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Sonipat News: 316 साल पुरानी हवेली का झरोखा बना संग्रहालय की शान
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फोटो : स्वर्णप्रस्थ संग्रहालय में स्थापित किया गया हवेली का लाल पत्थर से बना आकर्षक झरोखा। स्रो
सोनीपत। शहर की करीब 316 साल पुरानी कंवर दलीप सिंह की हवेली का लाल पत्थर से बना ऐतिहासिक झरोखा अब स्वर्णप्रस्थ संग्रहालय की शोभा बढ़ा रहा है। वर्ष 1710 में निर्मित इस हवेली के झरोखे को संग्रहालय में संरक्षित किया गया है, जो पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
हवेली के मालिक गिरीश कुंवर ने बताया कि पुराने समय में सोनीपत में प्रवेश के चार प्रमुख दरवाजे थे। साबर दरवाजे के समीप स्थित उनके पुरखों की यह हवेली लखौरी ईंटों से बनाई गई थी। हवेली ने शहर के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के कई दौर देखे हैं। भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान पाकिस्तान से विस्थापित होकर सोनीपत पहुंचे हिंदू परिवारों को यहां शुरुआती दौर में आश्रय मिला था। जरूरतमंद परिवारों के बच्चों को निशुल्क शिक्षा भी दी जाती थी।
हवेली का जुड़ाव शहर की धार्मिक परंपराओं से भी रहा। इसके मार्ग से कई दशकों तक रामलीला की सवारियां गुजरती रहीं। हवेली के पास पहुंचने पर सवारी कुछ देर रुकती थी और भगवान राम की पूजा-अर्चना की जाती थी। अब लाल पत्थर की नक्काशी और पुरानी स्थापत्य शैली वाला झरोखा संग्रहालय में संरक्षित है। इसके माध्यम से नई पीढ़ी सोनीपत की ऐतिहासिक विरासत और शहर के पुराने सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन से परिचित हो रही है।
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हवेली से जुड़ी खास बातें
वर्ष 1710 में हुआ था निर्माण
लाल पत्थर का ऐतिहासिक झरोखा अब स्वर्णप्रस्थ संग्रहालय में संरक्षित
हवेली लखौरी ईंटों से बनाई गई थी
विभाजन के दौरान विस्थापित परिवारों को मिला था आश्रय
जरूरतमंद बच्चों को दी जाती थी निशुल्क शिक्षा
रामलीला की सवारी के दौरान हवेली के पास होता था ठहराव
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हवेली के मालिक गिरीश कुंवर ने बताया कि पुराने समय में सोनीपत में प्रवेश के चार प्रमुख दरवाजे थे। साबर दरवाजे के समीप स्थित उनके पुरखों की यह हवेली लखौरी ईंटों से बनाई गई थी। हवेली ने शहर के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के कई दौर देखे हैं। भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान पाकिस्तान से विस्थापित होकर सोनीपत पहुंचे हिंदू परिवारों को यहां शुरुआती दौर में आश्रय मिला था। जरूरतमंद परिवारों के बच्चों को निशुल्क शिक्षा भी दी जाती थी।
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हवेली का जुड़ाव शहर की धार्मिक परंपराओं से भी रहा। इसके मार्ग से कई दशकों तक रामलीला की सवारियां गुजरती रहीं। हवेली के पास पहुंचने पर सवारी कुछ देर रुकती थी और भगवान राम की पूजा-अर्चना की जाती थी। अब लाल पत्थर की नक्काशी और पुरानी स्थापत्य शैली वाला झरोखा संग्रहालय में संरक्षित है। इसके माध्यम से नई पीढ़ी सोनीपत की ऐतिहासिक विरासत और शहर के पुराने सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन से परिचित हो रही है।
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हवेली से जुड़ी खास बातें
वर्ष 1710 में हुआ था निर्माण
लाल पत्थर का ऐतिहासिक झरोखा अब स्वर्णप्रस्थ संग्रहालय में संरक्षित
हवेली लखौरी ईंटों से बनाई गई थी
विभाजन के दौरान विस्थापित परिवारों को मिला था आश्रय
जरूरतमंद बच्चों को दी जाती थी निशुल्क शिक्षा
रामलीला की सवारी के दौरान हवेली के पास होता था ठहराव