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राष्ट्रमंडल में भारत मां का झंडा किया बुलंद, अब पेरिस में लहराऊंगा परचम : सुधीर
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सोनीपत। इंग्लैंड के बर्मिंघम में आयोजित हो रहे राष्ट्रमंडल खेलों की पावर लिफ्टिंग स्पर्धा में देश को पहली बार सोना दिलाने वाले सुधीर ने कहा कि राष्ट्रमंडल में देश का झंडा बुलंद कर दिया है, अब पेरिस में परचम लहराऊंगा। बचपन में ही दिव्यांग होने के बावजूद कभी निराशा को हावी नहीं होने दिया।
अमर उजाला से बातचीत में गांव लाठ के सुधीर ने बताया कि वह वर्ष 2020 में जापान के टोक्यो में हुए पैरा ओलंपिक में क्वालीफाई कर गए थे, कोरोना महामारी के चलते वह दुबई में होने वाले अंतिम ट्रायल में भाग नहीं ले पाए थे। जिससे वह टोक्यो ओलंपिक में भाग नहीं ले सके। अब उस सपने को पेरिस ओलंपिक में पूरा करुंगा।
सुधीर लाठ ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में कभी निराशा को हावी नहीं होने दिया। पिता अर्द्ध सैनिक बल में थे। माता-पिता ने सदैव उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। इसी का नतीजा है कि वह स्वर्ण जीत सका। बर्मिंघम की धरती पर तिरंगा लहराना उनके लिए सबसे यादगार पल रहा। उस पल की खुशी को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। दिल में सिर्फ भारत मां की छवि थी। 212 किलोग्राम वजन उठा कर नया रिकार्ड बनाने की भी बहुत खुशी है। उन्होंने कहा कि देश से जाते हुए उन्हें अपनी मेहनत पर भरोसा था। सुधीर ने बताया कि अब उनका लक्ष्य पेरिस ओलंपिक में देश का राष्ट्रगान बजवाना है। इसके लिए कड़ी मेहनत अभी से शुरू करेंगे। अभ्यास को लेकर उन्होंने कहा कि वह फिलहाल देश में रहकर अभ्यास करेंगे। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में ही वह पसीना बहाएंगे। हालांकि साथ ही कहा कि अगर आवश्यकता हुई तो विदेश में भी अच्छी तकनीक सीखने से पीछे नहीं हटेंगे। अभी एशियन गेम्स की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह महज नौ साल की आयु में जिम में जाने लगे थे। पैरा खिलाड़ी वीरेंद्र का मार्गदर्शन मिला तो आगे बढ़ते चले गए।
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अमर उजाला से बातचीत में गांव लाठ के सुधीर ने बताया कि वह वर्ष 2020 में जापान के टोक्यो में हुए पैरा ओलंपिक में क्वालीफाई कर गए थे, कोरोना महामारी के चलते वह दुबई में होने वाले अंतिम ट्रायल में भाग नहीं ले पाए थे। जिससे वह टोक्यो ओलंपिक में भाग नहीं ले सके। अब उस सपने को पेरिस ओलंपिक में पूरा करुंगा।
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सुधीर लाठ ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में कभी निराशा को हावी नहीं होने दिया। पिता अर्द्ध सैनिक बल में थे। माता-पिता ने सदैव उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। इसी का नतीजा है कि वह स्वर्ण जीत सका। बर्मिंघम की धरती पर तिरंगा लहराना उनके लिए सबसे यादगार पल रहा। उस पल की खुशी को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। दिल में सिर्फ भारत मां की छवि थी। 212 किलोग्राम वजन उठा कर नया रिकार्ड बनाने की भी बहुत खुशी है। उन्होंने कहा कि देश से जाते हुए उन्हें अपनी मेहनत पर भरोसा था। सुधीर ने बताया कि अब उनका लक्ष्य पेरिस ओलंपिक में देश का राष्ट्रगान बजवाना है। इसके लिए कड़ी मेहनत अभी से शुरू करेंगे। अभ्यास को लेकर उन्होंने कहा कि वह फिलहाल देश में रहकर अभ्यास करेंगे। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में ही वह पसीना बहाएंगे। हालांकि साथ ही कहा कि अगर आवश्यकता हुई तो विदेश में भी अच्छी तकनीक सीखने से पीछे नहीं हटेंगे। अभी एशियन गेम्स की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह महज नौ साल की आयु में जिम में जाने लगे थे। पैरा खिलाड़ी वीरेंद्र का मार्गदर्शन मिला तो आगे बढ़ते चले गए।
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