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Sirsa News: आज महिलाएं बच्चों की लंबी उम्र के लिए रखेंगी संतान सप्तमी का उपवास
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सिरसा। सनातन धर्म में संतान सप्तमी व्रत का खास महत्व है। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने बच्चों की भलाई और सुरक्षा के लिए व्रत रखती हैं। इसके साथ ही शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं। वैदिक पंचांग के अनुसार, संतान सप्तमी का व्रत भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को रखा जाता है। संतान की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए 30 अगस्त को व्रत रखा जाएगा।
यह व्रत खासतौर पर पूर्वांचल से जुड़े परिवारों की महिलाएं करती हैं। दिनभर निर्जल रहकर महिलाएं संतान की मंगलकामना करेंगी। शाम के समय महिलाएं घरों और मंदिरों में एकत्र होकर संतान साते माता की पूजा-अर्चना करेंगी और पारंपरिक विधि-विधान से कथा सुनेंगी। कथा सुनने के बाद महिलाएं अपने बच्चों के स्वस्थ और दीर्घायु होने का आशीर्वाद मांगेंगी।
इस व्रत की विशेषता यह है कि महिलाएं इसे रातभर निभाती हैं और अगले दिन सूर्योदय से पहले व्रत खोलती हैं। धार्मिक मान्यता है कि संतान साते व्रत करने से संतान पर आने वाली विपत्तियां टल जाती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
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पूर्वांचल की महिलाएं मनाती हैं यह त्योहार
यह व्रत मुख्य रूप से पूर्वांचल से जुड़े परिवारों की महिलाएं करती हैं। परंपरा के अनुसार यह पर्व पीढ़ियों से चला आ रहा है और इसे संतान के कल्याण से जुड़ा माना जाता है। इस दिन महिलाएं सुबह उठकर नहाकर स्वच्छ वस्त्र धारण करती है। व्रत के दौरान शाम को महिलाएं मंदिरों और घरों में एकत्र होकर पूजा-अर्चना करेंगी। इसके साथ ही वे संतान साते माता की कथा भी सुनेंगी और अपने बच्चों के स्वस्थ जीवन की प्रार्थना करेंगी।
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यह व्रत खासतौर पर पूर्वांचल से जुड़े परिवारों की महिलाएं करती हैं। दिनभर निर्जल रहकर महिलाएं संतान की मंगलकामना करेंगी। शाम के समय महिलाएं घरों और मंदिरों में एकत्र होकर संतान साते माता की पूजा-अर्चना करेंगी और पारंपरिक विधि-विधान से कथा सुनेंगी। कथा सुनने के बाद महिलाएं अपने बच्चों के स्वस्थ और दीर्घायु होने का आशीर्वाद मांगेंगी।
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इस व्रत की विशेषता यह है कि महिलाएं इसे रातभर निभाती हैं और अगले दिन सूर्योदय से पहले व्रत खोलती हैं। धार्मिक मान्यता है कि संतान साते व्रत करने से संतान पर आने वाली विपत्तियां टल जाती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
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पूर्वांचल की महिलाएं मनाती हैं यह त्योहार
यह व्रत मुख्य रूप से पूर्वांचल से जुड़े परिवारों की महिलाएं करती हैं। परंपरा के अनुसार यह पर्व पीढ़ियों से चला आ रहा है और इसे संतान के कल्याण से जुड़ा माना जाता है। इस दिन महिलाएं सुबह उठकर नहाकर स्वच्छ वस्त्र धारण करती है। व्रत के दौरान शाम को महिलाएं मंदिरों और घरों में एकत्र होकर पूजा-अर्चना करेंगी। इसके साथ ही वे संतान साते माता की कथा भी सुनेंगी और अपने बच्चों के स्वस्थ जीवन की प्रार्थना करेंगी।