{"_id":"69d643eca3735f7c70020db9","slug":"swarghats-transport-system-sacrificed-in-the-name-of-development-bilaspur-news-c-92-1-ssml1001-157586-2026-04-08","type":"story","status":"publish","title_hn":"Bilaspur News: विकास के नाम पर बलि चढ़ी स्वारघाट की परिवहन व्यवस्था","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Bilaspur News: विकास के नाम पर बलि चढ़ी स्वारघाट की परिवहन व्यवस्था
Wed, 08 Apr 2026 11:31 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Wed, 08 Apr 2026 11:31 PM IST
विज्ञापन
स्वारघाट में बसों की इंतजार करते लोग। संवाद
ग्राउंड रिपोर्ट
फोरलेन के फेर में ग्रामीण जनता दर-दर भटकने को मजबूर
कागजों में सरपट दौड़ रहीं बसें, धरातल पर यात्री बेहाल
एम्स बिलासपुर जाने वाले मरीजों और बुजुर्गों की बढ़ी दुश्वारियां
लाल चंद भारद्वाज
स्वारघाट (बिलासपुर)। विकास के नाम पर बनी कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन सड़क जहां दूसरे राज्यों के पर्यटकों के लिए सुहाना सफर लेकर आई है, वहीं स्वारघाट और आसपास की करीब 15 ग्राम पंचायतों के हजारों ग्रामीणों के लिए यह किसी अभिशाप से कम साबित नहीं हो रही है। स्वारघाट से जिला मुख्यालय बिलासपुर को जोड़ने वाले पुराने राष्ट्रीय उच्च मार्ग चंडीगढ़-मनाली पर नियमित बस सेवाओं का अकाल पड़ गया है। आलम यह है कि जो बसें कभी इस क्षेत्र की लाइफलाइन हुआ करती थीं, वे अब जनता को बीच राह छोड़कर फोरलेन की चकाचौंध में गुम हो गई हैं।
हैरानी की बात यह है कि जिला प्रशासन और परिवहन विभाग की फाइलों में आज भी दर्जनों बसें पुराने मार्ग से ही होकर गुजर रही हैं। इन बसों में निजी ऑपरेटरों की भूपेश बस सर्विस, परमार बस सर्विस, सिंडीकेट बस सर्विस, ठाकुर बस सर्विस, पटियाल बस सर्विस के साथ-साथ हिमाचल पथ परिवहन निगम के नालागढ़ और बिलासपुर डिपो के रूट शामिल हैं। कागजों में ये बसें स्वारघाट के पुराने मार्ग से होकर गुजरती हैं, लेकिन हकीकत में चालक-परिचालक समय और ईंधन बचाने के चक्कर में स्वारघाट से वाया कैंची मोड़ होकर सीधे फोरलेन का रास्ता पकड़ लेते हैं। स्वारघाट से बिलासपुर के बीच पड़ने वाली कुटेहला, तंबोल, छड़ोल, कल्लर, राजपुरा और नालागढ़ विधानसभा क्षेत्र की जुखाडी, घड़ियाच, लुनस, बाहा जैसी कई ग्राम पंचायतों के लोगों का जीवन इन बसों पर निर्भर है। अब जबकि बिलासपुर में एम्स जैसा विशाल स्वास्थ्य संस्थान खुल चुका है, मरीजों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को वहां तक पहुंचने के लिए घंटों स्वारघाट बस अड्डे पर धूल फांकनी पड़ती है। जब बस कर्मियों से इस संबंध में सवाल किया जाता है, तो उनका रटा-रटाया जवाब होता है कि सवारी नहीं मिलती। क्षेत्र की जनता का पलटवार है कि जब तक फोरलेन नहीं बना था, तब भी यही बसें इसी मार्ग पर चलती थीं और तब सवारियों की कोई कमी नहीं थी। अब जब बसें कम हो गई हैं, तो सवारी बढ़नी चाहिए न कि कम होनी चाहिए। जनता पूछ रही है कि क्या परिवहन विभाग केवल लाभ कमाने के लिए है या आम जनता को सेवा देने के लिए?
