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Yamuna Nagar News: कुत्तों की नसबंदी पर उठे सवाल, कई गुना बढ़ी तादाद
Wed, 18 Dec 2024 01:09 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Wed, 18 Dec 2024 01:09 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। शहर में बेसहारा कुत्तों की तादाद बढ़ती ही जा रही है। वर्ष 2017 में आखिरी बार नगर निगम ने बेसहारा कुत्तों की नसंबदी कराई थी। तब 1.45 करोड़ रुपये खर्च कर 16170 कुत्तों की नसबंदी कराई गई थी। एक नसबंदी करने की एवज में 880 रुपये का भुगतान किया गया था।
निगम अधिकारियों ने नसबंदी का काम यूपी के अलीगढ़ स्थित तिरुपति फाउंडेशन एनजीओ से कराया था। ऐसे में उस दौरान हुई नसबंदी पर भी सवाल उठ रहे हैं। जब कुत्तों की नसबंदी हुई थी तो अब इनकी संख्या कई गुना कैसे बढ़ गई। लोगों की माने तो शहर में बेसहारा कुत्तों की संख्या 50 हजार को पार कर चुकी है। कुत्तों से छुटकारा दिलाने संबंधित शिकायतें लगातार नगर निगम कार्यालय में अधिकारियों के पास आ रही हैं, परंतु समाधान कोई नहीं हो रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार एक मादा कुत्ता साल में दो बार बच्चे देती है। मादा साल में औसतन 10 से 12 बच्चों को जन्म देती है। इनमें से 40 प्रतिशत बच्चों की मृत्यु जन्म कुछ दिन बाद ही हो जाती है। ऐसे में छह बच्चे ही जीवित रह पाते हैं। जितने कुत्ते बचते हैं उनमें 20 से 30 प्रतिशत मादा होती हैं। डेढ़ से दो साल बाद यही खुद बच्चे पैदा करने में सक्षम हो जाते हैं।
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ऐसे में बड़ा सवाल उठ रहा है कि जब 16 हजार से अधिक कुत्तों की नसबंदी कराई गई थी तो अब इनकी संख्या इतनी कैसे बढ़ गई। आरटीआई एक्टिविस्ट वीरेन सपरा ने कुत्तों की नसबंदी संबंधित आरटीआई नगर निगम में लगाई थी। तब यह भी सामने आया था कि नगर निगम ने बिना सर्वे कराए ही नसबंदी का टेंडर एनजीओ को दे दिया था। तब बजट के अभाव में बाकी कुत्तों की नसबंदी का काम रुक गया था।
बच्चों का स्कूल जाना भी हुआ मुश्किल
सेक्टर-17 के कुछ लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उनके बच्चे निजी स्कूल में जाते हैं। कुछ लोग सेक्टर में आकर बेसहारा कुत्तों को गली के बीचोबीच मांसाहारी खाना खिलाते हैं। यह बाजार से मिलता है। इसमें चिकन के अवशेष मिले होते हैं। जब कुत्तों को वह भोजन नहीं मिलता तो वह स्कूल जाने वाले बच्चों के पीछे दौड़ते हैं। भूख के कारण वह पागल हो जाते हैं। इस बारे में उन्होंने भोजन खिलाने वाले लोगों को बोला भी था, लेकिन उल्टा उन्हें ही भला बुरा कहा जाने लगा। उनका कहना है कि वह कुत्तों को भोजन खिलाने खिलाने के खिलाफ नहीं है। यदि इन्हीं कुत्तों को आबादी से थोड़ा दूर ले जाकर भोजन कराया जाना चाहिए। काफी लोग ऐसे भी हैं जो कुत्तों को दूध भी पिलाते हैं।
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यमुनानगर। शहर में बेसहारा कुत्तों की तादाद बढ़ती ही जा रही है। वर्ष 2017 में आखिरी बार नगर निगम ने बेसहारा कुत्तों की नसंबदी कराई थी। तब 1.45 करोड़ रुपये खर्च कर 16170 कुत्तों की नसबंदी कराई गई थी। एक नसबंदी करने की एवज में 880 रुपये का भुगतान किया गया था।
निगम अधिकारियों ने नसबंदी का काम यूपी के अलीगढ़ स्थित तिरुपति फाउंडेशन एनजीओ से कराया था। ऐसे में उस दौरान हुई नसबंदी पर भी सवाल उठ रहे हैं। जब कुत्तों की नसबंदी हुई थी तो अब इनकी संख्या कई गुना कैसे बढ़ गई। लोगों की माने तो शहर में बेसहारा कुत्तों की संख्या 50 हजार को पार कर चुकी है। कुत्तों से छुटकारा दिलाने संबंधित शिकायतें लगातार नगर निगम कार्यालय में अधिकारियों के पास आ रही हैं, परंतु समाधान कोई नहीं हो रहा है।
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विशेषज्ञों के अनुसार एक मादा कुत्ता साल में दो बार बच्चे देती है। मादा साल में औसतन 10 से 12 बच्चों को जन्म देती है। इनमें से 40 प्रतिशत बच्चों की मृत्यु जन्म कुछ दिन बाद ही हो जाती है। ऐसे में छह बच्चे ही जीवित रह पाते हैं। जितने कुत्ते बचते हैं उनमें 20 से 30 प्रतिशत मादा होती हैं। डेढ़ से दो साल बाद यही खुद बच्चे पैदा करने में सक्षम हो जाते हैं।
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ऐसे में बड़ा सवाल उठ रहा है कि जब 16 हजार से अधिक कुत्तों की नसबंदी कराई गई थी तो अब इनकी संख्या इतनी कैसे बढ़ गई। आरटीआई एक्टिविस्ट वीरेन सपरा ने कुत्तों की नसबंदी संबंधित आरटीआई नगर निगम में लगाई थी। तब यह भी सामने आया था कि नगर निगम ने बिना सर्वे कराए ही नसबंदी का टेंडर एनजीओ को दे दिया था। तब बजट के अभाव में बाकी कुत्तों की नसबंदी का काम रुक गया था।
बच्चों का स्कूल जाना भी हुआ मुश्किल
सेक्टर-17 के कुछ लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उनके बच्चे निजी स्कूल में जाते हैं। कुछ लोग सेक्टर में आकर बेसहारा कुत्तों को गली के बीचोबीच मांसाहारी खाना खिलाते हैं। यह बाजार से मिलता है। इसमें चिकन के अवशेष मिले होते हैं। जब कुत्तों को वह भोजन नहीं मिलता तो वह स्कूल जाने वाले बच्चों के पीछे दौड़ते हैं। भूख के कारण वह पागल हो जाते हैं। इस बारे में उन्होंने भोजन खिलाने वाले लोगों को बोला भी था, लेकिन उल्टा उन्हें ही भला बुरा कहा जाने लगा। उनका कहना है कि वह कुत्तों को भोजन खिलाने खिलाने के खिलाफ नहीं है। यदि इन्हीं कुत्तों को आबादी से थोड़ा दूर ले जाकर भोजन कराया जाना चाहिए। काफी लोग ऐसे भी हैं जो कुत्तों को दूध भी पिलाते हैं।