{"_id":"691a1d9e9f2671997a0097e8","slug":"yoga-is-an-important-part-of-indian-tradition-mohanpuri-yamuna-nagar-news-c-246-1-sknl1018-146924-2025-11-17","type":"story","status":"publish","title_hn":"योग भारतीय परंपरा का महत्वपूर्ण अंग : मोहनपुरी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
योग भारतीय परंपरा का महत्वपूर्ण अंग : मोहनपुरी
Mon, 17 Nov 2025 12:23 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Mon, 17 Nov 2025 12:23 AM IST
विज्ञापन
आश्रम में प्रवचन सुनतीं महिला श्रद्धालु। संवाद
संवाद न्यूज एजेंसी
व्यासपुर। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम में योग एवं ध्यान साधना शिविर लगाया गया। इस दौरान स्वामी मोहनपुरी ने कहा कि योग भारतीय परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग है। योग वह विधि है जिसके द्वारा हमारी आत्मा अपने वास्तविक स्रोत परमात्मा से एकत्व स्थापित करती है।
श्रीमद्भागवत में श्री कृष्ण भगवान संपूर्ण मानव जाति को समझाते हुए कहते हैं कि कर्म योग, भक्ति योग और ज्ञान योग ये तीनों ही उत्थान के मार्ग हैं किंतु ये तभी सिद्ध हो सकते हैं, जब एक साधक के जीवन में ध्यान योग सिद्ध हो जाए। क्योंकि एक नेत्रहीन व्यक्ति के लिए सामने रखे दर्पण का कोई उपयोग नहीं होता इसी प्रकार ब्रह्मज्ञान के बिना भक्ति योग, कर्म योग और ज्ञान योग जीवन में नहीं उतर पाते।
स्वामी ने योग सूत्रों को उद्घाटित करते हुए कहा कि अष्टांग योग के आठ पड़ाव है, जो एक साधक को उसके परम लक्ष्य तक लेकर जाते हैं, किंतु इन्हें सहज रूप से पार कर पाना गुरु के बिना असंभव है। योग एक ऐसी संजीवनी है जो हमें शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक आरोग्यता प्रदान करती है। एक ब्रह्मज्ञानी साधक का योग सहज ही सिद्ध हो जाता है जब वह आत्म साक्षात्कार के द्वारा अपने अंतःकरण में ही परमात्मा के प्रकाश स्वरूप में दर्शन कर लेता है और वह असीम ब्रह्मांड की परम सत्ता से जुड़ जाता है। ऐसा सधा हुआ साधक ही योगी कहलाता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
व्यासपुर। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम में योग एवं ध्यान साधना शिविर लगाया गया। इस दौरान स्वामी मोहनपुरी ने कहा कि योग भारतीय परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग है। योग वह विधि है जिसके द्वारा हमारी आत्मा अपने वास्तविक स्रोत परमात्मा से एकत्व स्थापित करती है।
श्रीमद्भागवत में श्री कृष्ण भगवान संपूर्ण मानव जाति को समझाते हुए कहते हैं कि कर्म योग, भक्ति योग और ज्ञान योग ये तीनों ही उत्थान के मार्ग हैं किंतु ये तभी सिद्ध हो सकते हैं, जब एक साधक के जीवन में ध्यान योग सिद्ध हो जाए। क्योंकि एक नेत्रहीन व्यक्ति के लिए सामने रखे दर्पण का कोई उपयोग नहीं होता इसी प्रकार ब्रह्मज्ञान के बिना भक्ति योग, कर्म योग और ज्ञान योग जीवन में नहीं उतर पाते।
विज्ञापन
स्वामी ने योग सूत्रों को उद्घाटित करते हुए कहा कि अष्टांग योग के आठ पड़ाव है, जो एक साधक को उसके परम लक्ष्य तक लेकर जाते हैं, किंतु इन्हें सहज रूप से पार कर पाना गुरु के बिना असंभव है। योग एक ऐसी संजीवनी है जो हमें शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक आरोग्यता प्रदान करती है। एक ब्रह्मज्ञानी साधक का योग सहज ही सिद्ध हो जाता है जब वह आत्म साक्षात्कार के द्वारा अपने अंतःकरण में ही परमात्मा के प्रकाश स्वरूप में दर्शन कर लेता है और वह असीम ब्रह्मांड की परम सत्ता से जुड़ जाता है। ऐसा सधा हुआ साधक ही योगी कहलाता है।
विज्ञापन