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सरस मेले में भा रही लाहौल की जुराबें और मफलर

Wed, 20 Mar 2019 11:02 PM IST
Devender Devender Kumar Kumar
Updated Wed, 20 Mar 2019 11:02 PM IST
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सरस मेले में भा रही लाहौल की जुराबें और मफलर
अमर उजाला ब्यूरो
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बिलासपुर। इसे हिमाचल के दुर्गम जिला की महिलाओं का जजबा ही कहेेंगे कि सभी महिलाएं एक साथ घरेलू उत्पादों को तैयार कर दिल्ली, इलाहाबाद, आंध्रप्रदेश, चित्रकुट, पुडूचेरी पहुंच कर इन्हें बेच रही हैं। बिलासपुर सरस मेले में पहुंची लाहौल में लेडी ऑफ केलांग के नाम से बनी एनजीओ की सदस्य आशा का कहना है कि वह पहली बार लाहौल से बाहर आई हैं और उन्हें बेहतर महसूस हो रहा है।
आशा का कहना है कि लाहौल की सभी घरों की महिलाएं इस एनजीओ से जुड़ी हुई हैं जोकि विभिन्न तरह के उत्पाद तैयार कर रहे हैं। वह किसी भी तरह की कोई मदद किसी से नहीं लेती, जबकि भेड़ से ऊन निकालने से लेकर धागा बनाने तक का कार्य भी वह स्वयं ही करते हैं। सुबह वह चरखे पर बैठक कर भेड़ की ऊन से धागा तैयार करने का कार्य करती हैं, जबकि रात को जब समय लगे वह हाथों से बुनाई करती हैं, जबकि खड्डी में भी ऊनी वस्त्र तैयार करती हैं। आशा का कहना है कि लाहौल की सबसे ज्यादा प्रसिद्ध उत्पाद ऊन की जुराबें हैं, यह जुराबें स्वयं तैयार की जाती है। बर्फ में इन्हें पहनकर आसानी से बचा जा सकता है।
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इतना ही नहीं लाहौल से सरस मेले में पहुंची आशा का कहना है कि यहां की महिलाओं को ज्यादा बाहर जाने की इजाजत नहीं है। शायद इस वजह से भी यहां की महिलाएं ज्यादा बाहर नहीं निकल पाती जिससे इनके उत्पादों को ज्यादा तवज्जो नहीं मिल पाती। इससे पहले कभी उन्होंने सरस मेला नहीं लगाया है। वह बिलासपुर में आयोजित होने वाले सरस मेले में पहली बार आए हैं। इसके अलावा महिलाओं ने बनाए हुए उत्पादों पहाड़ी टोपी, मफलर, गर्म दस्ताने, शॉल सहित महिलाओं के अन्य उत्पाद लोगों को भा रहे हैं।
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इनसेट....
स्पेशल बुलावे पर एनजीओ की महिलाएं जाती हैं बाहर
आशा का कहना है कि कई बार उनकी एनजीओ को स्पेशल बुलावा भी आता है जिसमें वह महिलाओं द्वारा तैयार किए गए उत्पादों को बेचने के लिए राज्य से बाहर भी जाते हैं। वह दिल्ली सहित आंध्रप्रदेश व अन्य राज्यों में भी अपने उत्पादों की प्रदर्शनी लगा चुके हैं। जहां पर लोग इन्हें खासा पसंद करते हैं लेकिन मेहनत के अनुसार महिलाओं को उस तरह इनका दाम नहीं मिल पाता।
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