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Bilaspur News: वित्तीय बोझ से नहीं रोका जा सकता मुआवजे का अधिकार
Mon, 13 Apr 2026 11:25 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Mon, 13 Apr 2026 11:25 PM IST
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एक्सक्लूसिव
सुप्रीम कोर्ट की टिप्णी-1997 से 2015 तक के अधिग्रहण के मामलों में ब्याज और मुआवजे का सिद्धांत बरकरार
28 मार्च 2008 या बाद में लंबित रहने वाले मामलों में ही मिलेगा लाभ
हाईवे परियोजनाओं के विचाराधीन मामलों को मिलेगा अतिरिक्त मुआवजा
सरोज पाठक
बिलासपुर। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए भूमि देने वाले किसानों और भूमि मालिकों को राहत दी है। कोर्ट ने पूर्व फैसलों के अनुसार 1997 से 2015 के बीच अधिग्रहीत जमीन पर ब्याज, मुआवजा और मुआवजे पर ब्याज देने के सिद्धांत को बरकरार रखा है। साथ ही देरी से दायर किए गए दावों पर सख्त शर्तें लगाते हुए साफ दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। हालांकि, यह फायदा सिर्फ उन मामलों में मिलेगा जो 28 मार्च 2008 को या उसके बाद से लंबित थे। चीफ जस्टिस सूर्याकांत और जस्टिस उज्जल भुयान की खंडपीठ ने रिव्यू पिटीशन का निपटारा करते हुए कहा कि सांविधानिक अधिकार को वित्तीय बोझ के नाम पर नहीं रोका जा सकता। यह फैसला 2026 आईएनएससी 291 के तहत जारी किया गया है।
कहा कि जब सरकार किसी की जमीन जबरन अधिग्रहण करती है तो सोलाटियम के रूप में मुआवजे के अलावा अतिरिक्त राशि दी जाती है, जो मानसिक कष्ट की भरपाई के लिए होती है। सुप्रीम कोर्ट ने सोलाटियम पर ब्याज को भी स्पष्ट रूप से शामिल किया है। कोर्ट ने फैसले में बार-बार इंटरस्ट ऑन द सोलाटियम का जिक्र किया है। इसका मतलब है कि सोलाटियम की राशि पर भी ब्याज लगेगा। कोर्ट ने इसे उचित मुआवजा का अभिन्न हिस्सा माना है। एनएचएआई ने रिव्यू पिटीशन में दावा किया था कि पहले 100 करोड़ रुपये का बोझ बताया गया था, लेकिन असल में यह 29 हजार करोड़ रुपये के करीब है। कोर्ट ने साफ कहा कि अनुच्छेद 300 ए के तहत उचित मुआवजे का सांविधानिक अधिकार वित्तीय बोझ की मात्रा पर निर्भर नहीं हो सकता। बोझ कितना भी बड़ा हो, न्याय नहीं रोका जाएगा। कोर्ट ने कहा कि अगर एनएचएआई ने हजारों अन्य भूमि मालिकों को यह लाभ दिया है तो बाकी को भी देना चाहिए। कोर्ट ने वित्तीय बोझ के आधार पर पुराने फैसलों को बदलने से इन्कार कर दिया।
हिमाचल में हमीरपुर, कांगड़ा, मंडी, बिलासपुर, ऊना, शिमला समेत कई जिलों में 1997 से 2015 के बीच हाईवे परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण हुआ है। अब सुप्रीम कोर्ट की जजमेंट आने के बाद जिनके मुआवजे के मामले 28 मार्च 2008 या बाद में लंबित रहे, उन्हें अतिरिक्त मुआवजा मिल सकता है। जिनके मामले 28 मार्च 2008 से पहले निपट चुके थे और कोई आगे की चुनौती नहीं दी गई थी, उन्हें इसका लाभ नहीं मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट ने तरसेम सिंह-1 (19 सितंबर 2019) और तरसेम सिंह-2 (4 फरवरी 2025) के फैसलों को बरकरार रखा। इनमें एनएच एक्ट की धारा 3-जे को असांविधानिक ठहराया गया था। कोर्ट ने कहा कि 1997 से 1 जनवरी 2015 के बीच नेशनल हाईवे एक्ट के तहत ली गई जमीन पर भी लागू कानून के अनुसार पूरा सोलाटियम, ब्याज और सोलाटियम पर ब्याज का पूरा लाभ मिल सकेगा। यह फैसला उन भूमि मालिकों के लिए महत्वपूर्ण है, जिन्हें पहले सेक्शन 3-जे के कारण इन लाभों से वंचित रखा गया था। संवाद
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इनसेट
देरी वाले दावों पर सख्ती
सुप्रीम कोर्ट ने पुराने तय हो चुके मामलों को दोबारा खोलने की इजाजत नहीं दी, लेकिन जीवित दावों पर राहत दी। कहा कि जिन भूमि मालिकों के मुआवजे के दावे 28 मार्च 2008 या उसके बाद कॉम्पिटेंट अथॉरिटी, आर्बिट्रेटर, हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में लंबित थे, उन्हें पूरा लाभ मिलेगा।
