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Bilaspur News: कीरतपुर-नेरचौक परियोजना में चेनमैन की दो रिपोर्टों में अंतर
Thu, 23 Oct 2025 11:26 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Thu, 23 Oct 2025 11:26 PM IST
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चेनमैन की नियुक्ति अवधि को लेकर भी उठ रहे हैं सवाल
भूमि अधिग्रहण इकाई और लोनिवि की रिपोर्टों में विरोधाभास
फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति ने उठाई पारदर्शिता की मांग
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन परियोजना से जुड़ी भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में चेनमैन की नियुक्ति को लेकर दो विरोधाभासी रिपोर्ट सामने आई हैं, जिससे पूरे मामले पर ही सवाल उठने लगे हैं। आरटीआई से मिली सूचना के आधार पर यह खुलासा हुआ है कि भूमि अधिग्रहण की विशेष इकाई (मुख्यालय) और लोक निर्माण विभाग द्वारा जारी रिपोर्ट एक-दूसरे से मेल नहीं खा रहीं हैं।
भूमि अधिग्रहण की विशेष इकाई ने अपने मुख्यालय से दी गई सूचना में कहा है कि उक्त चेनमैन की नियुक्ति से संबंधित कोई रिकॉर्ड उनके कार्यालय में उपलब्ध नहीं है। जबकि उसी इकाई द्वारा उपायुक्त बिलासपुर को भेजी गई एक अन्य रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि वर्ष 2010-11 में लोक निर्माण विभाग, मंडल बिलासपुर के तीन बेलदारों ने बतौर चेनमैन भूमि अधिग्रहण कार्यालय में उपस्थिति दर्ज करवाई थी। फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति के महासचिव मदन लाल शर्मा ने कहा कि दोनों रिपोर्ट एक ही विषय पर हैं, लेकिन इनके बीच का विरोधाभास यह संकेत देता है कि या तो किसी स्तर पर रिकॉर्ड का संधारण ठीक से नहीं किया गया या फिर तैनाती की प्रक्रिया में कुछ अनियमितताएं हुईं। बताया कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया अप्रैल 2012 में शुरू हुई थी। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू ही नहीं हुई थी, तो दो वर्ष पहले यानी 2010-11 में इन चेनमैन को भूमि अधिग्रहण कार्यालय में क्यों और कैसे तैनात किया गया। इन दो वर्ष के दौरान इन तीनों चेनमैन से क्या कार्य करवाए गए, इसका भी रिकॉर्ड स्पष्ट नहीं है।
इसके अलावा वर्ष 2011 में लोक निर्माण विभाग द्वारा की गई कार्रवाई में तीन चेनमैन की नियुक्ति की पुष्टि दर्ज की गई है। अब यह भी जांच का विषय है कि क्या इन तीनों चेनमैन को बाद में विभाग में वापस भेजा गया, या वे भूमि अधिग्रहण कार्यालय में ही बने रहे या फिर सेवानिवृत्त हो गए। 2010 में एनएचएआई के प्रधान कार्यालय ने राज्य सरकार के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर कीरतपुर-नेरचौक परियोजना के प्लान-दो के तहत सहयोग की मांग की थी। इस पत्र में भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया के लिए कुल 14 अधिकारियों और कर्मचारियों की तैनाती का प्रस्ताव भेजा गया था, जिसमें चेनमैन, पटवारी, कानूनगो, और तहसीलदार जैसे पद शामिल थे।
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महासचिव ने कहा कि इस विरोधाभास से यह स्पष्ट होता है कि भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया से जुड़ी फाइलों में तथ्यों की स्थिति पारदर्शी नहीं है। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि इस पूरे मामले की विभागीय जांच करवाई जाए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि चेनमैन की नियुक्ति कब और किन परिस्थितियों में की गई, और क्या उनके माध्यम से कोई वास्तविक कार्य भूमि अधिग्रहण इकाई द्वारा करवाया गया था। कहा कि फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति इस मामले को आगे संबंधित विभागों और सरकार के समक्ष भी उठाएगी, ताकि अधिग्रहण प्रक्रिया की प्रत्येक कड़ी को स्पष्ट किया जा सके और भविष्य में ऐसी विसंगतियां दोबारा न हों।
