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सुमित का जज्बा... हादसे में गंवाया था पैर, उसी में हुआ जख्म, फिर भी लाया गोल्ड
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सुमित की जीत पर परिजनों के साथ खुशी से नाचती मां निर्मला। संवाद
- फोटो : Sonipat
टोक्यो पैरालंपिक में एक बार फिर हरियाणा का दम सब पर भारी रहा। सोनीपत के गांव खेवड़ा के सुमित आंतिल ने पहली बार पैरालंपिक में खेलते हुए जैवलिन थ्रो के एफ-64 इवेंट में 68.08 मीटर थ्रो कर विश्व रिकॉर्ड बना डाला। सुमित ने इतिहास रचते हुए सोने का तमगा अपने नाम किया। जैवलिन थ्रो में सुमित के स्वर्ण पदक जीतते ही उनके गांव खेवड़ा समेत देश-प्रदेश में जश्न का माहौल शुरू हो गया।
टोक्यो में चल रहे पैरालंपिक खेलों में सोमवार को सोनीपत के खिलाड़ी सुमित आंतिल का इवेंट हुआ। सुमित ने जैवलिन थ्रो में शुरू से ही बढ़त बनाई और आस्ट्रेलिया के खिलाड़ी एम. ब्रूरेन को हराते हुए रिकॉर्ड बना डाला। खास बात यह है कि टोक्यो पैरालंपिक में जाते समय सुमित के पांव में जख्म था। उसके बावजूद सुमित ने अपना हौसला बुलंद रखा और स्वर्ण पदक जीतकर ही दम लिया। विजयी भाला फेंकने के बाद सुमित शेर की तरह दहाड़ा। पैरालंपिक में जाने से पहले सुमित ने मां से जो वादा किया था, उसे पूरा कर दिखाया।
संघर्षों से भरा रहा है सुमित का जीवन सफर
7 जून 1998 को जन्मे सुमित आंतिल का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। तीन बहनों के इकलौते भाई ने शुरू से ही परिवार की जिम्मेदारी संभाल ली थी। जब सात साल का था, तब एयरफोर्स में तैनात पिता रामकुमार की बीमारी से मौत हो गई थी। पिता का साया उठने के बाद मां निर्मला ने हर चुनौती का सामना करते हुए चारों बच्चों का पालन-पोषण किया। 12वीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान ट्यूशन से लौटते समय हुई सड़क दुर्घटना में सुमित को एक पैर गंवाना पड़ा था। उसके बाद भी सुमित ने हार नहीं मानी और निरंतर आगे बढ़ते हुए ओलंपिक तक का सफर तय किया।
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कोच ने दी हिम्मत तो दोस्त बने सहारा
सड़क हादसे में पैर गंवाने के बावजूद सुमित कभी उदास नहीं हुआ। दोस्तों की प्रेरणा से साई सेंटर, बहालगढ़ पहुंचा, जहां कोच विरेंद्र धनखड़ ने हिम्मत दी और मार्गदर्शन किया। विरेंद्र धनखड़ सुमित को लेकर दिल्ली गए, जहां द्रोणाचार्य अवॉर्डी कोच नवल सिंह से जैवलिन थ्रो के गुर सीखे। इसके बाद सुमित ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कोरोना काल में भी सुमित निरंतर अपने अभ्यास को जारी रखे हुए था। रोजाना सुबह-शाम 4-4 घंटे तक कड़ा अभ्यास किया। सुमित ने दृढ़ निश्चय व कड़े संघर्ष के बल पर स्वर्ण पदक जीत युवाओं के सामने मिसाल पेश की। आज सुमित पैरालंपिक में गोल्ड जीतकर सबकी आंखों का तारा बन गया है।
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टोक्यो में चल रहे पैरालंपिक खेलों में सोमवार को सोनीपत के खिलाड़ी सुमित आंतिल का इवेंट हुआ। सुमित ने जैवलिन थ्रो में शुरू से ही बढ़त बनाई और आस्ट्रेलिया के खिलाड़ी एम. ब्रूरेन को हराते हुए रिकॉर्ड बना डाला। खास बात यह है कि टोक्यो पैरालंपिक में जाते समय सुमित के पांव में जख्म था। उसके बावजूद सुमित ने अपना हौसला बुलंद रखा और स्वर्ण पदक जीतकर ही दम लिया। विजयी भाला फेंकने के बाद सुमित शेर की तरह दहाड़ा। पैरालंपिक में जाने से पहले सुमित ने मां से जो वादा किया था, उसे पूरा कर दिखाया।
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संघर्षों से भरा रहा है सुमित का जीवन सफर
7 जून 1998 को जन्मे सुमित आंतिल का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। तीन बहनों के इकलौते भाई ने शुरू से ही परिवार की जिम्मेदारी संभाल ली थी। जब सात साल का था, तब एयरफोर्स में तैनात पिता रामकुमार की बीमारी से मौत हो गई थी। पिता का साया उठने के बाद मां निर्मला ने हर चुनौती का सामना करते हुए चारों बच्चों का पालन-पोषण किया। 12वीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान ट्यूशन से लौटते समय हुई सड़क दुर्घटना में सुमित को एक पैर गंवाना पड़ा था। उसके बाद भी सुमित ने हार नहीं मानी और निरंतर आगे बढ़ते हुए ओलंपिक तक का सफर तय किया।
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कोच ने दी हिम्मत तो दोस्त बने सहारा
सड़क हादसे में पैर गंवाने के बावजूद सुमित कभी उदास नहीं हुआ। दोस्तों की प्रेरणा से साई सेंटर, बहालगढ़ पहुंचा, जहां कोच विरेंद्र धनखड़ ने हिम्मत दी और मार्गदर्शन किया। विरेंद्र धनखड़ सुमित को लेकर दिल्ली गए, जहां द्रोणाचार्य अवॉर्डी कोच नवल सिंह से जैवलिन थ्रो के गुर सीखे। इसके बाद सुमित ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कोरोना काल में भी सुमित निरंतर अपने अभ्यास को जारी रखे हुए था। रोजाना सुबह-शाम 4-4 घंटे तक कड़ा अभ्यास किया। सुमित ने दृढ़ निश्चय व कड़े संघर्ष के बल पर स्वर्ण पदक जीत युवाओं के सामने मिसाल पेश की। आज सुमित पैरालंपिक में गोल्ड जीतकर सबकी आंखों का तारा बन गया है।