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कलेसर जंगल में एक दर्जन से ज्यादा गजानन, गिनती में मिले चार
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प्रदेश के सबसे बड़ा राष्ट्रीय उद्यान कलेसर गजानन के आने से गुलजार है। आए दिन खुले में हाथी मस्ती करते नजर आ रहे हैं। बरसात के मौसम में अठखेलियां करते हाथी अक्सर हाईवे पर नजर आ जाते हैं। पिछले एक महीने के दौरान दस से ज्यादा बाद ये हाथी खुले में लोगों के सामने आ चुके हैं।
हालांकि इनकी संख्या एक दर्जन के करीब है, जिनमें काफी घने जंगल में हैं और इनका उत्तराखंड के राजाजी नेशनल पार्क में आवागमन लगा रहता है। वहीं वाइल्ड लाइफ विभाग की तरफ से चार मेल हाथियों को आईडेंटीफाई किया है। वहीं पांच फीमेल हाथी बनसंतोर के पुनर्वास केंद्र में भी हैं। जिन्हें विभाग के कर्मचारियों की देखरेख में रखा गया है। हाल ही में प्रदेश के पशुपालन विभाग की तरफ से 2019 में हुई पशुओं की 20वीं गणना के आंकड़े जारी किए है। इस गिनती में मात्र 4 हाथी ही मिले हैं, जबकि यहां पर बड़ी संख्या में हाथी दिखाई दे रहे हैं।
20 साल पहले ज्यादा हाथी थे
-करीब 11 हजार एकड़ में फैले कलेसर नेशनल पार्क में साल 1996-97 में दो दर्जन के करीब हाथी हुआ करते थे। ये राजाजी नेशनल पार्क देहरादून चले गए। तब से आज तक यमुना के रास्ते यहां पर हाथी आते जाते रहते हैं, लेकिन ज्यादा दिन तक रुक नहीं पाते और वापस लौट जाते हैं। सरकार की तरफ से कलेसर में ऐसा कोई इंतजाम भी नहीं किया गया, जिससे हाथी यहीं पर डटे रहे।
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जल वायु का आंकलन करें सरकार
-जंगल में रह रहे अधिकांश जानवरों को यहां का मौसम रास नहीं आता। ऐसे में कुछ दिन यहां बिताने के बाद मौसम के हिसाब से जानवर यहां से दूसरी जगहों का रुख कर लेते हैं। ऐसे में सरकार को यहां के पर्याप्त वातावरण व जलवायु का आंकलन करवाना चाहिए क्योंकि कई जानवर वातावरण के हिसाब से अपना स्थान चुनते हैं। इस समय राष्ट्रीय उद्यान कलेसर में हाथी, चीता, पैंथर, लेपर्ड, कक्कड़, बन बकरा, चीतल, झाक, शेह, खरगोश, जंगली मुर्गा, मोर, जंगली सूअर समेत कई अन्य किस्म के जानवर रहते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इस समय इनकी संख्या चार गुना बढ़ गई है।
हाथियों को पानी की जरूरत ज्यादा
-कलेसर जंगल में आने वाले हाथियों के लिए सबसे बड़ी समस्या उनके पीने व नहाने के पानी की है। क्योंकि यहां पर जो ग़जलर व तालाब बने हुए हैं। उनमें हाथी केवल पानी तो पी सकता है लेकिन नहाना मुश्किल होता है। ऐसे में वे यमुना का रूख करते हैं। हा पानी पीते समय नहाने का काफी शौकिन होता है। ऐसे में हाथी को पानी पीने और नहाने के लिए पर्याप्त जल चाहिए। जो उनको यहां पर उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। यहां पर हाथियों का ज्यादा समय तक ना रुकना भी इसका मुख्य कारण बताया जा रहा है।
वर्जन
