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Bilaspur News: बाघ शिकार मामले में दोबारा तय होंगे आरोप, निचली अदालत का फैसला रद्द
Wed, 10 Jun 2026 10:29 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Wed, 10 Jun 2026 10:29 PM IST
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एक्सक्लूसिव
2008 में स्वारघाट में पुलिस ने बरामद किए थे बाघ के आठ पंजे, दो खाल
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत ने मामले में सुनाया फैसला
कहा, आरोप तय करने के शुरुआती चरण में मिनी ट्रायल करना कानूनी रूप से गलत
देहरादून वन्यजीव संस्थान की डीएनए रिपोर्ट, नैनीताल के जंगलों से बरामद लोहे की कड़ाही बनेगी मुकदमे का आधार
सरोज पाठक
बिलासपुर। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत दर्ज बाघ के शिकार और उसकी खाल व अंगों की तस्करी से जुड़े एक बेहद गंभीर मामले में निचली अदालत के फैसले को पलट दिया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश नवीश भारद्वाज की अदालत ने राज्य सरकार द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए निचली अदालत के उस आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया है, जिसके तहत एक मुख्य आरोपी को केस से आरोप मुक्त कर दिया गया था।
विशेष अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि आरोप तय करने के शुरुआती चरण में ही निचली अदालत ने गवाहों और सबूतों का एक तरह से मिनी ट्रायल यानी समय से पहले मुकदमा शुरू कर दिया था, जिसकी कानूनन बिल्कुल भी इजाजत नहीं है। अदालत ने मामले को वापस निचली अदालत को भेजते हुए निर्देश दिया है कि रिकॉर्ड पर मौजूद पुख्ता और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर कानून के मुताबिक आरोपी के खिलाफ दोबारा आरोप तय करने की प्रक्रिया शुरू की जाए। अदालत ने सभी पक्षों को आगामी 22 जून को संबंधित ट्रायल कोर्ट के समक्ष निजी तौर पर पेश होने के आदेश जारी किए हैं।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह संवेदनशील मामला वर्ष 2008 का है। 20 जुलाई 2008 को तड़के करीब 12:45 बजे पुलिस की एक टीम स्वारघाट चौक के पास रूटीन ट्रैफिक चेकिंग पर थी। इसी दौरान बिलासपुर की तरफ से आ रही एक कार को जांच के लिए रोका गया। कार में दो लोग सवार थे जिन्हें बाद में अदालत द्वारा घोषित अपराधी/पीओ करार दिया जा चुका है। एक स्वतंत्र गवाह की मौजूदगी में जब कार की गहन तलाशी ली गई, तो कार के भीतर से एक बोरी बरामद हुई, जो जानवरों की हड्डियों से भरी थी। इसके अलावा एक लाल रंग के बैग से वन्यजीव के आठ पंजे और दो बाहरी खालें बरामद की गईं। पुलिस ने तुरंत मामला दर्ज कर वन्यजीवों के अंगों को कब्जे में ले लिया। मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच के दौरान इन अंगों और खाल के सैंपल भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून भेजे गए। वहां हुए वैज्ञानिक डीएनए विश्लेषण में यह पुष्टि हुई कि बरामद अवशेष किसी आम जानवर के नहीं, बल्कि एक बाघ के थे।
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बाघ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के तहत सर्वोच्च सुरक्षा प्राप्त और पूरी तरह से प्रतिबंधित लुप्तप्राय प्रजाति है। गिरफ्तारी के बाद जब कार सवार सह-आरोपियों से पुलिस ने कड़ाई से पूछताछ की, तो उन्होंने वन्यजीवों के अंगों के मुख्य सप्लायर का भंडाफोड़ किया और एक मोबाइल नंबर पुलिस को सौंपा। पुलिस ने जब इस नंबर के कॉल डिटेल रिकॉर्ड और उपभोक्ता पहचान की जांच की, तो कड़ियां उत्तराखंड के नैनीताल जिले से जुड़ीं, जिसके बाद तीसरे आरोपी को 27 अगस्त 2008 को गिरफ्तार किया गया। पुलिस हिरासत के दौरान उक्त आरोपी ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत एक महत्वपूर्ण खुलासा बयान दर्ज कराया। आरोपी की निशानदेही पर पुलिस ने उत्तराखंड के नैनीताल स्थित चांदनी जंगल के भीतर से बाघों को फंसाने और उनका शिकार करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक