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Bilaspur News: कैकेयी ने मांगा प्रभु राम को 14 साल का वनवास
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- डियारा में चल रही रामलीला के तीसरे दिन सीता स्वयंवर सहित दिखाए गए कई दृश्य
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। शहर के डियारा सेक्टर में चल रही रामलीला के तीसरे दिन राजा जनक अपनी पुत्री सीता के स्वयंवर का आयोजन करते हैं। इसमें विभिन्न देशों से आए राजकुमार शिव धनुष उठाने का प्रयास करते हैं, लेकिन वे उसे हिला तक नहीं पाते।
इसके बाद रावण जब धनुष उठाने के लिए बढ़ता है तभी आकाशवाणी होती है कि रावण स्वयंवर से चला जा नहीं तो तेरी जग हंसाई होगी, क्योंकि रावण को एक ही बार शिव धनुष को उठा पाने का वरदान था। रावण ने वरदान की सत्यता को परखने के लिए रात्रि में ही रंगशाला में धनुष उठा लिया था। अपमानित होने से बचने के लिए रावण स्वयंवर को छोड़कर चला जाता है। विश्वामित्र श्रीराम को शिवधनुष तोड़ने की आज्ञा देते हैं। इस पर भगवान राम ने जनक को प्रणाम किया और रंगशाला में रखे शिवधनुष को उठाकर ज्यों ही उसकी प्रत्यंचा चढ़ाई उसके दो टुकड़े हो गए। सीता श्रीराम को वरमाला पहनाती हैं। इस खुशी में जनकपुरी में खुशियां मनाना आरंभ हो जाता है। तभी ऋषि परशुराम का वहां आगमन होता है और वे शिव धनुष के टूटने की जानकारी पाकर क्रोधित हो जाते हैं। इस पर लक्ष्मण और परशुराम का विवाद हो जाता है। श्रीराम कहते हैं कि यह धनुष उन्होंने तोड़ा है। तभी परशुराम ने उन्हें उनके धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने को कहते हैं और श्री राम द्वारा प्रत्यंचा चढ़ा दिए जाने पर परशुराम बहुत खुश होते हैं। इसके बाद भगवान राम और सीता को आशीर्वाद देते हैं।
दूसरे दृश्य दासी मंथरा रानी कैकेयी को भ्रमित करती हैं और कहती हैं कि महाराज से अपने दो वरदान मांगने का समय आ गया है। पहले वरदान में भारत को राज और दूसरे वरदान में भगवान राम को 14 साल का वनवास मांग लो। उसकी बातों में आकर कैकेयी महाराज दशरथ से दोनों वरदान मांगती है। यह सुनते ही दशरथ मूर्छित हो जाते हैं। तभी श्रीराम, सीता व लक्ष्मण वहां आते हैं और इसके बारे में पूछते हैं। कैकेयी राजा दशरथ से मांगे दो वरदानों की जानकारी देती हैं। भगवान राम पिता और माता की आज्ञा को मानते हैं और वनवास की तैयारी करते हैं। दशरथ भगवान राम से कहते हैं कि वह इस आज्ञा को न माने। तब भगवान राम कहते हैं कि रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाए पर वचन न जाई।
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तीसरे दृश्य में माता कौशल्या श्री राम के राजा बनने की खुशी में पूजा-अर्चना कर रही हैं। तभी वहां पर श्री राम, सीता और लक्ष्मण आते हैं और उन्हें दोनों वरदानों के बारे में अवगत कराते हैं। श्री राम वरदानों की पूर्ति के लिए सीता और लक्ष्मण के साथ वनवास पर चले जाते हैं। अगले दृश्य में ननिहाल से वापस आए भरत अपनी मां कैकेयी से मिल कर अपना गुस्सा प्रकट करते हैं और कहते हैं कि ये वरदान मांग कर और श्रीराम को वनवास भेज कर उसने बहुत बड़ा पाप किया है। इन दृश्यों में राजा जनक का किरदार कुलभूषण चब्बा, भरत का किरदार पारस गौतम, कैकेयी का किरदार अनुभव अंगरीश, मंथरा का किरदार ध्रुव शर्मा, दशरथ का किरदार रजत कुमार, ब्रह्मर्षि विश्वामित्र का किरदार राजेंद्र चंदेल, परशुराम का किरदार सुखदेव, भाट का किरदार शेर बहादुर, कौशल्या का किरदार बृजलाल गांधी ने बखूबी निभाया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। शहर के डियारा सेक्टर में चल रही रामलीला के तीसरे दिन राजा जनक अपनी पुत्री सीता के स्वयंवर का आयोजन करते हैं। इसमें विभिन्न देशों से आए राजकुमार शिव धनुष उठाने का प्रयास करते हैं, लेकिन वे उसे हिला तक नहीं पाते।
