को लागू करने पर प्रतिक्रिया देते हुए आग्रह किया कि इसे वर्ष 2008 की बजाय एक जुलाई 1997 से लागू किया जाए। संघ के कार्यकारी प्रदेशाध्यक्ष मनोज पाल परिहार ने कहा कि अभी 22 प्रधानाचार्य, 10 मुख्याध्यापक और छह उपनिदेशकों की ही सूची निकली है। जबकि 28 अक्तूबर 2013 को मुख्याध्यापकों की पदोन्नत सूची में 262 में से 79 पूर्व सैनिक थे। इस प्रकार 2008 में लागू की गई अधिसूचना के तहत करीब 200 से ज्यादा पूर्व सैनिक प्रभावित होंगे। सरकार और विभाग पूरी पारदर्शिता और गंभीरता से इसे एक जुलाई 1997 से लागू करे।
संघ ने सरकार के फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि वरिष्ठता सूचियों की समीक्षा कर तेजी से पदोन्नतियां की जाएं। जिससे वंचित अध्यापकों को न्याय मिल सके। इस मौके पर संघ के प्रदेशाध्यक्ष अजय शर्मा, महासचिव अमृत महाजन, महिला विंग की अध्यक्ष अनुप्रिया, महासचिव शालू परमार, चेयरमैन अशोक चौधरी, रणधीर सिंह, सुरेंद्र कश्यप, प्रवीण सिंह, केवल सिंह, राजकुमार पराशर, जिला प्रधानों में सुखविंद्र सिंह, नरेंद्र ठाकुर, भीम सिंह, दीप गौतम, लच्छी ठाकुर, हरीश गुप्ता, गणेश नेगी, सिकंदर ठाकुर, सतीश जस्पा, नरेश शर्मा, मोहन शर्मा, मुकेश, दीपेश शर्मा, सोनी शर्मा, प्रदेश सचिव सुशील चौहान, राजिंद्र वर्मा सहित अन्य कार्यकारिणी सदस्यों ने सरकार से इस फैसले को 2008 की बजाय 1997 से लागू करने का आग्रह किया है।
बाक्स:
इसलिए साल 1997 से लागू होना चाहिए फैसला
विज्ञान अध्यापक संघ का कहना है कि प्रदेश शिक्षा विभाग के अधिकारी सुरजीत सिंह ठाकुर ने इस मामले में याचिका दायर की थी। 1 जुलाई 1997 को शिमला उच्च न्यायालय में केस दायर किया था। न्यायालय ने 29 दिसंबर 2008 को इस पर फैसला सुनाया। सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले को जायज ठहराया था। इसे साल 1997 से ही लागू किया जाना चाहिए, जैसा जिला न्यायवादी के केस में किया गया।
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संघ ने सरकार के फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि वरिष्ठता सूचियों की समीक्षा कर तेजी से पदोन्नतियां की जाएं। जिससे वंचित अध्यापकों को न्याय मिल सके। इस मौके पर संघ के प्रदेशाध्यक्ष अजय शर्मा, महासचिव अमृत महाजन, महिला विंग की अध्यक्ष अनुप्रिया, महासचिव शालू परमार, चेयरमैन अशोक चौधरी, रणधीर सिंह, सुरेंद्र कश्यप, प्रवीण सिंह, केवल सिंह, राजकुमार पराशर, जिला प्रधानों में सुखविंद्र सिंह, नरेंद्र ठाकुर, भीम सिंह, दीप गौतम, लच्छी ठाकुर, हरीश गुप्ता, गणेश नेगी, सिकंदर ठाकुर, सतीश जस्पा, नरेश शर्मा, मोहन शर्मा, मुकेश, दीपेश शर्मा, सोनी शर्मा, प्रदेश सचिव सुशील चौहान, राजिंद्र वर्मा सहित अन्य कार्यकारिणी सदस्यों ने सरकार से इस फैसले को 2008 की बजाय 1997 से लागू करने का आग्रह किया है।
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इसलिए साल 1997 से लागू होना चाहिए फैसला
विज्ञान अध्यापक संघ का कहना है कि प्रदेश शिक्षा विभाग के अधिकारी सुरजीत सिंह ठाकुर ने इस मामले में याचिका दायर की थी। 1 जुलाई 1997 को शिमला उच्च न्यायालय में केस दायर किया था। न्यायालय ने 29 दिसंबर 2008 को इस पर फैसला सुनाया। सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले को जायज ठहराया था। इसे साल 1997 से ही लागू किया जाना चाहिए, जैसा जिला न्यायवादी के केस में किया गया।
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