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वर श्व गौरया दिवस : अब नहीं सुनाई देती गौरया की चहचाहट, पक्के मकानों ने कम की संख्या
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घर की अलमारी पर उपस्थित गौरेया।
- फोटो : Sirsa
सिरसा। एक समय था जब सुबह आंख खुलने से पहले ही चिड़िया यानी गौरेया की चहचहाहट शुरू हो जाती। बदलते समय के साथ गौरेया भी लुप्त होने की कगार पर जा पहुंची है। अब पक्के मकान हो गए हैं जो गौरेया को कतई पसंद नहीं है। लेकिन अभी भी कुछ लोग हैं जो गौरेया के संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में 15 से 20 साल पहले गौरेया की चहचहाहट से सूर्योदय होने का आभास होता था। अब गौरेया की प्रजाति धीरे-धीरे ग्रामीण क्षेत्रों से भी विलुप्त हो जा रही है। पहले गौरेया कच्चे घरों में घौसला बनाकर रहती थी। लेकिन अब कच्चे घरों की जगह पक्के मकानों ने ले ली है। जिसका प्रभाव गौरेया प्रजाति पर भी पड़ रहा है। इसके बावजूद अभी भी कई लोग ऐसे हैं जो गौरेया को बचाने के लिए प्रयासरत हैं। शहर की राम कॉलोनी में रहने वाले संजीव गोयल गौरेया की प्रजाति को बचाने के लिए पिछले 10 साल प्रयासरत हैं। संजीव गोयल ने अपने घर में गौरेया चिड़िया को पाला है। इस समय इनके पास करीब 50 गौरेया है। जिसका पालन-पोषण इनके परिवार द्वारा ही किया जाता है। उन्होंने अभी गौरेया का लिए घर, ब्रीडिंग के लिए घौसले, पेड़, बर्ड फीडर लगाए हुए हैं।
10 साल पहले परिवार की बातों ने किया प्रेरित
संजीव गोयल ने बताया कि करीब 10 साल पहले उनकी मौसी घर आई थी। परिवार के बीच गौरेया चिड़िया को लेकर बातें होने लगी। सब कहने लगे कि पहले गौरेया चिड़िया बहुत हुआ करती थी। घरों में ही घौसले बना लिया करती थी। लेकिन अब इन चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई नहीं देती है। इनकी प्रजाति जैसे विलुप्त ही हो गई है। संजीव गोयल ने बताया कि वो बचपन से ही पक्षी प्रेमी है। ऐसे में उन्होंने सोचा कि क्यों न गौरेया की प्रजाति को बचाने के लिए ही क्यों न काम किया जाए। जिसके बाद उन्होंने गौरेया का संरक्षण की दिशा में काम करना शुरू किया।
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शुरूआत में निराशा लगी हाथ
10 साल पहले संजीव गोयल ने अपने घर में बर्ड फीडर लगाया। लेकिन इसमें 2 से 3 महीने तक कोई भी चिड़िया नहीं आई। जिससे वो निराश हो गए और ये सब बंद करने का प्रयास किया। लेकिन इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर सर्च किया। इसके दौरान उन्हें पता चला कि एक फीडर में चिड़िया को आने में करीब 6 से 7 महीने लगते हैं। इसके बाद उन्होंने इंतजार किया। जिसके बाद गौरेया ने आना शुरू किया।
घर पर ही होती है गौरेया ब्रीडिंग
संजीव गोयल ने बताया कि उन्होंने घर पर ही 12 बर्ड हाउस बनाए हुए हैं। जिसमें गौरेया ब्रीडिंग करती है। इन हाउस को घर पर ही किसी ऊंचे स्थान पर लगाया गया है। चिड़ियों को बिल्ली से बचाकर ऊंचे स्थान पर रखना पड़ता है। क्योंकि अगर इन्हें कहीं नीचे स्थान पर रख लिया जाए तो बिल्ली इन्हें नुकसान पहुंचा सकती है।
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ग्रामीण क्षेत्रों में 15 से 20 साल पहले गौरेया की चहचहाहट से सूर्योदय होने का आभास होता था। अब गौरेया की प्रजाति धीरे-धीरे ग्रामीण क्षेत्रों से भी विलुप्त हो जा रही है। पहले गौरेया कच्चे घरों में घौसला बनाकर रहती थी। लेकिन अब कच्चे घरों की जगह पक्के मकानों ने ले ली है। जिसका प्रभाव गौरेया प्रजाति पर भी पड़ रहा है। इसके बावजूद अभी भी कई लोग ऐसे हैं जो गौरेया को बचाने के लिए प्रयासरत हैं। शहर की राम कॉलोनी में रहने वाले संजीव गोयल गौरेया की प्रजाति को बचाने के लिए पिछले 10 साल प्रयासरत हैं। संजीव गोयल ने अपने घर में गौरेया चिड़िया को पाला है। इस समय इनके पास करीब 50 गौरेया है। जिसका पालन-पोषण इनके परिवार द्वारा ही किया जाता है। उन्होंने अभी गौरेया का लिए घर, ब्रीडिंग के लिए घौसले, पेड़, बर्ड फीडर लगाए हुए हैं।
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10 साल पहले परिवार की बातों ने किया प्रेरित
संजीव गोयल ने बताया कि करीब 10 साल पहले उनकी मौसी घर आई थी। परिवार के बीच गौरेया चिड़िया को लेकर बातें होने लगी। सब कहने लगे कि पहले गौरेया चिड़िया बहुत हुआ करती थी। घरों में ही घौसले बना लिया करती थी। लेकिन अब इन चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई नहीं देती है। इनकी प्रजाति जैसे विलुप्त ही हो गई है। संजीव गोयल ने बताया कि वो बचपन से ही पक्षी प्रेमी है। ऐसे में उन्होंने सोचा कि क्यों न गौरेया की प्रजाति को बचाने के लिए ही क्यों न काम किया जाए। जिसके बाद उन्होंने गौरेया का संरक्षण की दिशा में काम करना शुरू किया।
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शुरूआत में निराशा लगी हाथ
10 साल पहले संजीव गोयल ने अपने घर में बर्ड फीडर लगाया। लेकिन इसमें 2 से 3 महीने तक कोई भी चिड़िया नहीं आई। जिससे वो निराश हो गए और ये सब बंद करने का प्रयास किया। लेकिन इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर सर्च किया। इसके दौरान उन्हें पता चला कि एक फीडर में चिड़िया को आने में करीब 6 से 7 महीने लगते हैं। इसके बाद उन्होंने इंतजार किया। जिसके बाद गौरेया ने आना शुरू किया।
घर पर ही होती है गौरेया ब्रीडिंग
संजीव गोयल ने बताया कि उन्होंने घर पर ही 12 बर्ड हाउस बनाए हुए हैं। जिसमें गौरेया ब्रीडिंग करती है। इन हाउस को घर पर ही किसी ऊंचे स्थान पर लगाया गया है। चिड़ियों को बिल्ली से बचाकर ऊंचे स्थान पर रखना पड़ता है। क्योंकि अगर इन्हें कहीं नीचे स्थान पर रख लिया जाए तो बिल्ली इन्हें नुकसान पहुंचा सकती है।