-प्रदेश का कलेसर व उत्तराखंड का राजाजी नेशनल आपस में जुड़ा हुआ है। जंगली जानवरों का आवागमन लगा रहता है। जानवरों के आवागमन को रोका नहीं जा सकता। फिलहाल कलेसर जंगल में चार मेल हाथी मिले हैं। इनकी संख्या कम ज्यादा होती रहती है। बनसंतोर हाथी पुनर्वास केंद्र में पांच हाथी हैं।
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हालांकि इनकी संख्या एक दर्जन के करीब है, जिनमें काफी घने जंगल में हैं और इनका उत्तराखंड के राजाजी नेशनल पार्क में आवागमन लगा रहता है। वहीं वाइल्ड लाइफ विभाग की तरफ से चार मेल हाथियों को आईडेंटीफाई किया है। वहीं पांच फीमेल हाथी बनसंतोर के पुनर्वास केंद्र में भी हैं। जिन्हें विभाग के कर्मचारियों की देखरेख में रखा गया है। हाल ही में प्रदेश के पशुपालन विभाग की तरफ से 2019 में हुई पशुओं की 20वीं गणना के आंकड़े जारी किए है। इस गिनती में मात्र 4 हाथी ही मिले हैं, जबकि यहां पर बड़ी संख्या में हाथी दिखाई दे रहे हैं।
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20 साल पहले ज्यादा हाथी थे
-करीब 11 हजार एकड़ में फैले कलेसर नेशनल पार्क में साल 1996-97 में दो दर्जन के करीब हाथी हुआ करते थे। ये राजाजी नेशनल पार्क देहरादून चले गए। तब से आज तक यमुना के रास्ते यहां पर हाथी आते जाते रहते हैं, लेकिन ज्यादा दिन तक रुक नहीं पाते और वापस लौट जाते हैं। सरकार की तरफ से कलेसर में ऐसा कोई इंतजाम भी नहीं किया गया, जिससे हाथी यहीं पर डटे रहे।
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जल वायु का आंकलन करें सरकार
-जंगल में रह रहे अधिकांश जानवरों को यहां का मौसम रास नहीं आता। ऐसे में कुछ दिन यहां बिताने के बाद मौसम के हिसाब से जानवर यहां से दूसरी जगहों का रुख कर लेते हैं। ऐसे में सरकार को यहां के पर्याप्त वातावरण व जलवायु का आंकलन करवाना चाहिए क्योंकि कई जानवर वातावरण के हिसाब से अपना स्थान चुनते हैं। इस समय राष्ट्रीय उद्यान कलेसर में हाथी, चीता, पैंथर, लेपर्ड, कक्कड़, बन बकरा, चीतल, झाक, शेह, खरगोश, जंगली मुर्गा, मोर, जंगली सूअर समेत कई अन्य किस्म के जानवर रहते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इस समय इनकी संख्या चार गुना बढ़ गई है।
हाथियों को पानी की जरूरत ज्यादा
-कलेसर जंगल में आने वाले हाथियों के लिए सबसे बड़ी समस्या उनके पीने व नहाने के पानी की है। क्योंकि यहां पर जो ग़जलर व तालाब बने हुए हैं। उनमें हाथी केवल पानी तो पी सकता है लेकिन नहाना मुश्किल होता है। ऐसे में वे यमुना का रूख करते हैं। हा पानी पीते समय नहाने का काफी शौकिन होता है। ऐसे में हाथी को पानी पीने और नहाने के लिए पर्याप्त जल चाहिए। जो उनको यहां पर उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। यहां पर हाथियों का ज्यादा समय तक ना रुकना भी इसका मुख्य कारण बताया जा रहा है।
वर्जन
-प्रदेश का कलेसर व उत्तराखंड का राजाजी नेशनल आपस में जुड़ा हुआ है। जंगली जानवरों का आवागमन लगा रहता है। जानवरों के आवागमन को रोका नहीं जा सकता। फिलहाल कलेसर जंगल में चार मेल हाथी मिले हैं। इनकी संख्या कम ज्यादा होती रहती है। बनसंतोर हाथी पुनर्वास केंद्र में पांच हाथी हैं।