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नई सोच और तकनीक के सहारे उगा रहे विदेशी फल ड्रैगन फ्रूट
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अनिल शर्मा
बिलासपुर। युवा सोच और तकनीक के सहारे कुछ नया करने के विचार ने युवा किसान की जिंदगी बदल दी। क्षेत्र के पिपलिया मिश्र गांव निवासी मनेंद्र सिंह ने दक्षिण व मध्य अमेरिका समेत कुछ अन्य विदेशों में होने वाले ड्रैगन फ्रूट को स्थानीय फल बना दिया। इसके लिए मनेंद्र सिंह को मेहनत भी काफी करनी पड़ी। ड्रैगन फ्रूट की पौध वो बंग्लुरु से हवाई जहाज के जरिए लेकर आए। इसके बाद इसकी खेती के लिए जरूरी रेतीली दोमट मिट्टी और समुचित जल निकासी की व्यवस्था भी की। आज मनेंद्र सिंह हर साल ड्रैगन फ्रूट की औसतन 14-15 लाख की खेती करते हैं। साथ ही उनकी ये सोच अन्य क्षेत्रीय किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रही है।
ऐसे की शुरुआत
बिलासपुर। मनेंद्र सिंह बताते हैं कि ड्रैगन फ्रूट की खेती मध्य अमेरिका, थाइलैंड, वियतनाम, इजराइल, श्रीलंका में होती है। करीब दो साल पहले उन्हें इस फल के भारत में भी कई स्थानों पर होने की जानकारी मिली तो उन्हें भी इसकी खेती में रूझान हुआ। इसके बाद उन्होंने इसके बारे में पूरी जानकारी जुटाई और बंग्लुरु से दिल्ली तक हवाई जहाज के माध्यम से और दिल्ली से सड़क मार्ग से करीब तीन हजार पौधे लेकर आए। इसके बाद अब वो खुद इसकी पौध तैयार कर लेते हैं।
ड्रैगन फ्रूट की खेती को चाहिए रेतीली दोमट मिट्टी
ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए रेतीली दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है। सूरज की भरपूर रोशनी इसके अधिक उत्पादन में सहायक होती है। खेत में खरपतवार नष्ट करने के बाद जुताई करके जैविक व कंपोस्ट खाद के साथ खेत तैयार कर लिया जाता है। खेत में लंबी-लंबी लाइनों पर डेढ़ मीटर चौड़ा व सात इंच ऊंचा सीमेंट का बैड बनाया जाता है। सभी बैड सात-सात फिट की दूरी पर बनाएं जाते हैं। एक एकड़ खेत में साढ़े चार सौ पोल लगते हैं। इसकी रोपाई फरवरी व मार्च और सितंबर व अक्तूबर में होती है। एक साल बाद जून व दिसंबर में फल आता है। पहली फसल कम होती है। एक पोल पर 15 से बीस किलो फल मिलते हैं। एक किलो पर तीन पीस चढ़ते हैं और बाजार में तीन सौ रुपये प्रति पीस बिकता है। उनका कहना है कि एक एकड़ में किसान का करीब साढ़े छह लाख रुपये खर्चा आता है और दूसरे साल से करीब 14 लाख रुपये की फसल दिल्ली, लखनऊ की मंडियों में बिकती है। उनका कहना है कि इस फल की स्थानीय मंडी न होने के कारण उन्हें फसल बाहर की मंडियों में ले जाने में परेशानी होती है। उनका कहना है कि यह फसल एक बार लगा ली जाए तो बीस साल तक फल देती रहती है।
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किस काम आता है ड्रैगन फ्रूट
ड्रैगन फ्रूट का प्रयोग शादी विवाह के अलावा जैम, आइसक्रीम, जैली, जूस आदि बनाने में भी किया जाता है। ड्रैगन फ्रूट का सेवन कैंसर, गठिया, पेट संबंधी विकारों, कोलस्ट्रोल आदि में कारगर साबित होता है। संवाद