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सुप्रीम कोर्ट की टिप्णी-1997 से 2015 तक के अधिग्रहण के मामलों में ब्याज और मुआवजे का सिद्धांत बरकरार
28 मार्च 2008 या बाद में लंबित रहने वाले मामलों में ही मिलेगा लाभ
हाईवे परियोजनाओं के विचाराधीन मामलों को मिलेगा अतिरिक्त मुआवजा
सरोज पाठक
बिलासपुर। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए भूमि देने वाले किसानों और भूमि मालिकों को राहत दी है। कोर्ट ने पूर्व फैसलों के अनुसार 1997 से 2015 के बीच अधिग्रहीत जमीन पर ब्याज, मुआवजा और मुआवजे पर ब्याज देने के सिद्धांत को बरकरार रखा है। साथ ही देरी से दायर किए गए दावों पर सख्त शर्तें लगाते हुए साफ दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। हालांकि, यह फायदा सिर्फ उन मामलों में मिलेगा जो 28 मार्च 2008 को या उसके बाद से लंबित थे। चीफ जस्टिस सूर्याकांत और जस्टिस उज्जल भुयान की खंडपीठ ने रिव्यू पिटीशन का निपटारा करते हुए कहा कि सांविधानिक अधिकार को वित्तीय बोझ के नाम पर नहीं रोका जा सकता। यह फैसला 2026 आईएनएससी 291 के तहत जारी किया गया है।
कहा कि जब सरकार किसी की जमीन जबरन अधिग्रहण करती है तो सोलाटियम के रूप में मुआवजे के अलावा अतिरिक्त राशि दी जाती है, जो मानसिक कष्ट की भरपाई के लिए होती है। सुप्रीम कोर्ट ने सोलाटियम पर ब्याज को भी स्पष्ट रूप से शामिल किया है। कोर्ट ने फैसले में बार-बार इंटरस्ट ऑन द सोलाटियम का जिक्र किया है। इसका मतलब है कि सोलाटियम की राशि पर भी ब्याज लगेगा। कोर्ट ने इसे उचित मुआवजा का अभिन्न हिस्सा माना है। एनएचएआई ने रिव्यू पिटीशन में दावा किया था कि पहले 100 करोड़ रुपये का बोझ बताया गया था, लेकिन असल में यह 29 हजार करोड़ रुपये के करीब है। कोर्ट ने साफ कहा कि अनुच्छेद 300 ए के तहत उचित मुआवजे का सांविधानिक अधिकार वित्तीय बोझ की मात्रा पर निर्भर नहीं हो सकता। बोझ कितना भी बड़ा हो, न्याय नहीं रोका जाएगा। कोर्ट ने कहा कि अगर एनएचएआई ने हजारों अन्य भूमि मालिकों को यह लाभ दिया है तो बाकी को भी देना चाहिए। कोर्ट ने वित्तीय बोझ के आधार पर पुराने फैसलों को बदलने से इन्कार कर दिया।
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हिमाचल में हमीरपुर, कांगड़ा, मंडी, बिलासपुर, ऊना, शिमला समेत कई जिलों में 1997 से 2015 के बीच हाईवे परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण हुआ है। अब सुप्रीम कोर्ट की जजमेंट आने के बाद जिनके मुआवजे के मामले 28 मार्च 2008 या बाद में लंबित रहे, उन्हें अतिरिक्त मुआवजा मिल सकता है। जिनके मामले 28 मार्च 2008 से पहले निपट चुके थे और कोई आगे की चुनौती नहीं दी गई थी, उन्हें इसका लाभ नहीं मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट ने तरसेम सिंह-1 (19 सितंबर 2019) और तरसेम सिंह-2 (4 फरवरी 2025) के फैसलों को बरकरार रखा। इनमें एनएच एक्ट की धारा 3-जे को असांविधानिक ठहराया गया था। कोर्ट ने कहा कि 1997 से 1 जनवरी 2015 के बीच नेशनल हाईवे एक्ट के तहत ली गई जमीन पर भी लागू कानून के अनुसार पूरा सोलाटियम, ब्याज और सोलाटियम पर ब्याज का पूरा लाभ मिल सकेगा। यह फैसला उन भूमि मालिकों के लिए महत्वपूर्ण है, जिन्हें पहले सेक्शन 3-जे के कारण इन लाभों से वंचित रखा गया था। संवाद
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देरी वाले दावों पर सख्ती
सुप्रीम कोर्ट ने पुराने तय हो चुके मामलों को दोबारा खोलने की इजाजत नहीं दी, लेकिन जीवित दावों पर राहत दी। कहा कि जिन भूमि मालिकों के मुआवजे के दावे 28 मार्च 2008 या उसके बाद कॉम्पिटेंट अथॉरिटी, आर्बिट्रेटर, हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में लंबित थे, उन्हें पूरा लाभ मिलेगा।