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सरकार का रुख देखकर किसानों के तेवर तल्ख, आंदोलन को बढ़ाने में जुटे
Fri, 11 Dec 2020 12:32 AM IST
रोहतक ब्यूरो
अंकित चौहान, सोनीपत
अंकित चौहान, सोनीपत
Published by: रोहतक ब्यूरो
Updated Fri, 11 Dec 2020 12:32 AM IST
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कृषि कानूनों को रद्द कराने के लिए नेशनल हाईवे 44 के सिंघु बॉर्डर पर धरना देकर बैठे किसानों ने सरकार का रुख देखकर तेवर तल्ख करने शुरू कर दिए हैं। सरकार की ओर से कानूनों में संशोधन के लिए प्रस्ताव आने के बाद किसानों की नाराजगी ज्यादा बढ़ी है और वह आंदोलन को बढ़ाने में जुट गए हैं। जहां अभी तक सीधे सरकार की खिलाफत चल रही थी, वहीं कारपोरेट घरानों के खिलाफ भी लड़ाई तेज कर दी गई तो उनकी कमर तोड़ने के लिए अभियान शुरू कर दिए गए है। जिसमें सबसे पहले एक नामी कंपनी का सिम पोर्ट कराने का अभियान छेड़ा है और धरनास्थल पर बैठे सैकड़ों किसानों व उनके परिजनों ने मैसेज भेजा है। हालांकि किसानों का हजारों सिम पोर्ट कराने के लिए मैसेज भेजने का दावा है।
नेशनल हाईवे 44 के सिंघु बॉर्डर पर किसानों ने डेरा डाला हुआ है और वहां आंदोलन चलते हुए 14 दिन बीत चुके हैं। सरकार से कई दौर की बातचीत के बावजूद अभी तक कोई फैसला नहीं हो सका है। जहां पहले कई दौर की बातचीत के बाद भी किसानों के तेवर ज्यादा तल्ख नहीं थे, लेकिन सरकार के प्रस्ताव के बाद किसानों व किसान संगठन प्रतिनिधियों के तेवर कुछ ज्यादा ही तल्ख हो गए हैं। किसान प्रतिनिधियों का मानना है कि सरकार ने जिस तरह से प्रस्ताव भेजा है और उसमें केवल खानापूर्ति की गई है। उससे लग रहा है कि सरकार आंदोलन व कृषि कानूनों के मुद्दे को लेकर अभी तक गंभीर नहीं है।
सरकार को लगता है कि किसान कुछ दिन यहां बैठकर वापस चले जाएंगे, लेकिन किसान आखिर तक इस लड़ाई को लड़ेंगे। किसानों ने दिल्ली को बाहर से घेरने के लिए सड़कों पर डेरा डाला हुआ है। वहीं अब सरकार का रुख देखकर दिल्ली के अंदर भी कूच करने की तैयारी है, जिससे दिल्ली को बाहर व अंदर दोनों जगह से घेरा जा सके। कारपोरेट घरानों के व्यापारिक व अन्य प्रतिष्ठानों के खिलाफ भी अभियान छेड़ दिया गया है, जिससे उसका असर भी सरकार पर दिखाई दे। इनके अलावा टोल फ्री, नेशनल हाईवे जाम आदि भी किसी न किसी तरह सरकार पर दबाव डालने के लिए किया जा रहा है। इनके अलावा भी कई कड़े फैसले जल्द ही सरकार का रुख देखकर किसान लेने की तैयारी कर रहे हैं। जिनमें रेलवे ट्रैक पर धरना देना भी शामिल होगा। धरनास्थल पर भाषणों में यह सब कुछ साफ दिखने लगा है कि किसान अब किसी भी तरह से पीछे हटने वाले नहीं हैं और वह केवल एक ही मांग पर अड़े है जो कृषि कानूनों को रद्द कराने की मांग है। इस तरह से सरकार पर दबाव बनाने के लिए रणनीति लगातार तैयार हो रही है जो आगे चलकर कड़ी होनी है।
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सिंघु बॉर्डर पर नहीं पहुंचने वालों से संपर्क करने में लगे
