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जीवन किताब की तरह, खाली पन्नों पर लिखना है कर्म : स्वाति महाराज
Wed, 16 Oct 2024 06:07 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Wed, 16 Oct 2024 06:07 AM IST
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यमुनानगर। एसएस जैन सभा मॉडल टाउन के प्रांगण में चल रहे चातुर्मास के 87 वें दिन महा साध्वी डॉ. स्वाति महाराज ने कहा कि हमारा जीवन एक डायरी के समान है। जिसके प्रथम पेज पर जन्म और अंतिम पेज पर मृत्यु लिखा हुआ है। बीच वाले पन्ने खाली हैं। इन पर कर्मों का लेखा-जोखा होता है।
बीच के पन्ने हमारा जीवन हैं, जन्म और मृत्यु सबकी एक जैसी होती है, लेकिन जीवन सबका अलग-अलग होता है। कोई अपने जीवन को दुःखी होकर व्यतीत करता है तो कोई सुखी होकर व्यतीत करता है। कोई स्वार्थ और घमंड में जीता है तो कोई दीन दुखियों की मदद को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लेता है। कोई पापों में अपने जीवन को व्यर्थ गंवा देता है तो कोई धर्म-ध्यान और पुण्य के कार्य करके अपने जीवन को सार्थक करता है। जीवन जीना भी एक कला है। जिसे हर कोई व्यक्ति पहचान नहीं पता जो इस संसार में जन्म लेकर अच्छे कार्य करते हैं। परोपकार करते हैं, दान पुण्य करते हैं, गुरुओं की शरण में रहते हैं और लगातार स्वाध्याय में लीन रहते हैं। उनका जन्म और जीवन दोनों सार्थक होते हैं। भगवान महावीर स्वामी ने कहा है कि इस संसार में जन्म लेना ही सब कुछ नहीं है बल्कि जन्म लेकर जीवन को सार्थक बनाना ही सब कुछ है। जीवन तभी सार्थक होगा जब इस जीवन को सद्कार्यों में लगाया जाएगा क्योंकि यदि आप मानव हो तो आपके हृदय में करुणा, प्रेम, दया, ममता होनी चाहिए न कि घमंड, काम, क्रोध, वासना। जिस व्यक्ति ने यह सिद्धांत अपना लिया, समझो उसका यह लोक भी संवर गया और परलोक भी संवर गया।
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बीच के पन्ने हमारा जीवन हैं, जन्म और मृत्यु सबकी एक जैसी होती है, लेकिन जीवन सबका अलग-अलग होता है। कोई अपने जीवन को दुःखी होकर व्यतीत करता है तो कोई सुखी होकर व्यतीत करता है। कोई स्वार्थ और घमंड में जीता है तो कोई दीन दुखियों की मदद को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लेता है। कोई पापों में अपने जीवन को व्यर्थ गंवा देता है तो कोई धर्म-ध्यान और पुण्य के कार्य करके अपने जीवन को सार्थक करता है। जीवन जीना भी एक कला है। जिसे हर कोई व्यक्ति पहचान नहीं पता जो इस संसार में जन्म लेकर अच्छे कार्य करते हैं। परोपकार करते हैं, दान पुण्य करते हैं, गुरुओं की शरण में रहते हैं और लगातार स्वाध्याय में लीन रहते हैं। उनका जन्म और जीवन दोनों सार्थक होते हैं। भगवान महावीर स्वामी ने कहा है कि इस संसार में जन्म लेना ही सब कुछ नहीं है बल्कि जन्म लेकर जीवन को सार्थक बनाना ही सब कुछ है। जीवन तभी सार्थक होगा जब इस जीवन को सद्कार्यों में लगाया जाएगा क्योंकि यदि आप मानव हो तो आपके हृदय में करुणा, प्रेम, दया, ममता होनी चाहिए न कि घमंड, काम, क्रोध, वासना। जिस व्यक्ति ने यह सिद्धांत अपना लिया, समझो उसका यह लोक भी संवर गया और परलोक भी संवर गया।
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