{"_id":"5d334cda8ebc3e6c9e1b940e","slug":"education-bilaspur-news-sml301113174","type":"story","status":"publish","title_hn":"‘जब-जब भी रूबरू आप से हुए हैं, तब-तब ही जिंदगी में कई हादसे हुए’","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
‘जब-जब भी रूबरू आप से हुए हैं, तब-तब ही जिंदगी में कई हादसे हुए’
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बिलासपुर। भाषा एवं संस्कृति विभाग कार्यालय बिलासपुर की ओर से प्रत्येक मास को आयोजित की जाने वाली मासिक साहित्यिक संगोष्ठी का आयोजन संस्कृति भवन बिलासपुर के साहित्यिक कक्ष में हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता जिला भाषा अधिकारी नीलम चंदेल ने की तथा मंच का संचालन कविता सिसोदिया ने किया।
इस मौके पर जीत राम सुमन द्वारा मां सरस्वती की वंदना प्रस्तुत की गई। प्रदीप गुप्ता की रचना की पंक्तियां थीं- ‘उर्दू का रिजेक्टड माल हिंदी में चल रहा है चोरों के भरोसे, खानदान पल रहा है’। नरैणु राम हितैषी ने ‘जीवन की गाड़ी के दो बराबर पहिए नर और नारी, फिर नारी क्यों कहे कि पुरुष है अत्यचारी’।
रविंद्र भट्टा ने ‘हनुमान बड़ के पास, शाम को वॉलीबाल का खेल फिर उसको देखने उमड़ती दर्शकों की भीड़ अब दिखाई नहीं देती’। एसआर आजाद ने ‘जब-जब भी रूबरू आप से हुए हैं, तब-तब ही जिंदगी में कई हादसे हुए हैं’ पेश की।
विज्ञापन
डॉ. अनेक राम सांख्यान ने ‘यह है तो सब साथ हैं यह नहीं तो सब दूर, दोस्त दुश्मन बन जाता है, हो जाता है यह जब चूर’। सरस्वती देवी ने ‘नशा खोरी सब बन रहे हैं अघोर’। बीना बर्धन ने ‘एहडे हुंदे मेरे हिमाचल च पतरोडू’। जीतराम सुमन ने ‘भीड़ भड़ाका बदीगा इतना, माणुवां री नी रई पच्छयाण’ पेश की।
शिवपाल गर्ग ने ‘कुछ लोग इस शहर में ऐसे भी रहते हैं, आंखों से जो सुनते हैं जो आंखों से कहते हैं’। सुरेंद्र मिन्हास ने ‘दित्या छंब फेरी लगे देखने समाण, सुजो नी बरखारी कितखा बी गाहण’।
सुशील पुंडीर ने ‘सावन की फुहार’ शीर्षक से रचना प्रस्तुत की जिसकी पंक्तियां थीं ‘सावन की फुहार बड़ी अच्छी लगती है, जब चारों तरफ हरियाली दिखती है, जिंदगी भी यूं खुशनुमा दिखती है’। हुसैन अली ने ‘नाशुकरे हैं हम कुदरत की मेहरबानी के लिए, तरसेंगे और रोएंगे एक-एक बूंद पानी के लिए’ सहित अन्य ने अपनी प्रस्तुतियां दी। अंत में जिला भाषा अधिकारी ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी साहित्यकारों का आभार करते हुए कहा कि विभाग का सदैव प्रयास रहता है कि साहित्यकारों, कवियों, कलाकारों को उचित मंच प्रदान हो और सभी को अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने का अवसर प्रदान करना हैं। इस अवसर पर इंद्र सिंह चंदेल, कांता देवी, अमर सिंह, नेहा देवी, नेहा कुमारी अभिषेक कुमार, रवि कुमार भी श्रोताओं के रूप में उपस्थित रहे।
विज्ञापन
इस मौके पर जीत राम सुमन द्वारा मां सरस्वती की वंदना प्रस्तुत की गई। प्रदीप गुप्ता की रचना की पंक्तियां थीं- ‘उर्दू का रिजेक्टड माल हिंदी में चल रहा है चोरों के भरोसे, खानदान पल रहा है’। नरैणु राम हितैषी ने ‘जीवन की गाड़ी के दो बराबर पहिए नर और नारी, फिर नारी क्यों कहे कि पुरुष है अत्यचारी’।
विज्ञापन
रविंद्र भट्टा ने ‘हनुमान बड़ के पास, शाम को वॉलीबाल का खेल फिर उसको देखने उमड़ती दर्शकों की भीड़ अब दिखाई नहीं देती’। एसआर आजाद ने ‘जब-जब भी रूबरू आप से हुए हैं, तब-तब ही जिंदगी में कई हादसे हुए हैं’ पेश की।
विज्ञापन
डॉ. अनेक राम सांख्यान ने ‘यह है तो सब साथ हैं यह नहीं तो सब दूर, दोस्त दुश्मन बन जाता है, हो जाता है यह जब चूर’। सरस्वती देवी ने ‘नशा खोरी सब बन रहे हैं अघोर’। बीना बर्धन ने ‘एहडे हुंदे मेरे हिमाचल च पतरोडू’। जीतराम सुमन ने ‘भीड़ भड़ाका बदीगा इतना, माणुवां री नी रई पच्छयाण’ पेश की।
शिवपाल गर्ग ने ‘कुछ लोग इस शहर में ऐसे भी रहते हैं, आंखों से जो सुनते हैं जो आंखों से कहते हैं’। सुरेंद्र मिन्हास ने ‘दित्या छंब फेरी लगे देखने समाण, सुजो नी बरखारी कितखा बी गाहण’।
सुशील पुंडीर ने ‘सावन की फुहार’ शीर्षक से रचना प्रस्तुत की जिसकी पंक्तियां थीं ‘सावन की फुहार बड़ी अच्छी लगती है, जब चारों तरफ हरियाली दिखती है, जिंदगी भी यूं खुशनुमा दिखती है’। हुसैन अली ने ‘नाशुकरे हैं हम कुदरत की मेहरबानी के लिए, तरसेंगे और रोएंगे एक-एक बूंद पानी के लिए’ सहित अन्य ने अपनी प्रस्तुतियां दी। अंत में जिला भाषा अधिकारी ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी साहित्यकारों का आभार करते हुए कहा कि विभाग का सदैव प्रयास रहता है कि साहित्यकारों, कवियों, कलाकारों को उचित मंच प्रदान हो और सभी को अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने का अवसर प्रदान करना हैं। इस अवसर पर इंद्र सिंह चंदेल, कांता देवी, अमर सिंह, नेहा देवी, नेहा कुमारी अभिषेक कुमार, रवि कुमार भी श्रोताओं के रूप में उपस्थित रहे।