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Chamba News: ग्रामीणों के लिए रोजमर्रा की चुनौती बनी सालुई-शार सड़क
Sat, 28 Mar 2026 10:24 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
Updated Sat, 28 Mar 2026 10:24 PM IST
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दो किलोमीटर के बाद थमा निर्माण, 10 गांवों के लोग कर रहे मार्ग का इंतजार
चार किमी सड़क का निर्माण ठप होने से बर्फ, पगडंडी के बीच जीवन के लिए जूझ रहे लोग
संवाद न्यूज एजेंसी
साहो (चंबा)। सालुई से शार तक सड़क केवल कच्ची मिट्टी नहीं, बल्कि 500 ग्रामीणों की रोजमर्रा की चुनौती बन गई है।
दो किलोमीटर तक बनी सड़क ने उम्मीद जगाई लेकिन आगे चार किलोमीटर तक निर्माण कार्य ठप होने से पहाड़ों में फंसे गांवों के लोग सर्दियों में बर्फ और पैदल पगडंडी के बीच अपने जीवन और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए जूझते हैं। यहां सड़क न केवल सुविधा का साधन है, बल्कि संघर्ष और धैर्य की गवाह भी बन गई है।
गुवाड़ी पंचायत के तहत सालुई से शार तक प्रस्तावित छह किलोमीटर सड़क का निर्माण वर्षों से अधूरा है। काम लटकने से मुंगलासन, सकला, डुग, शालेई, लोला, सयोगा, हैला, शाड़ी, साहरी और शार सहित करीब 500 की आबादी आज भी सड़क सुविधा से वंचित है। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण सर्दियों में दो से तीन फीट तक बर्फबारी होती है। ग्रामीणों को घंटों खड़ी चढ़ाई पार कर पैदल घर पहुंचना पड़ता है। आपात स्थिति में गर्भवती महिलाओं और मरीजों को पालकी के सहारे अस्पताल तक ले जाना पड़ता है।
लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता जोगिंद्र कुमार का कहना है कि जितना टेंडर हुआ था उतना सड़क का निर्माण करवाया गया है। इससे आगे की सड़क बनाने के लिए डीपीआर तैयार की जाएगी।
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खेती-बाड़ी पर भी इसका सीधा असर पड़ रहा है। सेब सीजन में बागवान आज भी अपनी फसल खच्चरों के जरिये बाजार तक पहुंचाने पर मजबूर हैं जबकि महिलाएं रोजमर्रा की खाद्य सामग्री सिर पर उठाकर गांव तक लाती हैं। - प्रकाश चंद
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सड़क ही विकास की रेखा है लेकिन उनके गांवों तक यह अब तक नहीं पहुंच पाई। चुनाव के दौरान बड़ी-बड़ी बातें करते है लेकिन बाद में इन गांवों की सुध नहीं ली जाती। - जोगिंद्र कुमार
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दो किलोमीटर सड़क बनने से उम्मीद जगी थी लेकिन काम रुकते ही सब कुछ ठहर गया। अब हम फिर उसी पुराने हालात में जी रहे हैं। राशन और जरूरी सामान आज भी सिर पर ढोना पड़ता है। - रमेश कुमार
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सर्दियों में हालात इतने खराब होते हैं कि घर से निकलना मुश्किल हो जाता है। सेब या अन्य फसल खच्चरों पर ढोनी पड़ती है। सड़क होती तो समय और पैसे दोनों की बचत होती, आमदनी भी बढ़ती। ईशांत राजपूत
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चार किमी सड़क का निर्माण ठप होने से बर्फ, पगडंडी के बीच जीवन के लिए जूझ रहे लोग
संवाद न्यूज एजेंसी
साहो (चंबा)। सालुई से शार तक सड़क केवल कच्ची मिट्टी नहीं, बल्कि 500 ग्रामीणों की रोजमर्रा की चुनौती बन गई है।
दो किलोमीटर तक बनी सड़क ने उम्मीद जगाई लेकिन आगे चार किलोमीटर तक निर्माण कार्य ठप होने से पहाड़ों में फंसे गांवों के लोग सर्दियों में बर्फ और पैदल पगडंडी के बीच अपने जीवन और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए जूझते हैं। यहां सड़क न केवल सुविधा का साधन है, बल्कि संघर्ष और धैर्य की गवाह भी बन गई है।
गुवाड़ी पंचायत के तहत सालुई से शार तक प्रस्तावित छह किलोमीटर सड़क का निर्माण वर्षों से अधूरा है। काम लटकने से मुंगलासन, सकला, डुग, शालेई, लोला, सयोगा, हैला, शाड़ी, साहरी और शार सहित करीब 500 की आबादी आज भी सड़क सुविधा से वंचित है। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण सर्दियों में दो से तीन फीट तक बर्फबारी होती है। ग्रामीणों को घंटों खड़ी चढ़ाई पार कर पैदल घर पहुंचना पड़ता है। आपात स्थिति में गर्भवती महिलाओं और मरीजों को पालकी के सहारे अस्पताल तक ले जाना पड़ता है।
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लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता जोगिंद्र कुमार का कहना है कि जितना टेंडर हुआ था उतना सड़क का निर्माण करवाया गया है। इससे आगे की सड़क बनाने के लिए डीपीआर तैयार की जाएगी।
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खेती-बाड़ी पर भी इसका सीधा असर पड़ रहा है। सेब सीजन में बागवान आज भी अपनी फसल खच्चरों के जरिये बाजार तक पहुंचाने पर मजबूर हैं जबकि महिलाएं रोजमर्रा की खाद्य सामग्री सिर पर उठाकर गांव तक लाती हैं। - प्रकाश चंद
सड़क ही विकास की रेखा है लेकिन उनके गांवों तक यह अब तक नहीं पहुंच पाई। चुनाव के दौरान बड़ी-बड़ी बातें करते है लेकिन बाद में इन गांवों की सुध नहीं ली जाती। - जोगिंद्र कुमार
दो किलोमीटर सड़क बनने से उम्मीद जगी थी लेकिन काम रुकते ही सब कुछ ठहर गया। अब हम फिर उसी पुराने हालात में जी रहे हैं। राशन और जरूरी सामान आज भी सिर पर ढोना पड़ता है। - रमेश कुमार
सर्दियों में हालात इतने खराब होते हैं कि घर से निकलना मुश्किल हो जाता है। सेब या अन्य फसल खच्चरों पर ढोनी पड़ती है। सड़क होती तो समय और पैसे दोनों की बचत होती, आमदनी भी बढ़ती। ईशांत राजपूत