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रवि के हर दांव के साथ खुशी से उछल पड़ते गांववासी, बोले-अब चमकेगा हमारा गांव
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ओलंपिक में पहलवान रवि दहिया का मुकाबला देखते ग्रामीण
- फोटो : Sonipat
गांव नाहरी के पहलवान रवि दहिया ने ग्रामीणों के पदक को लेकर चल रहे 41 साल के इंतजार को आखिरकार बुधवार को खत्म कर दिया। गांव के लाडले का मैच देखने के लिए ग्रामीण सुबह से ही टीवी के सामने बैठे रहे। रवि के हर दांव पर ग्रामीण खुशी से उछल पड़ते। रवि जैसे-जैसे पदक की तरफ अपने कदम बढ़ा रहा था, वैसे-वैसे ग्रामीणों में भी खुशी की लहर दौड़ती जा रही थी। रवि दहिया के फाइनल में कदम रखते ही ग्रामीणों ने कहा-लाडले ने विश्व पटल पर चमका दिया गांव का नाम, अब सुधरेंगे गांव के हालात।
टोक्यो ओलंपिक में फ्री-स्टाइल कुश्ती के लिए 57 किलोग्राम भारवर्ग में चुने गए रवि दहिया सोनीपत जिले के गांव नाहरी के रहने वाले हैं। इस गांव से उनसे पहले महाबीर सिंह 1980 व 1984 में और अमित दहिया 2012 में ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं, लेकिन इन दोनों खिलाड़ियों को पदक जीतने में कामयाबी हासिल नहीं हुई थी। अब अपना पहला ओलंपिक खेल रहे रवि दहिया से ग्रामीणों को आस थी कि वह ओलंपिक में उनके इंतजार को खत्म करेगा। रवि दहिया ने ग्रामीणों की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए अपने गांव का नाम विश्व पटल पर चमका दिया है। गांव में जश्न का माहौल है। परिजनों को बधाइयां मिल रही हैं। ग्रामीणों ने अपनी खुशी का इजहार किया।
सुविधाएं नहीं, फिर भी चमक रहे मिट्टी के लाल
गांव में खेलों के लिए किसी प्रकार की सुविधा उपलब्ध नहीं करवाई गई है। उसके बावजूद
मिट्टी के लाल के कठोर परिश्रम से अपनी चमक बिखेर रहे हैं। आर्थिक स्थिति कमजोर होने व विपरीत परिस्थितियों में रवि दहिया ने जिस जुनून के साथ ओलंपिक के फाइनल तक का सफर तय किया है, वह यकीनन युवाओं के लिए बेहतर मार्ग खोलेगा। रवि की उपलब्धि से गांव के युवाओं को खेल सुविधाएं मिल सकती हैं।
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- सुकेश रानी, पंचायत समिति सदस्य
हार से बौखलाए कजाकिस्तान के पहलवान ने रवि को दांतों से काटा
सेमीफाइनल में रवि दहिया ने बेहतर खेल दिखाते हुए कजाकिस्तान के पहलवान नुरीस्लाम सनायेव को पटखनी देकर फाइनल में जगह बनाई। टीवी पर मैच देखते हुए हम सभी उस समय हैरान रह गए, जब हार से बौखलाए कजाकिस्तान के पहलवान ने रवि के हाथ पर दांतों से काट लिया। अंतरराष्ट्रीय स्तर के ऐसे मुकाबले में एक पहलवान द्वारा ऐसा कृत्य शर्मनाक है। हार के बाद नुरीस्लाम सनायेव ने रवि दहिया के हाथ पर इतनी जोर से काटा कि काफी देर तक दांतों के निशान बने रहे। अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुकाबलों में इस तरह की घटनाओं पर कड़ा संज्ञान लिया जाना चाहिए।
- पदम सिंह दहिया, निवासी, गांव नाहरी।
अब बदलेंगे गांव के हालात
रवि दहिया ने अपने बेहतरीन खेल से देश के लिए पदक पक्का करते हुए जहां छोटे से गांव को विश्व पटल पर चमका दिया है, वहीं अब हमें पूरी उम्मीद है कि गांव के हालात में भी सुधार होगा। गांव में बिजली-पानी की समस्या गहराई हुई है, जिसकी तरफ प्रशासन ने आज तक ध्यान नहीं दिया है। रवि दहिया के पदक जीतने के साथ ही अब हमारा गांव भी सुर्खियों मेें आ जाएगा और यहां वर्षों से चल रही बिजली-पानी की समस्या का भी समाधान हो सकेगा।
- राकेश, ग्रामीण
--
युवाओं में जगा दिया कुश्ती का जुनून
रवि दहिया ने ग्रामीणों के 41 साल से चल रहे पदक के इंतजार को ही खत्म नहीं किया है, बल्कि युवाओं में कुश्ती के प्रति जुनून भी पैदा कर दिया है। आज हर घर में केवल रवि के ही चर्चे चल रहे हैं। गांव के बच्चे व युवा रवि को अपना आदर्श मानकर खेलों की तरफ अग्रसर होंगे। आने वाले समय में गांव से ओर भी पहलवान निकलेंगे।
- रविंद्र, ग्रामीण
--
पहले ही कर ली थी आतिशबाजी की तैयारी
