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Bilaspur News: शराब के नशे में महिला पुलिसकर्मी से बदतमीजी मामले में आरोपी बरी
Wed, 10 Dec 2025 11:26 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Wed, 10 Dec 2025 11:26 PM IST
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अदालत से
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश घुमारवीं ने रद्द किया निचली अदालत का फैसला
गवाह मुकरे, महिला पुलिसकर्मी के बयानों में भी मिला विरोधाभास
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश घुमारवीं की अदालत ने अहम फैसला सुनाते हुए वर्ष 2013 के उस मामले में आरोपी को पूरी तरह से बरी कर दिया, जिसमें उसे निचली अदालत ने दोषी ठहराते हुए 510 रुपये का जुर्माना लगाया था। अदालत ने निचली अदालत के फैसले को रद्द कर आरोपी को राहत दी है।
मामला 25 जुलाई 2013 का है, जब ट्रैफिक ड्यूटी पर तैनात महिला कांस्टेबल ने आरोप लगाया था कि शाम करीब सवा छह बजे नशे में धुत आरोपी उनके पास आ खड़ा हुआ, ड्यूटी में बाधा डाली, धक्का-मुक्की की और लात मारने की कोशिश की। शिकायत पर एफआईआर दर्ज हुई और जांच के बाद चालान पेश किया गया था। निचली अदालत ने 22 अप्रैल 2022 को फैसला सुनाते हुए आरोपी को ड्यूटी के दौरान पुलिसकर्मी पर बल प्रयोग करने के मामले में बरी कर दिया था, लेकिन धारा लोक सेवक के कर्तव्य निर्वहन में बाधा डालने, नशे में सार्वजनिक स्थान पर उपद्रव करने के लिए उसे दोषी ठहराया और 500 रुपये व 10 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले के खिलाफ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश घुमारवीं की अदालत में अपील दायर की। अपील की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि घटना के सभी स्वतंत्र गवाह मुकर गए और मुकदमा चलाने वाली महिला कांस्टेबल की गवाही में विरोधाभास है। निचली अदालत ने बिना चार्ज फ्रेम किए ही सजा सुनाई, जो कानूनन गलत है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने रिकॉर्ड का गहन अध्ययन करने के बाद पाया कि घटना के सभी स्वतंत्र गवाह मुकर गए। महिला कांस्टेबल की गवाही में एफआईआर और कोर्ट में दिए बयान में भारी विरोधाभास मिले, सिर्फ आरोपी के खून में शराब मिलने से यह साबित नहीं होता कि उसने लोकसेवक के कर्तव्य में बाधा डाली या सार्वजनिक उपद्रव किया। धारा 353 से बरी होने के बाद शेष धाराओं में भी दोष सिद्ध नहीं हुआ। इन आधारों पर अदालत ने याची की अपील स्वीकार कर ली और निचली अदालत का दोष सिद्ध होने का फैसला व सजा का आदेश निरस्त करते हुए आरोपी को दोनों धाराओं से बरी कर दिया।
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अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश घुमारवीं ने रद्द किया निचली अदालत का फैसला
गवाह मुकरे, महिला पुलिसकर्मी के बयानों में भी मिला विरोधाभास
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश घुमारवीं की अदालत ने अहम फैसला सुनाते हुए वर्ष 2013 के उस मामले में आरोपी को पूरी तरह से बरी कर दिया, जिसमें उसे निचली अदालत ने दोषी ठहराते हुए 510 रुपये का जुर्माना लगाया था। अदालत ने निचली अदालत के फैसले को रद्द कर आरोपी को राहत दी है।
मामला 25 जुलाई 2013 का है, जब ट्रैफिक ड्यूटी पर तैनात महिला कांस्टेबल ने आरोप लगाया था कि शाम करीब सवा छह बजे नशे में धुत आरोपी उनके पास आ खड़ा हुआ, ड्यूटी में बाधा डाली, धक्का-मुक्की की और लात मारने की कोशिश की। शिकायत पर एफआईआर दर्ज हुई और जांच के बाद चालान पेश किया गया था। निचली अदालत ने 22 अप्रैल 2022 को फैसला सुनाते हुए आरोपी को ड्यूटी के दौरान पुलिसकर्मी पर बल प्रयोग करने के मामले में बरी कर दिया था, लेकिन धारा लोक सेवक के कर्तव्य निर्वहन में बाधा डालने, नशे में सार्वजनिक स्थान पर उपद्रव करने के लिए उसे दोषी ठहराया और 500 रुपये व 10 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले के खिलाफ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश घुमारवीं की अदालत में अपील दायर की। अपील की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि घटना के सभी स्वतंत्र गवाह मुकर गए और मुकदमा चलाने वाली महिला कांस्टेबल की गवाही में विरोधाभास है। निचली अदालत ने बिना चार्ज फ्रेम किए ही सजा सुनाई, जो कानूनन गलत है।
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अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने रिकॉर्ड का गहन अध्ययन करने के बाद पाया कि घटना के सभी स्वतंत्र गवाह मुकर गए। महिला कांस्टेबल की गवाही में एफआईआर और कोर्ट में दिए बयान में भारी विरोधाभास मिले, सिर्फ आरोपी के खून में शराब मिलने से यह साबित नहीं होता कि उसने लोकसेवक के कर्तव्य में बाधा डाली या सार्वजनिक उपद्रव किया। धारा 353 से बरी होने के बाद शेष धाराओं में भी दोष सिद्ध नहीं हुआ। इन आधारों पर अदालत ने याची की अपील स्वीकार कर ली और निचली अदालत का दोष सिद्ध होने का फैसला व सजा का आदेश निरस्त करते हुए आरोपी को दोनों धाराओं से बरी कर दिया।
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