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सरकार ने किसानों से बातचीत के बीच कर्मियों को कानूनों के प्रचार को गांवों में उतारा, किसान नेता भी दूसरे राज्यों में छेड़ा अभियान

Thu, 31 Dec 2020 11:50 PM IST
रोहतक ब्यूरो अंकित चौहान, सोनीपत
अंकित चौहान, सोनीपत Published by: रोहतक ब्यूरो Updated Thu, 31 Dec 2020 11:50 PM IST
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central government send workers in village compaigning to farms law farmers also doing movement in other state
प्रदर्शन करते किसान (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
कृषि कानूनों को रद्द करने के लिए आंदोलन कर रहे किसानों व सरकार के बीच दोबारा से बातचीत का सिलसिला भले ही शुरू हुआ हो। इस बीच ही सरकार ने कर्मियों को कानूनों का प्रचार करने के लिए गांवों में उतार दिया है। हरियाणा व यूपी समेत अन्य कई राज्यों में पटवारी गांवों में जाकर भाजपा समर्थित 10 लोगों की सूची तैयार करने में जुटे है। उन लोगों के सहारे गांवों में कृषि कानूनों के समर्थन में जागरूकता अभियान शुरू भी कर दिया गया है। इस तरह से सरकार ने नया अभियान शुरू कराया है।
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वहीं किसान नेता भी बातचीत शुरू होने के बावजूद आंदोलन को कमजोर नहीं छोड़ना चाहते है और किसान नेता भी कानूनों का नुकसान बताने के लिए अभियान शुरू करते हुए दूसरे राज्यों में पहुंचने लगे है। जिससे उन राज्यों के अधिक से अधिक किसानों को आंदोलन से जोड़ा जा सके। इस तरह सरकार व किसान नेताओं दोनों ने अंदरूनी अभियान शुरू कर दिए हैं।
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कृषि कानून रद्द कराने के लिए किसान नेशनल हाईवे 44 के कुंडली बॉर्डर पर धरना देकर बैठे हुए है। किसानों ने 15 दिसंबर के आसपास आंदोलन को सामान्य तरीके से चलाया था और आंदोलन को बढ़ाने के लिए कोई रूपरेखा नहीं बनाई गई थी। लेकिन उस बीच ही सरकार ने कृषि कानूनों के समर्थन में अपना अभियान शुरू कर दिया था। जिसमें सभाएं की जा रही थी तो नेता रैलियों में केवल कृषि कानूनों पर भाषण देकर उसे किसानों के लिए फायदेमंद बता रहे थे।
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कृषि कानूनों के समर्थन में जिस तरह से अभियान शुरू किया गया था, उससे किसानों में नाराजगी बढ़ी और सरकार का रुख देखकर आंदोलन को दोबारा से तेज किया गया था। किसानों के तेवर तल्ख देखकर सरकार ने कृषि कानूनों के समर्थन में शुरू किए अपने अभियान को धीमा कर दिया था और किसानों से बातचीत के लिए प्रयास शुरू कर दिए थे। जहां बीच में किसानों व सरकार के बीच बातचीत की राह बंद हो गई थी, वहीं अब दोबारा से बातचीत शुरू हुई है। इस बार बातचीत के सकारात्मक परिणाम भी निकले है, लेकिन इस बीच ही सरकार ने नया अभियान शुरू कराया है। जिसके तहत हरियाणा, यूपी समेत भाजपा की सरकार वाले राज्यों में सरकारी कर्मियों को गांव-गांव में भेजा जा रहा है।