लोगों का कहना है कि विभाग के उच्च अधिकारी सब कुछ जानते हुए भी अनजान बने हुए हैं। जब भी अधिकारियों से बात की जाती है, तो वे ऊपर से दबाव होने का रोना रोकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। जनता जानना चाहती है कि वह कौन सी शक्ति है, जिसके दबाव में अधिकारी जनता के अधिकारों का हनन कर रहे हैं और बस ऑपरेटरों को नियमों की धज्जियां उड़ाने की खुली छूट दे रहे हैं। स्वारघाट क्षेत्र की समस्त पंचायतों के लोगों ने आगाह किया है कि यदि निर्धारित रूटों पर बसों का नियमित संचालन तुरंत बहाल नहीं किया गया, तो वे उग्र आंदोलन को मजबूर होंगे। ग्रामीणों ने दो टूक कहा है कि अब आश्वासनों का समय निकल चुका है, अब कार्रवाई का समय है। यदि जनता के सब्र का बांध टूटा, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन की होगी। संवाद
विज्ञापन
विज्ञापन
फोरलेन के फेर में ग्रामीण जनता दर-दर भटकने को मजबूर
कागजों में सरपट दौड़ रहीं बसें, धरातल पर यात्री बेहाल
एम्स बिलासपुर जाने वाले मरीजों और बुजुर्गों की बढ़ी दुश्वारियां
लाल चंद भारद्वाज
स्वारघाट (बिलासपुर)। विकास के नाम पर बनी कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन सड़क जहां दूसरे राज्यों के पर्यटकों के लिए सुहाना सफर लेकर आई है, वहीं स्वारघाट और आसपास की करीब 15 ग्राम पंचायतों के हजारों ग्रामीणों के लिए यह किसी अभिशाप से कम साबित नहीं हो रही है। स्वारघाट से जिला मुख्यालय बिलासपुर को जोड़ने वाले पुराने राष्ट्रीय उच्च मार्ग चंडीगढ़-मनाली पर नियमित बस सेवाओं का अकाल पड़ गया है। आलम यह है कि जो बसें कभी इस क्षेत्र की लाइफलाइन हुआ करती थीं, वे अब जनता को बीच राह छोड़कर फोरलेन की चकाचौंध में गुम हो गई हैं।
हैरानी की बात यह है कि जिला प्रशासन और परिवहन विभाग की फाइलों में आज भी दर्जनों बसें पुराने मार्ग से ही होकर गुजर रही हैं। इन बसों में निजी ऑपरेटरों की भूपेश बस सर्विस, परमार बस सर्विस, सिंडीकेट बस सर्विस, ठाकुर बस सर्विस, पटियाल बस सर्विस के साथ-साथ हिमाचल पथ परिवहन निगम के नालागढ़ और बिलासपुर डिपो के रूट शामिल हैं। कागजों में ये बसें स्वारघाट के पुराने मार्ग से होकर गुजरती हैं, लेकिन हकीकत में चालक-परिचालक समय और ईंधन बचाने के चक्कर में स्वारघाट से वाया कैंची मोड़ होकर सीधे फोरलेन का रास्ता पकड़ लेते हैं। स्वारघाट से बिलासपुर के बीच पड़ने वाली कुटेहला, तंबोल, छड़ोल, कल्लर, राजपुरा और नालागढ़ विधानसभा क्षेत्र की जुखाडी, घड़ियाच, लुनस, बाहा जैसी कई ग्राम पंचायतों के लोगों का जीवन इन बसों पर निर्भर है। अब जबकि बिलासपुर में एम्स जैसा विशाल स्वास्थ्य संस्थान खुल चुका है, मरीजों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को वहां तक पहुंचने के लिए घंटों स्वारघाट बस अड्डे पर धूल फांकनी पड़ती है। जब बस कर्मियों से इस संबंध में सवाल किया जाता है, तो उनका रटा-रटाया जवाब होता है कि सवारी नहीं मिलती। क्षेत्र की जनता का पलटवार है कि जब तक फोरलेन नहीं बना था, तब भी यही बसें इसी मार्ग पर चलती थीं और तब सवारियों की कोई कमी नहीं थी। अब जब बसें कम हो गई हैं, तो सवारी बढ़नी चाहिए न कि कम होनी चाहिए। जनता पूछ रही है कि क्या परिवहन विभाग केवल लाभ कमाने के लिए है या आम जनता को सेवा देने के लिए?
विज्ञापन
लोगों का कहना है कि विभाग के उच्च अधिकारी सब कुछ जानते हुए भी अनजान बने हुए हैं। जब भी अधिकारियों से बात की जाती है, तो वे ऊपर से दबाव होने का रोना रोकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। जनता जानना चाहती है कि वह कौन सी शक्ति है, जिसके दबाव में अधिकारी जनता के अधिकारों का हनन कर रहे हैं और बस ऑपरेटरों को नियमों की धज्जियां उड़ाने की खुली छूट दे रहे हैं। स्वारघाट क्षेत्र की समस्त पंचायतों के लोगों ने आगाह किया है कि यदि निर्धारित रूटों पर बसों का नियमित संचालन तुरंत बहाल नहीं किया गया, तो वे उग्र आंदोलन को मजबूर होंगे। ग्रामीणों ने दो टूक कहा है कि अब आश्वासनों का समय निकल चुका है, अब कार्रवाई का समय है। यदि जनता के सब्र का बांध टूटा, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन की होगी। संवाद
विज्ञापन