भारी-भरकम लोहे का शिकारी जाल बरामद किया। पुलिस ने अपनी चार्जशीट में दावा किया था कि इसी जाल की मदद से आरोपी ने दो बाघों को मौत के घाट उतारा था। इस मामले में फरवरी 2021 को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी बिलासपुर की अदालत ने आरोपी को यह कहते हुए आरोप मुक्त कर दिया था कि उसके खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई पुख्ता सबूत नहीं है। निचली अदालत का तर्क था कि सह-आरोपियों ने पूछताछ में केवल एक मोबाइल नंबर साझा किया था, लेकिन सीधे तौर पर इस आरोपी का नाम नहीं लिया था। इसके अलावा निचली अदालत ने अपने आदेश में यह भी अजीबोगरीब टिप्पणी की थी कि आरोपी अनपढ़ है और उसने अपनी गिरफ्तारी रिपोर्ट तथा बेल बॉन्ड पर अंगूठे का निशान लगाया है, जबकि पुलिस द्वारा तैयार जब्ती मेमो पर कुछ लिखित हस्ताक्षर मौजूद थे, जिन्हें आरोपी ने खुली अदालत में अपना मानने से साफ इनकार कर दिया था। इसी को आधार बनाकर निचली अदालत ने उसे केस से बाहर कर दिया था। संवाद
इनसेट
अदालत का फैसला, आरोप तय करने के लिए गहरा संदेह ही पर्याप्त
राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश नवीश भारद्वाज की अदालत ने निचली अदालत के इस रवैये को पूरी तरह गलत और कानून के सिद्धांतों के विपरीत पाया। अदालत ने कहा कि जब्ती मेमो पर हस्ताक्षर असली हैं या उनमें कोई हेरफेर हुई है, यह पूरी तरह से एक विस्तृत ट्रायल का विषय है। आरोपी के मुकर जाने मात्र से इसे शुरुआती चरण में ही सच नहीं माना जा सकता। कहा कि निचली अदालत ने आरोपी के कब्जे/निशानदेही से बरामद हुए लोहे के शिकारी पिंजरे और कॉल डिटेल रिकॉर्ड जैसे बेहद संवेदनशील, स्वतंत्र और वैज्ञानिक साक्ष्यों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया, जो कि आरोपी की संलिप्तता की ओर साफ इशारा करते हैं। इस चरण पर न्यायाधीश को सबूतों को तराजू में तोलकर यह नहीं देखना होता कि सजा होगी या नहीं। इन तमाम टिप्पणियों के साथ विशेष अदालत ने निचली अदालत के आदेश को निरस्त कर वन्यजीव तस्करी के इस मामले में दोबारा कानूनी प्रक्रिया शुरू करने के आदेश दिए हैं।
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2008 में स्वारघाट में पुलिस ने बरामद किए थे बाघ के आठ पंजे, दो खाल
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत ने मामले में सुनाया फैसला
कहा, आरोप तय करने के शुरुआती चरण में मिनी ट्रायल करना कानूनी रूप से गलत
देहरादून वन्यजीव संस्थान की डीएनए रिपोर्ट, नैनीताल के जंगलों से बरामद लोहे की कड़ाही बनेगी मुकदमे का आधार
सरोज पाठक
बिलासपुर। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत दर्ज बाघ के शिकार और उसकी खाल व अंगों की तस्करी से जुड़े एक बेहद गंभीर मामले में निचली अदालत के फैसले को पलट दिया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश नवीश भारद्वाज की अदालत ने राज्य सरकार द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए निचली अदालत के उस आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया है, जिसके तहत एक मुख्य आरोपी को केस से आरोप मुक्त कर दिया गया था।
विशेष अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि आरोप तय करने के शुरुआती चरण में ही निचली अदालत ने गवाहों और सबूतों का एक तरह से मिनी ट्रायल यानी समय से पहले मुकदमा शुरू कर दिया था, जिसकी कानूनन बिल्कुल भी इजाजत नहीं है। अदालत ने मामले को वापस निचली अदालत को भेजते हुए निर्देश दिया है कि रिकॉर्ड पर मौजूद पुख्ता और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर कानून के मुताबिक आरोपी के खिलाफ दोबारा आरोप तय करने की प्रक्रिया शुरू की जाए। अदालत ने सभी पक्षों को आगामी 22 जून को संबंधित ट्रायल कोर्ट के समक्ष निजी तौर पर पेश होने के आदेश जारी किए हैं।
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अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह संवेदनशील मामला वर्ष 2008 का है। 20 जुलाई 2008 को तड़के करीब 12:45 बजे पुलिस की एक टीम स्वारघाट चौक के पास रूटीन ट्रैफिक चेकिंग पर थी। इसी दौरान बिलासपुर की तरफ से आ रही एक कार को जांच के लिए रोका गया। कार में दो लोग सवार थे जिन्हें बाद में अदालत द्वारा घोषित अपराधी/पीओ करार दिया जा चुका है। एक स्वतंत्र गवाह की मौजूदगी में जब कार की गहन तलाशी ली गई, तो कार के भीतर से एक बोरी बरामद हुई, जो जानवरों की हड्डियों से भरी थी। इसके अलावा एक लाल रंग के बैग से वन्यजीव के आठ पंजे और दो बाहरी खालें बरामद की गईं। पुलिस ने तुरंत मामला दर्ज कर वन्यजीवों के अंगों को कब्जे में ले लिया। मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच के दौरान इन अंगों और खाल के सैंपल भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून भेजे गए। वहां हुए वैज्ञानिक डीएनए विश्लेषण में यह पुष्टि हुई कि बरामद अवशेष किसी आम जानवर के नहीं, बल्कि एक बाघ के थे।
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बाघ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के तहत सर्वोच्च सुरक्षा प्राप्त और पूरी तरह से प्रतिबंधित लुप्तप्राय प्रजाति है। गिरफ्तारी के बाद जब कार सवार सह-आरोपियों से पुलिस ने कड़ाई से पूछताछ की, तो उन्होंने वन्यजीवों के अंगों के मुख्य सप्लायर का भंडाफोड़ किया और एक मोबाइल नंबर पुलिस को सौंपा। पुलिस ने जब इस नंबर के कॉल डिटेल रिकॉर्ड और उपभोक्ता पहचान की जांच की, तो कड़ियां उत्तराखंड के नैनीताल जिले से जुड़ीं, जिसके बाद तीसरे आरोपी को 27 अगस्त 2008 को गिरफ्तार किया गया। पुलिस हिरासत के दौरान उक्त आरोपी ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत एक महत्वपूर्ण खुलासा बयान दर्ज कराया। आरोपी की निशानदेही पर पुलिस ने उत्तराखंड के नैनीताल स्थित चांदनी जंगल के भीतर से बाघों को फंसाने और उनका शिकार करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक भारी-भरकम लोहे का शिकारी जाल बरामद किया। पुलिस ने अपनी चार्जशीट में दावा किया था कि इसी जाल की मदद से आरोपी ने दो बाघों को मौत के घाट उतारा था। इस मामले में फरवरी 2021 को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी बिलासपुर की अदालत ने आरोपी को यह कहते हुए आरोप मुक्त कर दिया था कि उसके खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई पुख्ता सबूत नहीं है। निचली अदालत का तर्क था कि सह-आरोपियों ने पूछताछ में केवल एक मोबाइल नंबर साझा किया था, लेकिन सीधे तौर पर इस आरोपी का नाम नहीं लिया था। इसके अलावा निचली अदालत ने अपने आदेश में यह भी अजीबोगरीब टिप्पणी की थी कि आरोपी अनपढ़ है और उसने अपनी गिरफ्तारी रिपोर्ट तथा बेल बॉन्ड पर अंगूठे का निशान लगाया है, जबकि पुलिस द्वारा तैयार जब्ती मेमो पर कुछ लिखित हस्ताक्षर मौजूद थे, जिन्हें आरोपी ने खुली अदालत में अपना मानने से साफ इनकार कर दिया था। इसी को आधार बनाकर निचली अदालत ने उसे केस से बाहर कर दिया था। संवाद
इनसेट
अदालत का फैसला, आरोप तय करने के लिए गहरा संदेह ही पर्याप्त
राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश नवीश भारद्वाज की अदालत ने निचली अदालत के इस रवैये को पूरी तरह गलत और कानून के सिद्धांतों के विपरीत पाया। अदालत ने कहा कि जब्ती मेमो पर हस्ताक्षर असली हैं या उनमें कोई हेरफेर हुई है, यह पूरी तरह से एक विस्तृत ट्रायल का विषय है। आरोपी के मुकर जाने मात्र से इसे शुरुआती चरण में ही सच नहीं माना जा सकता। कहा कि निचली अदालत ने आरोपी के कब्जे/निशानदेही से बरामद हुए लोहे के शिकारी पिंजरे और कॉल डिटेल रिकॉर्ड जैसे बेहद संवेदनशील, स्वतंत्र और वैज्ञानिक साक्ष्यों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया, जो कि आरोपी की संलिप्तता की ओर साफ इशारा करते हैं। इस चरण पर न्यायाधीश को सबूतों को तराजू में तोलकर यह नहीं देखना होता कि सजा होगी या नहीं। इन तमाम टिप्पणियों के साथ विशेष अदालत ने निचली अदालत के आदेश को निरस्त कर वन्यजीव तस्करी के इस मामले में दोबारा कानूनी प्रक्रिया शुरू करने के आदेश दिए हैं।