जिनमें पटवारी को सबसे ज्यादा जिम्मेदारी दी गई है। पटवारी गांवों में जाकर भाजपा समर्थित 10 लोगों की सूची हर गांव से तैयार करते है और उनको अपने गांव के लोगों को कृषि कानून के फायदे बताते हुए जागरूक करने के लिए कहा जा रहा है। यह अभियान काफी गांवों में शुरू हो गया है। वहीं सरकार के इस रूख को देखते हुए किसान नेता भी पीछे नहीं रहने वाले है। किसान नेताओं ने भी कृषि कानूनों के विरोध में किसानों को जागरूक करने के लिए अलग-अलग राज्यों में जाने का अभियान शुरू कर दिया है। इसके तहत किसान नेता जगजीत सिंह दल्लेवाल, शिवकुमार कक्का, अभिमन्यु कुहाड़, आईटी हेड बलजीत सिंह समेत अन्य नेता मध्य प्रदेश में पहुंचे और वहां कृषि कानूनों के नुकसान को बताने के साथ ही किसानों से आंदोलन में ज्यादा से ज्यादा शामिल होने की अपील की गई। इस तरह जहां सरकार व किसानों के बीच बातचीत चल रही है, वहीं दोनों ने अपने-अपने अभियान भी शुरू कर दिए है।

जिस दिन से कृषि कानून बनाए गए थे, उसी दिन से पंजाब के किसानों ने उनके बारे में पूरी जानकारी जुटाकर विरोध शुरू कर दिया था। यह जरूर हो सकता है कि पंजाब के किसानों ने आंदोलन को शुरू किया, लेकिन अब यह पूरे देश का आंदोलन बन चुका है। सरकार ने दो नए कानून बनाए है और एक में संशोधन किया गया है। अब आंदोलन हुआ तो सरकार यह भ्रम फैला रही है कि कृषि कानून से किसानों को फायदा है। इसके साथ ही आंदोलन को बदनाम करने का पूरा प्रयास किया जा रहा है। लेकिन जितने ज्यादा किसान आंदोलन में शामिल होंगे, सरकार पर उतना ही दबाव बढ़ेगा। इसके लिए किसानों को जागरूक किया जा रहा है, क्योंकि किसानों के हित के लिए कृषि कानून रद्द कराकर ही आंदोलन खत्म किया जाएगा। जगजीत सिंह दल्लेवाल, सदस्य संयुक्त किसान मोर्चा

कृषि कानून किसी भी तरह से किसान के लिए फायदेमंद नहीं है। किसान अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए सड़कों पर बैठा है। इतनी ठंड में कोई घर से बाहर भी नहीं निकलता है, लेकिन किसान सड़कों पर बैठा हुआ है। आंदोलन लगातार मजबूत हो रहा है और उसको तोडने के लिए किसान आंदोलन को बदनाम करने का प्रयास कर रही है। कोई आंदोलन में मदद करता है तो उसपर सवाल उठाती है। हमारे लोग विदेश में रहते है और वहां से मदद कर रहे है तो वह बाहरी लोगों की मदद नहीं है। बल्कि हमारे परिवार के लोग ही हमारी मदद कर रहे है। सरकार दिल्ली आने से भी किसानों को रोकने में लगी है, लेकिन किसान किसी भी हालत में रुकने वाले नहीं है। जिस तरह से सरकार का रुख है, उसी तरह से किसान डटकर खड़ा हुआ है। शिवकुमार कक्का, सदस्य संयुक्त किसान मोर्चा


अपनी जमीन को बचाने के लिए किसान आंदोलन कर रहा है। जिस तरह से ठंड हो रही है, ऐसे में सरकार का कोई नेता एक दिन भी सड़क पर रहकर देखे तो उसे पता चल जाएगा कि किसान किन परिस्थितियों से गुजर रहा है। उसके बाद भी सरकार लगातार आंदोलन को बदनाम करने का षडयंत्र रच रही है और कानूनों को फायदेमंद बताने के लिए अभियान चला रही है। सरकार को इस तरह की हरकत नहीं करनी चाहिए और कानूनों को जल्द से जल्द रद्द करना चाहिए। राजेंद्र आर्य दादूपुर, अध्यक्ष भारतीय किसान मजदूर नौजवान यूनियन
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