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नहीं लिखा जा सकता गुरु की महिमा का वर्णन : नीलम
Mon, 09 Jun 2025 12:14 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Mon, 09 Jun 2025 12:14 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम हनुमान गेट में साप्ताहिक सत्संग हुआ। आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी नीलम भारती ने गुरु की महिमा का व्याख्यान किया। उन्होंने कहा कि परमात्मा के निर्गुण स्वरूप की महिमा का गुणगान सरल है, परंतु गुरु की महिमा का वर्णन शब्दों में कर पाना असंभव है।
उन्होंने कहा कि यदि इस धरा पर लगे सभी वृक्षों की कलम बनाकर, सात समुद्रों की स्याही उसमें भरकर संपूर्ण धरती को कागज का रूप दें दे तो भी गुरु की महिमा का वर्णन नहीं लिखा जा सकता है। भगवान शिव माता पार्वती को गुरु की महिमा के बारे में बताते हैं कि गुरु सात तरह के होते हैं। गुरुओं में से जो परमगुरु हैं, वह ब्रह्मनिष्ठ, तत्ववेत्ता और शिष्य के हृदय में ही परमात्मा का प्रकाश का दर्शन करवा देते हैं।
ब्रह्मनिष्ठ गुरु और परब्रह्म में कोई भेद नहीं होता है। वे तो केवल करुणा वत्सल, दया निधान बन कर अपनी शरण में आने वाले का कल्याण ही करते हैं। शास्त्र सम्मत विधि विधान के द्वारा अपने शिष्य को ब्रह्मज्ञान की दीक्षा प्रदान करके उसके आध्यात्मिक उत्थान हेतु कुछ दिशा निर्देश देते हैं। वे शिष्य पर दया कर उसे जनम मरण के चक्र से निकालने के लिए आज्ञा रूपी अंकुश लगाते हैं।
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यदि शिष्य श्रद्धा, विश्वास एवं निष्ठा से उनकी आज्ञाओं का अनुसरण करते हैं, तो वह नश्वर संसार में रहते हुए ही जीवन मुक्ति के आनंद को पा लेता है। गुरु की दृष्टि असीम होती है जो शिष्य को तीनों लोकों में सुरक्षित रखता है। निरंतर किया गया सत्संग साधक को उसके मन के विकारों से बचाता है। निरंतर की साधना उसके आध्यात्मिक उत्थान में सहायक होती है। निरंतर श्वास श्वास में चलता सुमिरन साधक को वर्तमान में रहते हुए संसार में निर्लेप होकर रहना सिखाता है।
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जगाधरी। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम हनुमान गेट में साप्ताहिक सत्संग हुआ। आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी नीलम भारती ने गुरु की महिमा का व्याख्यान किया। उन्होंने कहा कि परमात्मा के निर्गुण स्वरूप की महिमा का गुणगान सरल है, परंतु गुरु की महिमा का वर्णन शब्दों में कर पाना असंभव है।
उन्होंने कहा कि यदि इस धरा पर लगे सभी वृक्षों की कलम बनाकर, सात समुद्रों की स्याही उसमें भरकर संपूर्ण धरती को कागज का रूप दें दे तो भी गुरु की महिमा का वर्णन नहीं लिखा जा सकता है। भगवान शिव माता पार्वती को गुरु की महिमा के बारे में बताते हैं कि गुरु सात तरह के होते हैं। गुरुओं में से जो परमगुरु हैं, वह ब्रह्मनिष्ठ, तत्ववेत्ता और शिष्य के हृदय में ही परमात्मा का प्रकाश का दर्शन करवा देते हैं।
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ब्रह्मनिष्ठ गुरु और परब्रह्म में कोई भेद नहीं होता है। वे तो केवल करुणा वत्सल, दया निधान बन कर अपनी शरण में आने वाले का कल्याण ही करते हैं। शास्त्र सम्मत विधि विधान के द्वारा अपने शिष्य को ब्रह्मज्ञान की दीक्षा प्रदान करके उसके आध्यात्मिक उत्थान हेतु कुछ दिशा निर्देश देते हैं। वे शिष्य पर दया कर उसे जनम मरण के चक्र से निकालने के लिए आज्ञा रूपी अंकुश लगाते हैं।
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यदि शिष्य श्रद्धा, विश्वास एवं निष्ठा से उनकी आज्ञाओं का अनुसरण करते हैं, तो वह नश्वर संसार में रहते हुए ही जीवन मुक्ति के आनंद को पा लेता है। गुरु की दृष्टि असीम होती है जो शिष्य को तीनों लोकों में सुरक्षित रखता है। निरंतर किया गया सत्संग साधक को उसके मन के विकारों से बचाता है। निरंतर की साधना उसके आध्यात्मिक उत्थान में सहायक होती है। निरंतर श्वास श्वास में चलता सुमिरन साधक को वर्तमान में रहते हुए संसार में निर्लेप होकर रहना सिखाता है।