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गुरु के दिखाए मार्ग से ही जन्म मरण से मुक्ति संभव : साध्वी भारती
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साढौरा। यह इस सृष्टि का अटल सत्य है कि जब कोई साधारण सा दिखने वाला मनुष्य भी भगवान की शरणागत होकर एक भक्त बनता है तो भगवान उसे गुरु से मिलाते हैं। गुरु के दिखाए हुए दिव्य मार्ग पर चलते हुए वह भक्त जन्म मरण से स्वयं भी मुक्त होता है और अपने संपर्क में आने वाले संपूर्ण मानव समाज को भी मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर कर देता है। भोगपुर गांव में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा आयोजित तीन दिवसीय श्री हरि कथा के दौरान साध्वी रबिया भारती ने उक्त बातें कही।
उन्होंने मानव जीवन में गुरु के महत्व को समझाते हुए कहा कि संत नामदेव जी महाराष्ट्र के भक्त शिरोमणि कहलाए जाते हैं जो भगवान विट्ठल के अनन्य भक्त थे। उन्हें विट्ठल भगवान साक्षात दर्शन दिया करते थे किंतु गोरा कुम्हार ने जब एक संत सभा के दौरान नामदेव जी को परखना चाहा तो उनकी परीक्षा में नामदेव उत्तीर्ण नहीं हुए और गोरा कुम्हार जी ने व्यंग कसते हुए कहा कि बाकी सभी घड़े तो पके हुए हैं किंतु नामदेव ही कच्चा घड़ा है। तब नामदेव जी इस बात से आहत होकर विट्ठल भगवान के सम्मुख जाकर पूछते हैं। विट्ठल भगवान कहते हैं कि गुरु के बिना एक व्यक्ति सदैव कच्चा ही रहता है चाहे उसे साक्षात साकार रूप में परमात्मा के दर्शन भी क्यों न हो जाएं। गुरु के बिना भक्ति अधूरी है, तब विट्ठल भगवान के निर्देशानुसार नामदेव उस समय के पूर्ण संत विसोबा खेचर जी की शरणागत हुए और परमात्मा के वास्तविक स्वरूप से परिचित होकर भक्ति की पराकाष्ठा तक पहुंच पाए। संत नामदेव जी का यह प्रसंग स्पष्ट रूप से हम सभी को एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि जीवन में गुरु का आना बहुत महत्वपूर्ण है। संत नामदेव जी के जीवनकाल के दौरान कितने राजा महाराजा एवं वरिष्ठ लोग हुए होंगे परंतु आज इतिहास में उनका कहीं भी नाम नहीं है। एक भक्तात्मा जिसने अपने संपूर्ण जीवन को भक्तिमय बनाकर संपूर्ण मानव समाज को भक्ति का संदेश दिया, आज इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में उनका नाम अंकित है। कथा के दौरान कुछ भावपूर्ण भजनों का गायन किया गया और अंत में प्रसाद वितरण के साथ कथा का समापन हुआ।
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उन्होंने मानव जीवन में गुरु के महत्व को समझाते हुए कहा कि संत नामदेव जी महाराष्ट्र के भक्त शिरोमणि कहलाए जाते हैं जो भगवान विट्ठल के अनन्य भक्त थे। उन्हें विट्ठल भगवान साक्षात दर्शन दिया करते थे किंतु गोरा कुम्हार ने जब एक संत सभा के दौरान नामदेव जी को परखना चाहा तो उनकी परीक्षा में नामदेव उत्तीर्ण नहीं हुए और गोरा कुम्हार जी ने व्यंग कसते हुए कहा कि बाकी सभी घड़े तो पके हुए हैं किंतु नामदेव ही कच्चा घड़ा है। तब नामदेव जी इस बात से आहत होकर विट्ठल भगवान के सम्मुख जाकर पूछते हैं। विट्ठल भगवान कहते हैं कि गुरु के बिना एक व्यक्ति सदैव कच्चा ही रहता है चाहे उसे साक्षात साकार रूप में परमात्मा के दर्शन भी क्यों न हो जाएं। गुरु के बिना भक्ति अधूरी है, तब विट्ठल भगवान के निर्देशानुसार नामदेव उस समय के पूर्ण संत विसोबा खेचर जी की शरणागत हुए और परमात्मा के वास्तविक स्वरूप से परिचित होकर भक्ति की पराकाष्ठा तक पहुंच पाए। संत नामदेव जी का यह प्रसंग स्पष्ट रूप से हम सभी को एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि जीवन में गुरु का आना बहुत महत्वपूर्ण है। संत नामदेव जी के जीवनकाल के दौरान कितने राजा महाराजा एवं वरिष्ठ लोग हुए होंगे परंतु आज इतिहास में उनका कहीं भी नाम नहीं है। एक भक्तात्मा जिसने अपने संपूर्ण जीवन को भक्तिमय बनाकर संपूर्ण मानव समाज को भक्ति का संदेश दिया, आज इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में उनका नाम अंकित है। कथा के दौरान कुछ भावपूर्ण भजनों का गायन किया गया और अंत में प्रसाद वितरण के साथ कथा का समापन हुआ।
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