किसान आंदोलन को केवल धरनों तक सीमित नहीं रहने दिया जाए और इसको लगातार बढ़ाते रहे। इसके लिए किसान प्रतिनिधि लगातार देशभर के अलग-अलग राज्यों में किसान नेताओं से बातचीत करने में लगे हैं। उनसे कहा जा रहा है कि अगर वह सिंघु बॉर्डर पर नहीं आ सकते है तो अपने यहां आंदोलन करते रहे। उन आंदोलन की वीडियो भी सोशल मीडिया पर डाली जाए। उत्तर भारत के राज्यों में आंदोलन ज्यादा होने के कारण दक्षिण भारत के राज्यों पर भी ज्यादा जोर दिया जा रहा है।
यह कहना है किसान नेताओं का
सरकार ने प्रस्ताव भेजे थे, जिनमें कुछ नहीं था। इस तरह के प्रस्ताव से लग रहा है कि सरकार कुछ देना नहीं चाहती है और वह हठधर्मिता पर अड़ी है। अब बातचीत बंद हो चुकी है जो अभी आगे होती भी नहीं दिख रही है। किसानों को आंदोलन कड़ा करना होगा और उसकी रणनीति तैयार हो रही है। इसमें कुछ फैसले लिए गए है तो जल्द ही अन्य फैसले लिए जाएंगे। इसके लिए पूरे देश को एकजुट होने की जरूरत है और वह किसानों के साथ देने के लिए आगे आएं। जिससे कारपोरेट घरानों से छुटकारा मिल सके। किसान केवल एक ही मांग कर रहा है कि कृषि कानूनों को रद्द करके एमएसपी गारंटी कानून बनाया जाए।
- गुरनाम सिंह चढूनी, अध्यक्ष भाकियू हरियाणा
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सरकार ने जिस तरह के प्रस्ताव भेजे थे, उनको देखकर लगता था कि सरकार केवल खानापूर्ति कर रही है। वह किसानों की मांगों को गंभीरता से नहीं ले रही है। उन प्रस्ताव को खारिज करने के बाद आगे बातचीत बंद हो गई है। यह जरूर है कि सरकार आगे कोई प्रस्ताव देती है तो बातचीत शुरू की जाएगी। हमारी पहले भी यही मांग थी कि कृषि कानूनों को रद्द किया जाए और आगे भी यही मांग रहेगी। इसमें किसी तरह का कोई बदलाव नहीं होगा। जब तक सरकार इनको नहीं मानेगी। हमारा आंदोलन बंद नहीं होगा और इसको कड़ा किया जाएगा, जिससे सरकार को पता चल सके कि किसान अपनी मांगों के लिए किस हद तक जा सकते हैं।
- दर्शनपाल, सदस्य अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति
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नेशनल हाईवे 44 के सिंघु बॉर्डर पर किसानों ने डेरा डाला हुआ है और वहां आंदोलन चलते हुए 14 दिन बीत चुके हैं। सरकार से कई दौर की बातचीत के बावजूद अभी तक कोई फैसला नहीं हो सका है। जहां पहले कई दौर की बातचीत के बाद भी किसानों के तेवर ज्यादा तल्ख नहीं थे, लेकिन सरकार के प्रस्ताव के बाद किसानों व किसान संगठन प्रतिनिधियों के तेवर कुछ ज्यादा ही तल्ख हो गए हैं। किसान प्रतिनिधियों का मानना है कि सरकार ने जिस तरह से प्रस्ताव भेजा है और उसमें केवल खानापूर्ति की गई है। उससे लग रहा है कि सरकार आंदोलन व कृषि कानूनों के मुद्दे को लेकर अभी तक गंभीर नहीं है।
