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Sonipat News: म्हारी छोरियां.. कभी किट की मोहताज थी, अब संवार रही परिवार का जीवन

Tue, 22 Oct 2024 02:39 AM IST
रोहतक ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत Updated Tue, 22 Oct 2024 02:39 AM IST
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My daughters.. were once dependent on kits, now they are improving the life of the family.
हॉकी ​खिलाड़ी नेहा गोयल।
सोनीपत। नौ वर्ष की अवस्था में नेहा गोयल ने घर के पास स्थित हॉकी अकादमी में लड़कियों को खेलते देख खुद भी खेलने की इच्छा जताई। परिवार के पास किट खरीदने के पैसे नहीं थे। मां ने बेटी के जज्बे को देखते हुए घरों में साफ-सफाई व फैक्टरी में नौकरी कर उसे खेल मैदान में उतारा तो बेटी आगे बढ़ती ही चली गई। नेहा अब विश्वस्तर पर देश का नाम चमका रही हैं। नेहा को ओडिशा वारियर्स ने 10 लाख रुपये की बोली लगाकर अपनी टीम में खेलने के लिए खरीदा है।
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कभी फटे जूते पहनकर हॉकी मैदान में उतरने वाली नेहा ने इतनी तेजी से मुकाम हासिल किया कि उन्होंने महज 14 साल की उम्र में जूनियर नेशनल खेलने के बाद 2011 में जूनियर एशिया कप खेला और उसमें देश को कांस्य पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाई। उसी साल खेले गए अंडर-21 अंतरराष्ट्रीय लाल बहादुर शास्त्री कप में भी नेहा गोयल को जगह मिली और उसमें न्यूजीलैंड, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया जैसी टीमों को हराकर देश को चैंपियन बनाया। इसमें नेहा को बेस्ट प्लेयर का अवॉर्ड भी मिला। वर्ष-2016 में हुए साउथ एशियन गेम्स में देश को चैंपियन बनाने में नेहा गोयल का अहम योगदान रहा। नेहा फारवर्ड पोजिशन पर खेलती हैं और वह सीनियर टेस्ट मैच, चैंपियन कप समेत अन्य चैंपियनशिप में भी देश के लिए खेल चुकी हैं। इस समय भी वह रेलवे की ओर से खेलती हैं। रेलवे ने उनकी प्रतिभा को देखते हुए खेल कोटे से नौकरी दे रखी है।
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नेहा गोयल की उपलब्धियां
वर्ष 2018 के एशियाई खेलों में भारतीय महिला हॉकी टीम के लिए फाइनल मुकाबले में गोल दागना उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल हैं। उन्होंने भारत को एशियाई प्रतियोगिता में रजत पदक दिलाया। वह टोक्यो ओलंपिक में सेमीफाइनल तक पहुंचने वाली भारतीय टीम का हिस्सा रही हैं। अब ओडिशा वारियर्स ने उन्हें 10 लाख रुपये की बोली लगा अपनी टीम में खेलने के लिए खरीदा है।
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मां की मेहनत के दम पर यहां तक पहुंची
नेहा कहती हैं कि उनको इस मुकाम तक पहुंचाने में मां सावित्री देवी ने बहुत मेहनत की है। वह कहती हैं कि मां मजदूरी करके मुझे खेलने भेजती थीं। एक बार हॉकी छोड़ने का मन बनाया, लेकिन मां ने हौसला बढ़ाया और वह किसी तरह मजदूरी के रुपये बचाकर मुझे खेलने भेजती रहीं। नेहा कहती हैं कि भारतीय हॉकी टीम की पूर्व कप्तान व प्रशिक्षक रहीं उनकी कोच द्रोणाचार्य अवार्डी प्रीतम सिवाच व उनके पति कुलदीप ने भी उनका बहुत सहयोग किया और अच्छी हॉकी खेलने के लिए प्रोत्साहित किया है।
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