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बिलासपुर। युवा सोच और तकनीक के सहारे कुछ नया करने के विचार ने युवा किसान की जिंदगी बदल दी। क्षेत्र के पिपलिया मिश्र गांव निवासी मनेंद्र सिंह ने दक्षिण व मध्य अमेरिका समेत कुछ अन्य विदेशों में होने वाले ड्रैगन फ्रूट को स्थानीय फल बना दिया। इसके लिए मनेंद्र सिंह को मेहनत भी काफी करनी पड़ी। ड्रैगन फ्रूट की पौध वो बंग्लुरु से हवाई जहाज के जरिए लेकर आए। इसके बाद इसकी खेती के लिए जरूरी रेतीली दोमट मिट्टी और समुचित जल निकासी की व्यवस्था भी की। आज मनेंद्र सिंह हर साल ड्रैगन फ्रूट की औसतन 14-15 लाख की खेती करते हैं। साथ ही उनकी ये सोच अन्य क्षेत्रीय किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रही है।
ऐसे की शुरुआत
बिलासपुर। मनेंद्र सिंह बताते हैं कि ड्रैगन फ्रूट की खेती मध्य अमेरिका, थाइलैंड, वियतनाम, इजराइल, श्रीलंका में होती है। करीब दो साल पहले उन्हें इस फल के भारत में भी कई स्थानों पर होने की जानकारी मिली तो उन्हें भी इसकी खेती में रूझान हुआ। इसके बाद उन्होंने इसके बारे में पूरी जानकारी जुटाई और बंग्लुरु से दिल्ली तक हवाई जहाज के माध्यम से और दिल्ली से सड़क मार्ग से करीब तीन हजार पौधे लेकर आए। इसके बाद अब वो खुद इसकी पौध तैयार कर लेते हैं।
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ड्रैगन फ्रूट की खेती को चाहिए रेतीली दोमट मिट्टी
ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए रेतीली दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है। सूरज की भरपूर रोशनी इसके अधिक उत्पादन में सहायक होती है। खेत में खरपतवार नष्ट करने के बाद जुताई करके जैविक व कंपोस्ट खाद के साथ खेत तैयार कर लिया जाता है। खेत में लंबी-लंबी लाइनों पर डेढ़ मीटर चौड़ा व सात इंच ऊंचा सीमेंट का बैड बनाया जाता है। सभी बैड सात-सात फिट की दूरी पर बनाएं जाते हैं। एक एकड़ खेत में साढ़े चार सौ पोल लगते हैं। इसकी रोपाई फरवरी व मार्च और सितंबर व अक्तूबर में होती है। एक साल बाद जून व दिसंबर में फल आता है। पहली फसल कम होती है। एक पोल पर 15 से बीस किलो फल मिलते हैं। एक किलो पर तीन पीस चढ़ते हैं और बाजार में तीन सौ रुपये प्रति पीस बिकता है। उनका कहना है कि एक एकड़ में किसान का करीब साढ़े छह लाख रुपये खर्चा आता है और दूसरे साल से करीब 14 लाख रुपये की फसल दिल्ली, लखनऊ की मंडियों में बिकती है। उनका कहना है कि इस फल की स्थानीय मंडी न होने के कारण उन्हें फसल बाहर की मंडियों में ले जाने में परेशानी होती है। उनका कहना है कि यह फसल एक बार लगा ली जाए तो बीस साल तक फल देती रहती है।
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किस काम आता है ड्रैगन फ्रूट
ड्रैगन फ्रूट का प्रयोग शादी विवाह के अलावा जैम, आइसक्रीम, जैली, जूस आदि बनाने में भी किया जाता है। ड्रैगन फ्रूट का सेवन कैंसर, गठिया, पेट संबंधी विकारों, कोलस्ट्रोल आदि में कारगर साबित होता है। संवाद