इसके बाद रावण जब धनुष उठाने के लिए बढ़ता है तभी आकाशवाणी होती है कि रावण स्वयंवर से चला जा नहीं तो तेरी जग हंसाई होगी, क्योंकि रावण को एक ही बार शिव धनुष को उठा पाने का वरदान था। रावण ने वरदान की सत्यता को परखने के लिए रात्रि में ही रंगशाला में धनुष उठा लिया था। अपमानित होने से बचने के लिए रावण स्वयंवर को छोड़कर चला जाता है। विश्वामित्र श्रीराम को शिवधनुष तोड़ने की आज्ञा देते हैं। इस पर भगवान राम ने जनक को प्रणाम किया और रंगशाला में रखे शिवधनुष को उठाकर ज्यों ही उसकी प्रत्यंचा चढ़ाई उसके दो टुकड़े हो गए। सीता श्रीराम को वरमाला पहनाती हैं। इस खुशी में जनकपुरी में खुशियां मनाना आरंभ हो जाता है। तभी ऋषि परशुराम का वहां आगमन होता है और वे शिव धनुष के टूटने की जानकारी पाकर क्रोधित हो जाते हैं। इस पर लक्ष्मण और परशुराम का विवाद हो जाता है। श्रीराम कहते हैं कि यह धनुष उन्होंने तोड़ा है। तभी परशुराम ने उन्हें उनके धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने को कहते हैं और श्री राम द्वारा प्रत्यंचा चढ़ा दिए जाने पर परशुराम बहुत खुश होते हैं। इसके बाद भगवान राम और सीता को आशीर्वाद देते हैं।
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दूसरे दृश्य दासी मंथरा रानी कैकेयी को भ्रमित करती हैं और कहती हैं कि महाराज से अपने दो वरदान मांगने का समय आ गया है। पहले वरदान में भारत को राज और दूसरे वरदान में भगवान राम को 14 साल का वनवास मांग लो। उसकी बातों में आकर कैकेयी महाराज दशरथ से दोनों वरदान मांगती है। यह सुनते ही दशरथ मूर्छित हो जाते हैं। तभी श्रीराम, सीता व लक्ष्मण वहां आते हैं और इसके बारे में पूछते हैं। कैकेयी राजा दशरथ से मांगे दो वरदानों की जानकारी देती हैं। भगवान राम पिता और माता की आज्ञा को मानते हैं और वनवास की तैयारी करते हैं। दशरथ भगवान राम से कहते हैं कि वह इस आज्ञा को न माने। तब भगवान राम कहते हैं कि रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाए पर वचन न जाई।
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तीसरे दृश्य में माता कौशल्या श्री राम के राजा बनने की खुशी में पूजा-अर्चना कर रही हैं। तभी वहां पर श्री राम, सीता और लक्ष्मण आते हैं और उन्हें दोनों वरदानों के बारे में अवगत कराते हैं। श्री राम वरदानों की पूर्ति के लिए सीता और लक्ष्मण के साथ वनवास पर चले जाते हैं। अगले दृश्य में ननिहाल से वापस आए भरत अपनी मां कैकेयी से मिल कर अपना गुस्सा प्रकट करते हैं और कहते हैं कि ये वरदान मांग कर और श्रीराम को वनवास भेज कर उसने बहुत बड़ा पाप किया है। इन दृश्यों में राजा जनक का किरदार कुलभूषण चब्बा, भरत का किरदार पारस गौतम, कैकेयी का किरदार अनुभव अंगरीश, मंथरा का किरदार ध्रुव शर्मा, दशरथ का किरदार रजत कुमार, ब्रह्मर्षि विश्वामित्र का किरदार राजेंद्र चंदेल, परशुराम का किरदार सुखदेव, भाट का किरदार शेर बहादुर, कौशल्या का किरदार बृजलाल गांधी ने बखूबी निभाया।