{"_id":"59174dbe4f1c1b231f854d07","slug":"national-hockey-player-mother-catch-the-stick-for-our-daughter","type":"story","status":"publish","title_hn":"मां ने पकड़ी झाड़ू ताकि बेटी को थमा सके हॉकी स्टिक","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मां ने पकड़ी झाड़ू ताकि बेटी को थमा सके हॉकी स्टिक
ब्यूरो अमर उजाला सोनीपत
Updated Sat, 13 May 2017 11:47 PM IST
विज्ञापन
अपनी मां सावित्री देवी के साथ अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी नेहा गोयल।
- फोटो : amarujala beuro
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हर मां की चाहत होती है कि उसके बच्चे बुलंदियों को छुएं, लेकिन बेटी को ऊंचाइयों पर पहुंचाने के लिए दिन-रात मेहनत करने वाली मां किसी मिसाल से कम नहीं होती। सोनीपत के वेस्ट रामनगर में रहने वाली एक मां ने अपनी बेटी को हॉकी खिलाड़ी बनाने के लिए ऐसा ही कुछ किया। उन्होंने दूसरों के घरों में झाडू़-पोछा लगाया, फैक्ट्री में नौकरी करते हुए चमड़ा काटने का काम किया। मां की तपस्या का बेटी ने भी ऐसा फल दिया कि आज वह उस पर नाज करती हैं। बेटी ने हॉकी में दो बार भारत को चैंपियन बनाया और बेस्ट प्लेयर का अवार्ड हासिल किया। इसके सहारे ही बेटी को रेलवे में नौकरी मिल गई और आज वह देश के लिए हॉकी खेलने के साथ ही उस मां का सहारा बनी हैं।
15 साल पहले पिता छोड़ गए थे घर
वेस्ट रामनगर में रहने वाली सावित्री देवी के पति लगभग 15 साल पहले घर छोड़कर चले गए थे। उसके बाद घर की पूरी जिम्मेदारी सावित्री के सिर पर आ गई और वह किसी तरह मजदूरी करके अपना व तीन बेटियों का पेट भरने लगीं। सावित्री की छोटी बेटी नेहा गोयल ने 9 साल की उम्र में घर के पास ही चलने वाली हॉकी एकेडमी में लड़कियों को खेलता देखकर खुद भी खेलने की इच्छा जताई, लेकिन किसी तरह परिवार चला रही सावित्री देवी के लिए बेटी को प्रैक्टिस कराने के साथ ही किट व अन्य सामान दिलाने के लिए फूटी कौड़ी तक नहीं थी।
बेटी के लिए चमड़ा फैक्ट्री में भी किया काम
सावित्री ने बेटी को हॉकी खिलाने का जज्बा दिखाया और वह मजदूरी के साथ ही सुबह के समय आसपास के घरों में जाकर झाडू़-पोछा लगाने लगीं। उससे मिलने वाले रुपये से सावित्री देवी ने बेटी को हॉकी खेलने भेजना शुरू कर दिया। उसके बाद कई बार बेटी को बाहर खेलने जाना पड़ा तो सावित्री के पास रुपये नहीं थे। अब सावित्री के सामने परेशानी खड़ी हो गई और उन्होंने एक फैक्ट्री में नौकरी कर ली, जहां दिनभर चमड़ा काटने का काम करती थीं। उस फैक्ट्री में चमड़े के कारण अधिकतर मजदूरों को बीमारी झेलनी पड़ती थी, लेकिन सावित्री ने बेटी की खातिर सब कुछ सहन किया और आज उसे अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी बना दिया।
विज्ञापन
बेटी ने जीता बेस्ट प्लेयर का अवार्ड
मां सावित्री देवी की इस मेहनत को देखते हुए बेटी नेहा ने हॉकी में इतनी तेजी से मुकाम हासिल किया कि उसने 14 साल की उम्र में जूनियर नेशनल खेलने के बाद 2011 में जूनियर एशिया कप खेला और उसमें देश को कांस्य पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाई। उसी साल खेले गए अंडर-21 अंतर्राष्ट्रीय लाल बहादुर शास्त्री कप में भी नेहा गोयल को जगह मिली और उसमें न्यूजीलैंड, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया जैसी टीमों को हराकर देश को चैंपियन बनाया। इसमें नेहा को बेस्ट प्लेयर का अवार्ड भी मिला। वर्ष-2016 में हुए साउथ एशियन गेम्स में देश को चैंपियन बनाने में नेहा गोयल का अहम योगदान रहा। नेहा फारवर्ड पॉजिशन पर खेलती हैं और वह सीनियर टेस्ट मैच, चैंपियन कप समेत अन्य चैंपियनशिप में भी देश के लिए खेल चुकी हैं। इस समय भी वह रेलवे की ओर से खेलती हैं, क्योंकि रेलवे ने एक साल पहले ही उसकी प्रतिभा को देखते हुए खेल कोटे से नौकरी दी।