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भूमि अधिग्रहण इकाई और लोनिवि की रिपोर्टों में विरोधाभास
फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति ने उठाई पारदर्शिता की मांग
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन परियोजना से जुड़ी भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में चेनमैन की नियुक्ति को लेकर दो विरोधाभासी रिपोर्ट सामने आई हैं, जिससे पूरे मामले पर ही सवाल उठने लगे हैं। आरटीआई से मिली सूचना के आधार पर यह खुलासा हुआ है कि भूमि अधिग्रहण की विशेष इकाई (मुख्यालय) और लोक निर्माण विभाग द्वारा जारी रिपोर्ट एक-दूसरे से मेल नहीं खा रहीं हैं।
भूमि अधिग्रहण की विशेष इकाई ने अपने मुख्यालय से दी गई सूचना में कहा है कि उक्त चेनमैन की नियुक्ति से संबंधित कोई रिकॉर्ड उनके कार्यालय में उपलब्ध नहीं है। जबकि उसी इकाई द्वारा उपायुक्त बिलासपुर को भेजी गई एक अन्य रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि वर्ष 2010-11 में लोक निर्माण विभाग, मंडल बिलासपुर के तीन बेलदारों ने बतौर चेनमैन भूमि अधिग्रहण कार्यालय में उपस्थिति दर्ज करवाई थी। फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति के महासचिव मदन लाल शर्मा ने कहा कि दोनों रिपोर्ट एक ही विषय पर हैं, लेकिन इनके बीच का विरोधाभास यह संकेत देता है कि या तो किसी स्तर पर रिकॉर्ड का संधारण ठीक से नहीं किया गया या फिर तैनाती की प्रक्रिया में कुछ अनियमितताएं हुईं। बताया कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया अप्रैल 2012 में शुरू हुई थी। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू ही नहीं हुई थी, तो दो वर्ष पहले यानी 2010-11 में इन चेनमैन को भूमि अधिग्रहण कार्यालय में क्यों और कैसे तैनात किया गया। इन दो वर्ष के दौरान इन तीनों चेनमैन से क्या कार्य करवाए गए, इसका भी रिकॉर्ड स्पष्ट नहीं है।
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इसके अलावा वर्ष 2011 में लोक निर्माण विभाग द्वारा की गई कार्रवाई में तीन चेनमैन की नियुक्ति की पुष्टि दर्ज की गई है। अब यह भी जांच का विषय है कि क्या इन तीनों चेनमैन को बाद में विभाग में वापस भेजा गया, या वे भूमि अधिग्रहण कार्यालय में ही बने रहे या फिर सेवानिवृत्त हो गए। 2010 में एनएचएआई के प्रधान कार्यालय ने राज्य सरकार के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर कीरतपुर-नेरचौक परियोजना के प्लान-दो के तहत सहयोग की मांग की थी। इस पत्र में भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया के लिए कुल 14 अधिकारियों और कर्मचारियों की तैनाती का प्रस्ताव भेजा गया था, जिसमें चेनमैन, पटवारी, कानूनगो, और तहसीलदार जैसे पद शामिल थे।
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महासचिव ने कहा कि इस विरोधाभास से यह स्पष्ट होता है कि भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया से जुड़ी फाइलों में तथ्यों की स्थिति पारदर्शी नहीं है। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि इस पूरे मामले की विभागीय जांच करवाई जाए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि चेनमैन की नियुक्ति कब और किन परिस्थितियों में की गई, और क्या उनके माध्यम से कोई वास्तविक कार्य भूमि अधिग्रहण इकाई द्वारा करवाया गया था। कहा कि फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति इस मामले को आगे संबंधित विभागों और सरकार के समक्ष भी उठाएगी, ताकि अधिग्रहण प्रक्रिया की प्रत्येक कड़ी को स्पष्ट किया जा सके और भविष्य में ऐसी विसंगतियां दोबारा न हों।