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फटी ड्रेस पर बना खुद का मजाक, अब 100 बच्चों तक पहुंचाते रहे स्कूली पोशाक

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 27 Jun 2022 01:03 AM IST
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Own joke made on torn dress, now school clothes continue to reach 100 children
Own joke made on torn dress, now school clothes continue to reach 100 children - फोटो : Yamuna Nagar
यमुनानगर। 7वीं कक्षा में था। स्कूल में घर से फटी ड्रेस पहन चला गया। ये देख सहपाठियों ने मजाक बनाया। तब मन में हीन भाव आया। इसी खीझ में खुद को लायक बनने और अपने जैसे बच्चों की मदद करने की ठानी। इसमें परिवार की आर्थिक स्थित आड़े आई, पर खुद से किया संकल्प याद कर खुद पढ़-लिखकर आर्थिक मजबूत बना फिर जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई में सहारा बना। ये कहानी है जगाधरी के दहल गढ़ान के अश्वनी अग्रवाल उर्फ आशु की। जो हर साल 100 बच्चों को स्कूली पोशाक पहुंचा रहे हैं ताकि खुद की तरह अन्य किसी बच्चे का मजाक न बने। साथ ही 200 बच्चों को स्टेशनरी व 30 बच्चों की मासिक फीस का जिम्मा उठाए हुए हैं, वहीं सात दिव्यांग को ट्राई साइकिल व हर माह वृद्ध आश्रम के बुजुर्गों को जरूरत का सामान भी पहुंचा रहे हैं।
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पांच बहनों का इकलौता भाई, आर्थिक तंगी में कम उम्र में जिम्मेदारी आई
आशु ने बताया कि पिता बालेश्वर गुप्ता बिजली बोर्ड में थे, पर पहले सरकारी नौकरी में भी दो से ढाई हजार रुपये ही वेतन मिलता था। घर पर माता सरोज गुप्ता व पांच बहनें थी। परिवार की स्थिति मजबूत नहीं थी। स्कूल में जाने को ड्रेस भी फटी थी, जिसे देख 7वीं कक्षा के सहपाठियों ने मजाक बनाया। उसी दिन ठान लिया था कि लायक बन अपने जैसे किसी दूसरे बच्चे का मजाक नहीं बनने दूंगा। 10वीं की पढ़ाई निजी स्कूल से हुई, पर परिवार में आर्थिक स्थिति देख 11वीं-12वीं सरकारी स्कूल से की। ग्रेजुएशन भी डिस्टेंस से की, जिसके प्रथम वर्ष में ही खुद का पढ़ाई खर्च निकालने को घर पर ट्यूशन पढ़ाने लगा। ग्रेजुएशन के अंतिम वर्ष में अपना कंप्यूटर सेंटर खोला, जिसमें मेधावियों को फीस में रियायत दी। इस दौरान एक बच्चा सर्दी में कंपकंपाता स्कूल जाता दिखा, जिसके पास गर्म कपड़े नहीं थे और पांव में भी चप्पल थी। ये देख सेंटर के बच्चों संग उस स्कूल में पहुंच 30 बच्चों को स्कूल ड्रेस, गर्म कपडे़ व जूते दिए। 19 से 34 वर्ष की उम्र तक अकेले स्कूलों में ऐसे बच्चों तक स्कूल ड्रेस, स्टेशनरी पहुंचाई।
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एमए के बाद की एलएलबी, निशुल्क कानूनी मदद देने का संकल्प
आशु ने बताया कि उनके समाजसेवा के काम को देख सहयोग में साथी जुड़े तो वर्ष-2018 में एक प्रयास सेवा संगठन बनाया। तब से हर साल जरूरतमंद बच्चों में 100 को ड्रेस, 200 को स्टेशनरी दे रहे हैं। 30 बच्चों की मासिक फीस भी भर रहे हैं। सात दिव्यांग को ट्राई साइकिल व हर माह वृद्ध आश्रम के बुजुर्गों को जरूरत का सामान दे रहे हैं। कोरोना काल में भी हजारों लोगों तक राशन व पका भोजन पहुंचाने की सेवा की। उन्होंने बताया कि डिस्टेंस से एमए के बाद एलएलबी कर चुके हैं, जिससे अब जरूरतमंदों को निशुल्क कानूनी सलाह व मदद देने का संकल्प भी लिया है। उन्होंने बताया कि समाजसेवा के कार्य में प्रयास सेवा संगठन से जुड़े साथियों, श्रीराम शरणम व अन्य समाजसेवी लोगों व संस्थाओं का सहयोग मिल रहा है।
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