रवि दहिया ने जिस जुनून के साथ ओलंपिक तक का सफर तय किया है। उसे देखते हुए पूरे गांव को उम्मीद थी कि वह देश की झोली में पदक जरूर डालेगा। इसी विश्वास के साथ गांव वालों ने एकत्रित होकर मैच से पहले ही आतिशबाजी व धूम-धड़ाके की तैयारी कर ली थी। मैच जीतने के साथ ही गांव में बधाइयों व एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर आतिशबाजी करते हुए जश्न का माहौल शुरू हो गया। हमें पूरी उम्मीद है कि गांव का लाडला एक बार फिर उन्हें झूमने का स्वर्णिम अवसर जरूर देगा।
- देवानंद, ग्रामीण
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टोक्यो ओलंपिक में फ्री-स्टाइल कुश्ती के लिए 57 किलोग्राम भारवर्ग में चुने गए रवि दहिया सोनीपत जिले के गांव नाहरी के रहने वाले हैं। इस गांव से उनसे पहले महाबीर सिंह 1980 व 1984 में और अमित दहिया 2012 में ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं, लेकिन इन दोनों खिलाड़ियों को पदक जीतने में कामयाबी हासिल नहीं हुई थी। अब अपना पहला ओलंपिक खेल रहे रवि दहिया से ग्रामीणों को आस थी कि वह ओलंपिक में उनके इंतजार को खत्म करेगा। रवि दहिया ने ग्रामीणों की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए अपने गांव का नाम विश्व पटल पर चमका दिया है। गांव में जश्न का माहौल है। परिजनों को बधाइयां मिल रही हैं। ग्रामीणों ने अपनी खुशी का इजहार किया।
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सुविधाएं नहीं, फिर भी चमक रहे मिट्टी के लाल
गांव में खेलों के लिए किसी प्रकार की सुविधा उपलब्ध नहीं करवाई गई है। उसके बावजूद
मिट्टी के लाल के कठोर परिश्रम से अपनी चमक बिखेर रहे हैं। आर्थिक स्थिति कमजोर होने व विपरीत परिस्थितियों में रवि दहिया ने जिस जुनून के साथ ओलंपिक के फाइनल तक का सफर तय किया है, वह यकीनन युवाओं के लिए बेहतर मार्ग खोलेगा। रवि की उपलब्धि से गांव के युवाओं को खेल सुविधाएं मिल सकती हैं।
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- सुकेश रानी, पंचायत समिति सदस्य
हार से बौखलाए कजाकिस्तान के पहलवान ने रवि को दांतों से काटा
सेमीफाइनल में रवि दहिया ने बेहतर खेल दिखाते हुए कजाकिस्तान के पहलवान नुरीस्लाम सनायेव को पटखनी देकर फाइनल में जगह बनाई। टीवी पर मैच देखते हुए हम सभी उस समय हैरान रह गए, जब हार से बौखलाए कजाकिस्तान के पहलवान ने रवि के हाथ पर दांतों से काट लिया। अंतरराष्ट्रीय स्तर के ऐसे मुकाबले में एक पहलवान द्वारा ऐसा कृत्य शर्मनाक है। हार के बाद नुरीस्लाम सनायेव ने रवि दहिया के हाथ पर इतनी जोर से काटा कि काफी देर तक दांतों के निशान बने रहे। अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुकाबलों में इस तरह की घटनाओं पर कड़ा संज्ञान लिया जाना चाहिए।
- पदम सिंह दहिया, निवासी, गांव नाहरी।
अब बदलेंगे गांव के हालात
रवि दहिया ने अपने बेहतरीन खेल से देश के लिए पदक पक्का करते हुए जहां छोटे से गांव को विश्व पटल पर चमका दिया है, वहीं अब हमें पूरी उम्मीद है कि गांव के हालात में भी सुधार होगा। गांव में बिजली-पानी की समस्या गहराई हुई है, जिसकी तरफ प्रशासन ने आज तक ध्यान नहीं दिया है। रवि दहिया के पदक जीतने के साथ ही अब हमारा गांव भी सुर्खियों मेें आ जाएगा और यहां वर्षों से चल रही बिजली-पानी की समस्या का भी समाधान हो सकेगा।
- राकेश, ग्रामीण
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युवाओं में जगा दिया कुश्ती का जुनून
रवि दहिया ने ग्रामीणों के 41 साल से चल रहे पदक के इंतजार को ही खत्म नहीं किया है, बल्कि युवाओं में कुश्ती के प्रति जुनून भी पैदा कर दिया है। आज हर घर में केवल रवि के ही चर्चे चल रहे हैं। गांव के बच्चे व युवा रवि को अपना आदर्श मानकर खेलों की तरफ अग्रसर होंगे। आने वाले समय में गांव से ओर भी पहलवान निकलेंगे।
- रविंद्र, ग्रामीण
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पहले ही कर ली थी आतिशबाजी की तैयारी
रवि दहिया ने जिस जुनून के साथ ओलंपिक तक का सफर तय किया है। उसे देखते हुए पूरे गांव को उम्मीद थी कि वह देश की झोली में पदक जरूर डालेगा। इसी विश्वास के साथ गांव वालों ने एकत्रित होकर मैच से पहले ही आतिशबाजी व धूम-धड़ाके की तैयारी कर ली थी। मैच जीतने के साथ ही गांव में बधाइयों व एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर आतिशबाजी करते हुए जश्न का माहौल शुरू हो गया। हमें पूरी उम्मीद है कि गांव का लाडला एक बार फिर उन्हें झूमने का स्वर्णिम अवसर जरूर देगा।
- देवानंद, ग्रामीण