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‘सांप भागकर निकल गए, जब आदमी आदमी को काटने लगे’
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बिलासपुर। भाषा एवं संस्कृति विभाग कार्यालय बिलासपुर की ओर से संस्कृति भवन के बैठक कक्ष में मासिक साहित्यिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता जिला भाषा अधिकारी नीलम चंदेल ने की।
कार्यक्रम के आरंभ में जीत राम सुमन द्वारा ‘मां सरस्वती’ की वंदना प्रस्तुत की गई। इसके बाद अरुण डोगरा ने रचना प्रस्तुत की जिसकी पंक्तियां थीं ‘दिन प्रतिदिन आकाश में मंडराते गिद्ध यही कर रहे हैं सिद्ध, जरूर कहीं लहू बिखरा होगा’। जीतराम सुमन की रचना का शीर्षक था ‘दुनिया के रिश्ते अजीब हो गए’। डॉ. अनेक राम सांख्यान ने ‘बफादार इतना बदनाम क्यों होता है कि जिसका मन करे कह दे कुत्ता है’ और एसआर आजाद ने ‘किसरी-किसरी गल करिए भई कुण-कुण इत्थी ऊत हुई गया’।
सुरेंद्र मिन्हास ने ‘हुनकी नुलाड़ी’ शीर्षक से रचना प्रस्तुत की। उन्होंने फरमाया कि ‘गेटा टपी देख्या मजमां भारी’ और रविंद्र भट्टा ने ‘बिना जल की मछली सी फड़फड़ाती रही दो दिनों में ही सिकुड़कर कर हाफ हो गई’ पेश की। इसके अलावा प्रदीप गुप्ता ने ‘कन्या भ्रूण का चीत्कार’ शीर्षक से रचना प्रस्तुत की। उन्होंने कहाकि ‘मां मैं भी आना चाहती हूं पृथ्वी पर जीवन की किलकारियों की तरह’। जबकि गौरव शर्मा ने ‘आज के आदमी की कहानी’ शीर्षक से रचना प्रस्तुत की। उन्होंने कहाकि ‘सांप भागकर निकल गए जब आदमी आदमी को काटने लगे’। वहीं हेमा ठाकुर ने ‘अंतराल तेरी यही कहानी’ शीर्षक से रचना प्रस्तुत की।
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इस अवसर पर जिला भाषा अधिकारी ने सभी साहित्यकारों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि कवि और लेखक समाज को सकारात्मकता का भाव देते हैं जिससें समाज में संस्कृति संस्कार व नैतिक मूल्यों का समावेश होता है।
कार्यक्रम के आरंभ में जीत राम सुमन द्वारा ‘मां सरस्वती’ की वंदना प्रस्तुत की गई। इसके बाद अरुण डोगरा ने रचना प्रस्तुत की जिसकी पंक्तियां थीं ‘दिन प्रतिदिन आकाश में मंडराते गिद्ध यही कर रहे हैं सिद्ध, जरूर कहीं लहू बिखरा होगा’। जीतराम सुमन की रचना का शीर्षक था ‘दुनिया के रिश्ते अजीब हो गए’। डॉ. अनेक राम सांख्यान ने ‘बफादार इतना बदनाम क्यों होता है कि जिसका मन करे कह दे कुत्ता है’ और एसआर आजाद ने ‘किसरी-किसरी गल करिए भई कुण-कुण इत्थी ऊत हुई गया’।
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सुरेंद्र मिन्हास ने ‘हुनकी नुलाड़ी’ शीर्षक से रचना प्रस्तुत की। उन्होंने फरमाया कि ‘गेटा टपी देख्या मजमां भारी’ और रविंद्र भट्टा ने ‘बिना जल की मछली सी फड़फड़ाती रही दो दिनों में ही सिकुड़कर कर हाफ हो गई’ पेश की। इसके अलावा प्रदीप गुप्ता ने ‘कन्या भ्रूण का चीत्कार’ शीर्षक से रचना प्रस्तुत की। उन्होंने कहाकि ‘मां मैं भी आना चाहती हूं पृथ्वी पर जीवन की किलकारियों की तरह’। जबकि गौरव शर्मा ने ‘आज के आदमी की कहानी’ शीर्षक से रचना प्रस्तुत की। उन्होंने कहाकि ‘सांप भागकर निकल गए जब आदमी आदमी को काटने लगे’। वहीं हेमा ठाकुर ने ‘अंतराल तेरी यही कहानी’ शीर्षक से रचना प्रस्तुत की।
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इस अवसर पर जिला भाषा अधिकारी ने सभी साहित्यकारों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि कवि और लेखक समाज को सकारात्मकता का भाव देते हैं जिससें समाज में संस्कृति संस्कार व नैतिक मूल्यों का समावेश होता है।