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वन भूमि पर पुनर्वास को मिले अनुमति, एफसीए संशोधन की मांग़ न्यायोचित : रामलाल
Thu, 17 Jul 2025 11:39 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Thu, 17 Jul 2025 11:39 PM IST
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60 वर्ष से अन्याय झेल रहे भाखड़ा विस्थापितों के पक्ष में बोले वरिष्ठ कांग्रेस नेता
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पार्टी की राज्य समन्वय समिति के सदस्य रामलाल ठाकुर ने कहा कि राजस्व मंत्री की केंद्र सरकार से एफसीए में संशोधन कर आपदा प्रभावित लोगों को राहत देने के लिए वन भूमि के उपयोग की अनुमति कर मांग न्यायोचित है। मीडिया को जारी प्रेस विज्ञप्ति में ठाकुर ने कहा कि यह मांग अत्यंत समयानुकूल, न्यायसंगत और हिमाचल की विशेष परिस्थितियों के अनुरूप है। प्रदेश का अधिकांश भूभाग पहाड़ी और वन क्षेत्र में आता है। ऐसे में केंद्र के पुराने कानूनों को ज्यों का त्यों लागू करना व्यावहारिक नहीं है। हिमाचल की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इन कानूनों में लचीलापन जरूरी है। वर्षों पुराने कानून आज हिमाचल के लिए बाधा बन रहे हैं। विशेष रूप से भाखड़ा बांध विस्थापितों के पुनर्वास में वन भूमि आवंटन का न होना एक बड़ा रोड़ा है। उन्होंने कहा कि विस्थापितों को अब तक उनके अधिकार नहीं मिले हैं, जबकि उनके पुश्तैनी घर और जमीन बांध निर्माण में समर्पित हो गई थीं। कहा कि जब तक केंद्र सरकार वन संरक्षण अधिनियम में संशोधन नहीं करती और राज्य सरकार को विशेष परिस्थितियों में वन भूमि आवंटित करने का अधिकार नहीं देती, तब तक न तो आपदा प्रभावितों का पुनर्वास संभव है और न ही भाखड़ा विस्थापितों के साथ न्याय हो सकता है। भाखड़ा विस्थापितों द्वारा वर्षों पहले अपने जीवन-यापन के लिए किए गए अतिक्रमण को लेकर वे आज भी असुरक्षा की स्थिति में हैं। यह अन्याय पिछले छह दशकों से चला आ रहा है, जिसे अब खत्म किया जाना चाहिए।
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संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पार्टी की राज्य समन्वय समिति के सदस्य रामलाल ठाकुर ने कहा कि राजस्व मंत्री की केंद्र सरकार से एफसीए में संशोधन कर आपदा प्रभावित लोगों को राहत देने के लिए वन भूमि के उपयोग की अनुमति कर मांग न्यायोचित है। मीडिया को जारी प्रेस विज्ञप्ति में ठाकुर ने कहा कि यह मांग अत्यंत समयानुकूल, न्यायसंगत और हिमाचल की विशेष परिस्थितियों के अनुरूप है। प्रदेश का अधिकांश भूभाग पहाड़ी और वन क्षेत्र में आता है। ऐसे में केंद्र के पुराने कानूनों को ज्यों का त्यों लागू करना व्यावहारिक नहीं है। हिमाचल की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इन कानूनों में लचीलापन जरूरी है। वर्षों पुराने कानून आज हिमाचल के लिए बाधा बन रहे हैं। विशेष रूप से भाखड़ा बांध विस्थापितों के पुनर्वास में वन भूमि आवंटन का न होना एक बड़ा रोड़ा है। उन्होंने कहा कि विस्थापितों को अब तक उनके अधिकार नहीं मिले हैं, जबकि उनके पुश्तैनी घर और जमीन बांध निर्माण में समर्पित हो गई थीं। कहा कि जब तक केंद्र सरकार वन संरक्षण अधिनियम में संशोधन नहीं करती और राज्य सरकार को विशेष परिस्थितियों में वन भूमि आवंटित करने का अधिकार नहीं देती, तब तक न तो आपदा प्रभावितों का पुनर्वास संभव है और न ही भाखड़ा विस्थापितों के साथ न्याय हो सकता है। भाखड़ा विस्थापितों द्वारा वर्षों पहले अपने जीवन-यापन के लिए किए गए अतिक्रमण को लेकर वे आज भी असुरक्षा की स्थिति में हैं। यह अन्याय पिछले छह दशकों से चला आ रहा है, जिसे अब खत्म किया जाना चाहिए।