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सरकार को लगता है कि किसान कुछ दिन यहां बैठकर वापस चले जाएंगे, लेकिन किसान आखिर तक इस लड़ाई को लड़ेंगे। किसानों ने दिल्ली को बाहर से घेरने के लिए सड़कों पर डेरा डाला हुआ है। वहीं अब सरकार का रुख देखकर दिल्ली के अंदर भी कूच करने की तैयारी है, जिससे दिल्ली को बाहर व अंदर दोनों जगह से घेरा जा सके। कारपोरेट घरानों के व्यापारिक व अन्य प्रतिष्ठानों के खिलाफ भी अभियान छेड़ दिया गया है, जिससे उसका असर भी सरकार पर दिखाई दे। इनके अलावा टोल फ्री, नेशनल हाईवे जाम आदि भी किसी न किसी तरह सरकार पर दबाव डालने के लिए किया जा रहा है। इनके अलावा भी कई कड़े फैसले जल्द ही सरकार का रुख देखकर किसान लेने की तैयारी कर रहे हैं। जिनमें रेलवे ट्रैक पर धरना देना भी शामिल होगा। धरनास्थल पर भाषणों में यह सब कुछ साफ दिखने लगा है कि किसान अब किसी भी तरह से पीछे हटने वाले नहीं हैं और वह केवल एक ही मांग पर अड़े है जो कृषि कानूनों को रद्द कराने की मांग है। इस तरह से सरकार पर दबाव बनाने के लिए रणनीति लगातार तैयार हो रही है जो आगे चलकर कड़ी होनी है।
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सिंघु बॉर्डर पर नहीं पहुंचने वालों से संपर्क करने में लगे
किसान आंदोलन को केवल धरनों तक सीमित नहीं रहने दिया जाए और इसको लगातार बढ़ाते रहे। इसके लिए किसान प्रतिनिधि लगातार देशभर के अलग-अलग राज्यों में किसान नेताओं से बातचीत करने में लगे हैं। उनसे कहा जा रहा है कि अगर वह सिंघु बॉर्डर पर नहीं आ सकते है तो अपने यहां आंदोलन करते रहे। उन आंदोलन की वीडियो भी सोशल मीडिया पर डाली जाए। उत्तर भारत के राज्यों में आंदोलन ज्यादा होने के कारण दक्षिण भारत के राज्यों पर भी ज्यादा जोर दिया जा रहा है।
यह कहना है किसान नेताओं का
सरकार ने प्रस्ताव भेजे थे, जिनमें कुछ नहीं था। इस तरह के प्रस्ताव से लग रहा है कि सरकार कुछ देना नहीं चाहती है और वह हठधर्मिता पर अड़ी है। अब बातचीत बंद हो चुकी है जो अभी आगे होती भी नहीं दिख रही है। किसानों को आंदोलन कड़ा करना होगा और उसकी रणनीति तैयार हो रही है। इसमें कुछ फैसले लिए गए है तो जल्द ही अन्य फैसले लिए जाएंगे। इसके लिए पूरे देश को एकजुट होने की जरूरत है और वह किसानों के साथ देने के लिए आगे आएं। जिससे कारपोरेट घरानों से छुटकारा मिल सके। किसान केवल एक ही मांग कर रहा है कि कृषि कानूनों को रद्द करके एमएसपी गारंटी कानून बनाया जाए।
- गुरनाम सिंह चढूनी, अध्यक्ष भाकियू हरियाणा
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सरकार ने जिस तरह के प्रस्ताव भेजे थे, उनको देखकर लगता था कि सरकार केवल खानापूर्ति कर रही है। वह किसानों की मांगों को गंभीरता से नहीं ले रही है। उन प्रस्ताव को खारिज करने के बाद आगे बातचीत बंद हो गई है। यह जरूर है कि सरकार आगे कोई प्रस्ताव देती है तो बातचीत शुरू की जाएगी। हमारी पहले भी यही मांग थी कि कृषि कानूनों को रद्द किया जाए और आगे भी यही मांग रहेगी। इसमें किसी तरह का कोई बदलाव नहीं होगा। जब तक सरकार इनको नहीं मानेगी। हमारा आंदोलन बंद नहीं होगा और इसको कड़ा किया जाएगा, जिससे सरकार को पता चल सके कि किसान अपनी मांगों के लिए किस हद तक जा सकते हैं।
- दर्शनपाल, सदस्य अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति