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Bilaspur News: कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन में 14 महीने बाद भी नहीं हुई निशानदेही
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32 करम के बजाय कई स्थानों पर 27 से 30 करम पाई गई है सड़क की चौड़ाई
एसडीएम झंडूता के निर्देशों के दो माह बाद भी एनएचएआई नहीं ले पाया कोई फैसला
निशानदेही से पहले लगे बिजली मीटर और गलत पक्षकार बनाए जाने से विवाद और गहराया
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन से जुड़ा भूमि और सड़क चौड़ाई का विवाद पिछले करीब 14 महीनों से लंबित है, लेकिन अब तक मौके पर स्पष्ट निशानदेही नहीं हो पाई है। इस पूरे मामले में राजस्व रिकॉर्ड, सड़क की वास्तविक चौड़ाई, भूमि स्वामित्व और विभिन्न विभागों की भूमिका को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं।
जानकारी के अनुसार सड़क की निर्धारित चौड़ाई 32 करम होनी चाहिए, लेकिन क्षेत्रीय अभिकरण की मौका छानबीन और तहसीलदार की पुष्टि में कई स्थानों पर सड़क की चौड़ाई 27 करम तथा कहीं 30 करम पाई गई है। ऐसे में सड़क सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) को अपना पक्ष स्पष्ट रूप से रखना चाहिए था, लेकिन आरोप है कि निशानदेही की प्रक्रिया के दौरान एनएचएआई प्रभावी तरीके से अपनी बात रखने में नाकाम रहा। मामले में यह भी सामने आया है कि प्रतिवादी नंबर-04 के रूप में शामिल साइट इंजीनियर मेंटेनेंस कंपनी को न तो निशानदेही की सूचना के बारे में जानकारी है और न ही मौके पर हुई किसी निशानदेही पर उनकी सहमति बताई गई है। इससे पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल उठने लगे हैं। एसडीएम झंडूता ने इस विवाद को गंभीरता से लेते हुए एनएचएआई के तहसीलदार को राजस्व रिकॉर्ड की स्थिति स्पष्ट कर तुरंत प्रभाव से निर्णय लेने और इसकी रिपोर्ट देने के निर्देश जारी किए थे। हालांकि इन निर्देशों को दो महीने बीत जाने के बावजूद अब तक कोई फैसला नहीं लिया जा सका है, जबकि यह विवाद करीब डेढ़ साल से विचाराधीन चल रहा है। इसके अलावा निशानदेही में जिस व्यक्ति को पक्षकार बनाया गया है, वह अभी तक संबंधित भूमि का भू-अभिलेख में मालिक ही नहीं बन पाया है। वहीं भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) को भी इस प्रक्रिया में पक्षकार नहीं बनाया गया है, जिससे विवाद और उलझ गया है।
फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति के महासचिव मदन लाल शर्मा ने बताया कि एक और बड़ा सवाल विद्युत बोर्ड की ओर से वर्ष 2022-23 में लगाए गए बिजली मीटरों को लेकर भी उठ रहा है। जब मौके पर आज तक स्पष्ट निशानदेही नहीं हुई है, तो फिर उस भूमि पर बिजली कनेक्शन किस आधार पर जारी किए गए। इससे विद्युत बोर्ड की प्रक्रिया भी संदेह के घेरे में आ गई है।
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इसके साथ ही केंद्र सरकार के पक्ष में अधिग्रहित भूमि का अब तक राजस्व रिकॉर्ड में इंतकाल दर्ज नहीं हुआ है, जबकि मौके पर कब्जा एनएचएआई का बताया जा रहा है। इस स्थिति के चलते सरकारी राजस्व को भी नुकसान होने की आशंका जताई जा रही है। कहा कि सड़क चौड़ाई और भूमि से जुड़े इस विवाद का जल्द समाधान होना जरूरी है, क्योंकि यह मामला न केवल प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़ा है बल्कि सड़क सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे से भी संबंधित है। यदि समय रहते स्पष्ट निर्णय नहीं लिया गया तो भविष्य में यह विवाद और बड़ा रूप ले सकता है।
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एसडीएम झंडूता के निर्देशों के दो माह बाद भी एनएचएआई नहीं ले पाया कोई फैसला
निशानदेही से पहले लगे बिजली मीटर और गलत पक्षकार बनाए जाने से विवाद और गहराया
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन से जुड़ा भूमि और सड़क चौड़ाई का विवाद पिछले करीब 14 महीनों से लंबित है, लेकिन अब तक मौके पर स्पष्ट निशानदेही नहीं हो पाई है। इस पूरे मामले में राजस्व रिकॉर्ड, सड़क की वास्तविक चौड़ाई, भूमि स्वामित्व और विभिन्न विभागों की भूमिका को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं।
जानकारी के अनुसार सड़क की निर्धारित चौड़ाई 32 करम होनी चाहिए, लेकिन क्षेत्रीय अभिकरण की मौका छानबीन और तहसीलदार की पुष्टि में कई स्थानों पर सड़क की चौड़ाई 27 करम तथा कहीं 30 करम पाई गई है। ऐसे में सड़क सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) को अपना पक्ष स्पष्ट रूप से रखना चाहिए था, लेकिन आरोप है कि निशानदेही की प्रक्रिया के दौरान एनएचएआई प्रभावी तरीके से अपनी बात रखने में नाकाम रहा। मामले में यह भी सामने आया है कि प्रतिवादी नंबर-04 के रूप में शामिल साइट इंजीनियर मेंटेनेंस कंपनी को न तो निशानदेही की सूचना के बारे में जानकारी है और न ही मौके पर हुई किसी निशानदेही पर उनकी सहमति बताई गई है। इससे पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल उठने लगे हैं। एसडीएम झंडूता ने इस विवाद को गंभीरता से लेते हुए एनएचएआई के तहसीलदार को राजस्व रिकॉर्ड की स्थिति स्पष्ट कर तुरंत प्रभाव से निर्णय लेने और इसकी रिपोर्ट देने के निर्देश जारी किए थे। हालांकि इन निर्देशों को दो महीने बीत जाने के बावजूद अब तक कोई फैसला नहीं लिया जा सका है, जबकि यह विवाद करीब डेढ़ साल से विचाराधीन चल रहा है। इसके अलावा निशानदेही में जिस व्यक्ति को पक्षकार बनाया गया है, वह अभी तक संबंधित भूमि का भू-अभिलेख में मालिक ही नहीं बन पाया है। वहीं भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) को भी इस प्रक्रिया में पक्षकार नहीं बनाया गया है, जिससे विवाद और उलझ गया है।
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फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति के महासचिव मदन लाल शर्मा ने बताया कि एक और बड़ा सवाल विद्युत बोर्ड की ओर से वर्ष 2022-23 में लगाए गए बिजली मीटरों को लेकर भी उठ रहा है। जब मौके पर आज तक स्पष्ट निशानदेही नहीं हुई है, तो फिर उस भूमि पर बिजली कनेक्शन किस आधार पर जारी किए गए। इससे विद्युत बोर्ड की प्रक्रिया भी संदेह के घेरे में आ गई है।
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इसके साथ ही केंद्र सरकार के पक्ष में अधिग्रहित भूमि का अब तक राजस्व रिकॉर्ड में इंतकाल दर्ज नहीं हुआ है, जबकि मौके पर कब्जा एनएचएआई का बताया जा रहा है। इस स्थिति के चलते सरकारी राजस्व को भी नुकसान होने की आशंका जताई जा रही है। कहा कि सड़क चौड़ाई और भूमि से जुड़े इस विवाद का जल्द समाधान होना जरूरी है, क्योंकि यह मामला न केवल प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़ा है बल्कि सड़क सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे से भी संबंधित है। यदि समय रहते स्पष्ट निर्णय नहीं लिया गया तो भविष्य में यह विवाद और बड़ा रूप ले सकता है।