मां की मेहनत के दम पर यहां तक पहुंची
नेहा कहती हैं कि उनको इस मुकाम तक पहुंचाने में मां सावित्री देवी ने जिस तरह से मेहनत की है, इस तरह शायद ही कोई मेहनत कर सकता है। वह कहती हैं कि मां मजदूरी करके मुझे खेलने भेजती थी। एक बार हॉकी छोड़ने का मन बनाया, लेकिन मां ने हौसला बढ़ाया और वह किसी तरह मजदूरी के रुपये बचाकर मुझे खेलने भेजती रही। नेहा कहती हैं कि भारतीय हॉकी टीम की कप्तान रहीं उसकी कोच प्रीतम सिवाच व उनके पति कुलदीप ने भी उनका काफी सहयोग किया और अच्छी हॉकी खेलने के लिए प्रोत्साहित किया।
विज्ञापन
15 साल पहले पिता छोड़ गए थे घर
वेस्ट रामनगर में रहने वाली सावित्री देवी के पति लगभग 15 साल पहले घर छोड़कर चले गए थे। उसके बाद घर की पूरी जिम्मेदारी सावित्री के सिर पर आ गई और वह किसी तरह मजदूरी करके अपना व तीन बेटियों का पेट भरने लगीं। सावित्री की छोटी बेटी नेहा गोयल ने 9 साल की उम्र में घर के पास ही चलने वाली हॉकी एकेडमी में लड़कियों को खेलता देखकर खुद भी खेलने की इच्छा जताई, लेकिन किसी तरह परिवार चला रही सावित्री देवी के लिए बेटी को प्रैक्टिस कराने के साथ ही किट व अन्य सामान दिलाने के लिए फूटी कौड़ी तक नहीं थी।
विज्ञापन
बेटी के लिए चमड़ा फैक्ट्री में भी किया काम
सावित्री ने बेटी को हॉकी खिलाने का जज्बा दिखाया और वह मजदूरी के साथ ही सुबह के समय आसपास के घरों में जाकर झाडू़-पोछा लगाने लगीं। उससे मिलने वाले रुपये से सावित्री देवी ने बेटी को हॉकी खेलने भेजना शुरू कर दिया। उसके बाद कई बार बेटी को बाहर खेलने जाना पड़ा तो सावित्री के पास रुपये नहीं थे। अब सावित्री के सामने परेशानी खड़ी हो गई और उन्होंने एक फैक्ट्री में नौकरी कर ली, जहां दिनभर चमड़ा काटने का काम करती थीं। उस फैक्ट्री में चमड़े के कारण अधिकतर मजदूरों को बीमारी झेलनी पड़ती थी, लेकिन सावित्री ने बेटी की खातिर सब कुछ सहन किया और आज उसे अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी बना दिया।
विज्ञापन
बेटी ने जीता बेस्ट प्लेयर का अवार्ड
मां सावित्री देवी की इस मेहनत को देखते हुए बेटी नेहा ने हॉकी में इतनी तेजी से मुकाम हासिल किया कि उसने 14 साल की उम्र में जूनियर नेशनल खेलने के बाद 2011 में जूनियर एशिया कप खेला और उसमें देश को कांस्य पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाई। उसी साल खेले गए अंडर-21 अंतर्राष्ट्रीय लाल बहादुर शास्त्री कप में भी नेहा गोयल को जगह मिली और उसमें न्यूजीलैंड, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया जैसी टीमों को हराकर देश को चैंपियन बनाया। इसमें नेहा को बेस्ट प्लेयर का अवार्ड भी मिला। वर्ष-2016 में हुए साउथ एशियन गेम्स में देश को चैंपियन बनाने में नेहा गोयल का अहम योगदान रहा। नेहा फारवर्ड पॉजिशन पर खेलती हैं और वह सीनियर टेस्ट मैच, चैंपियन कप समेत अन्य चैंपियनशिप में भी देश के लिए खेल चुकी हैं। इस समय भी वह रेलवे की ओर से खेलती हैं, क्योंकि रेलवे ने एक साल पहले ही उसकी प्रतिभा को देखते हुए खेल कोटे से नौकरी दी।
मां की मेहनत के दम पर यहां तक पहुंची
नेहा कहती हैं कि उनको इस मुकाम तक पहुंचाने में मां सावित्री देवी ने जिस तरह से मेहनत की है, इस तरह शायद ही कोई मेहनत कर सकता है। वह कहती हैं कि मां मजदूरी करके मुझे खेलने भेजती थी। एक बार हॉकी छोड़ने का मन बनाया, लेकिन मां ने हौसला बढ़ाया और वह किसी तरह मजदूरी के रुपये बचाकर मुझे खेलने भेजती रही। नेहा कहती हैं कि भारतीय हॉकी टीम की कप्तान रहीं उसकी कोच प्रीतम सिवाच व उनके पति कुलदीप ने भी उनका काफी सहयोग किया और अच्छी हॉकी खेलने के लिए प्रोत्साहित किया।