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Bilaspur News: मनुष्य को सामर्थ्य के अनुरूप दानकर यह पुण्य कमाना चाहिए

Fri, 24 Nov 2023 05:03 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Fri, 24 Nov 2023 05:03 PM IST
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A man should earn this virtue by donating as per his capacity.
मनुष्य को अपनी सामर्थ्य के अनुरूप दान देकर यह पुण्य कमाना चाहिए
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-निस्वार्थ भाव से दान करने वालों के पास भगवान स्वयं आते हैं


संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। दान सर्वश्रेष्ठ पुण्य है। मनुष्य को अपनी सामर्थ्य के अनुरूप दान देकर यह पुण्य कमाना चाहिए, लेकिन उसका ढिंढोरा नहीं पीटना चाहिए। दान ऐसा हो कि यदि दाएं हाथ से दें तो बाएं हाथ को भी इसका पता नहीं चले। निस्वार्थ भाव से दान करने वालों के पास भगवान स्वयं आते हैं।
नंद और यशोदा पूर्व जन्म में दानी ब्राह्मण थे। भगवान श्रीकृष्ण ने वासुदेव और देवकी के घर जन्म लिया था, लेकिन वह पुत्र बनकर नंद और यशोदा के घर पहुंच गए। यह उद्गार कथा व्यास आचार्य जीवानंद शैल ने दनोह-कुनाला स्थित गोपाल मंदिर में चल रहे श्रीमद् भागवत कथा सप्ताह में शुक्रवार को पांचवें दिन प्रवचनों के दौरान प्रकट किए। श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन करते हुए आचार्य शैल ने कहा कि भगवान ने जन्म के समय से ही लीलाएं दिखानी शुरू कर दी थीं। उन्होंने कंस के कारागार में जन्म लिया था। जन्म होते ही कारावास के दरवाजे खुल गए और प्रहरी गहरी नींद में सो गए। वासुदेव के हाथ-पैरों की बेड़ियां भी टूट गईं। आकाशवाणी के अनुसार उन्होंने बाल गोपाल को नंद के घर पहुंचाया और वहां से नंद की नवजात कन्या लेकर फिर से कंस के कारावास में पहुंच गए। वहां पहुंचने पर उनके हाथों में फिर से बेड़ियां पड़ गई। यह श्रीकृष्ण की पहली अद्भुत लीला थी।
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श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं को आगे बढ़ाते हुए आचार्य शैल ने कहा कि यमुना नदी पर कालिया नाग ने कब्जा कर लिया था। उसके विष के प्रभाव से यमुना काली पड़ गई थी। एक बार खेलते हुए गेंद यमुना में चली गई। कान्हा गेंद को लाने के लिए यमुना में कूद पड़े। बाल्यकाल में ही उन्होंने कालिया नाग को सबक सिखाया, जिससे वह उनके आगे नतमस्तक हो गया। कंस ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए पूतना राक्षसी को भेजा। भेष बदलकर आई पूतना अपने वक्षों पर विष लगाकर कान्हा को स्तनपान करवाने लगी। श्रीकृष्ण ने वक्ष से ही उसके प्राण खींच लिए। इसी तरह एक बार इंद्रदेव ने अहंकार में आकर गोकुल में इतनी बारिश कर दी कि वहां प्रलय जैसे हालात पैदा हो गए। गोकुल वासियों की रक्षा करने के लिए श्रीकृष्ण ने छोटी सी आयु में गोवर्धन पर्वत को उंगली पर उठा लिया। ऐसा करके उन्होंने इंद्रदेव का अहंकार भी चूर किया।
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