हिंदी दिवस: हिंदी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिलाने के लिए लाठियां खाईं, सरदार सिंह ने साझा किए संस्मरण
हिंदी आंदोलन के 13 सदस्यों में से एकमात्र जीवित सदस्य रोहट निवासी सरदार सिंह ने संस्मरण साझा किए हैं। वह 12 साथियों के साथ चार माह तक जेल में रहे, एक साल तक चले संघर्ष के बाद मांग पूरी हुई थी।
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75 वर्ष पूर्व देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिलने के बाद भी कई आंदोलन चले थे। ये आंदोलन हिंदी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिलाने के लिए चलाए गए। हिंदी को उसका वास्तविक स्थान दिलाने के लिए संघर्ष करने वाले हिंदी प्रेमियों ने न सिर्फ लाठियां खाईं, बल्कि जेल भी गए। इसके बावजूद हिंदी प्रेमियों के हौसले बुलंद रहे। वह सभी मांगे पूरी होने तक संघर्ष के रास्ते पर अग्रसर रहे।
हिंदी के उन्हीं सिपाहियों में एक हैं सोनीपत के गांव रोहट निवासी सरदार सिंह। जिन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर हिंदी को उसका वास्तविक स्थान दिलाने के लिए संघर्ष किया। 89 वर्षीय सरदार सिंह आज भले ही वृद्ध हो चुके हों, कानों से सुनाई देना थोड़ा कम हो गया हो, लेकिन मातृभाषा हिंदी के प्रति प्रेम आज भी जोश भर देता है।
आजादी के बाद हिंदी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिलाने के लिए शुरू किए गए संघर्ष को याद करते हुए गांव रोहट निवासी सरदार सिंह बताते हैं कि वर्ष 1957 में हरियाणा व पंजाब एक था। तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो गुरुमुखी भाषा को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा देना चाहते थे। इसी के विरोध में आंदोलन शुरू कर दिया था। मांग थी कि हिंदी भाषा को ही राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया जाए।
अपनी मांग को लेकर किए गए संघर्ष के दौरान लगातार धरने व प्रदर्शन किए। हमारे संघर्ष को बढ़ता देख उसे दबाने के लिए मुझे और 12 साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया। सभी को करीब 18 दिन सोनीपत जेल में रखा गया। उसके बाद रोहतक जेल भेज दिया गया। आंदोलन को कमजोर करने के लिए मुझे अलग-अलग जेलों में भेज दिया।
पांच सदस्यों को संगरूर पंजाब की जेल भेज दिया, जबकि 8 साथियों को हिसार जेल में रखा गया। हम सभी 4 महीने तक जेल में रहे, लेकिन समय के साथ-साथ हौसले और मजबूत होते चले गए। जेल से बाहर आने के बाद भी हम सभी ने इकट्ठे होकर आंदोलन को तेज किया और जब तक मांगे पूरी नहीं हुई, तब तक संघर्ष जारी रखा। यह आंदोलन एक साल तक चला।
12 साथी दुनिया से हुए विदा
गांव रोहट निवासी सरदार सिंह बताते हैं कि हिंदी को उसका वास्तविक स्थान दिलाने के लिए शुरू किए हिंदी आंदोलन में उनके साथ मांगेराम, वेदसिंह, रामस्वरूप, लज्जेराम, जयलाल, बलबीर, सूरत सिंह, केहर सिंह, देवी सिंह, हजारी, जिले सिंह और जयचंद शामिल थे। हम सभी ने कसम खाई थी कि जब तक हिंदी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा नहीं मिल जाता, तब तक अपने कदम पीछे नहीं हटाएंगे। पुलिस की लाठियां खाईं, जेल गए, लेकिन सभी अपने वादे पर कायम रहे। सरदार सिंह बताते हैं कि हिंदी आंदोलन में कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले सभी 12 साथी दुनिया को अलविदा कह चुके हैं। उस आंदोलन का मैं एकमात्र जीवित सदस्य हूं।
युवा पीढ़ी ही देश का भविष्य है
सरदार सिंह कहते हैं कि हिंदी को उसका वास्तविक स्थान दिलाने के लिए अनेक लोगों ने कड़ा संघर्ष किया है। हम हिंदी रूपी धरोहर को संभालकर यहां तक लाए हैं, अब इसे संभालने की जिम्मेदारी युवा पीढ़ी की है। युवा पीढ़ी ही देश का भविष्य है। इसलिए मातृभाषा का सम्मान करना, उसके उत्थान व प्रचार-प्रसार के लिए प्रयास करना उनका नैतिक कर्तव्य है।