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Sirsa News: ओढां के स्वतंत्रता सेनानियों ने ब्रिटिश फौज पर गोलीबारी कर नाकों तले चने चबाने पर किया दिया मजबूर
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राजू
ओढां। राजू
ओढां। स्वतंत्रता की लड़ाई में ओढां के सेनानियों ने अपनी अहम भूमिका निभाई। गांव के रतीराम, बचन सिंह, हरदम सिंह व मुंशीराम सुभाष ब्रिगेड में शामिल होकर ब्रिटिश फौज पर गोलीबारी कर उन्हें नाकों चने चबाने पर मजबूर कर दिया था।
परिजनों द्वारा सहज कर रखे गए उनके मेडल व निशानियां आज भी उनकी वीरता की दास्तां को बयां करते हैं।
स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों में कहीं न कहीं नाराजगी देखने को मिल रही है। उनका कहना है कि सरकार ने स्वतंत्रता सेनानियों को भुला दिया है। उनके नाम से न ही तो कोई स्मारक या पार्क बनाया गया और न ही उनके परिजनों को किन्हीं योजनाओं का लाभ दिया गया। परिजनों ने अपनी टीस व्यक्त करते हुए कहा कि जिन स्वतंत्रता सेनानियों की बदौलत हमें आजादी मिली है उन्हें ही समय बीतने के अनुसार भुलाया जा रहा है। संवाद
15 फरवरी 1942 को आईएनए में शामिल हुए थे रतीराम
गांव के रतीराम गोदारा दूसरे विश्वयुद्ध के समय ब्रिटिश फौज में भर्ती कर सिंगापुर में लड़ने के लिए गए थे। फरवरी 1942 में ब्रिटिश फौज ने जापान के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। उन्हें साथियों सहित बंदी बना लिया गया। इसके बाद रतीराम 15 फरवरी 1942 को आईएनए में शामिल हो गए। जून 1943 में जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस जर्मनी से जापान आए और आईएनए को दोबारा तरतीब दी तो रतीराम को सुभाष ब्रिगेड में शामिल कर लिया गया। उन्होंने पॉपाहिल सहित अन्य जगहों पर युद्ध में भाग लिया। 1945 में जापान के पतन के कारण आईएनए ने भी समर्पण कर दिया। रतीराम को बंदी बना लिया गया। उन्हें जगर गच्छा जेल में रखा गया। बाद में समझौता होने पर उन्हें रिहा कर दिया गया। 19 नवंबर 2004 उनको देहांत गया। रतीराम के बेटे रामप्रसाद व रामचंद ने बताया कि सरकार ने उनके पिता या अन्य स्वतंत्रता सैनानियों के नाम से कोई स्मारक नहीं बनाया और न ही उन्हें विभागीय योजनाओं का लाभ मिला।
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बचन सिंह गिल ने आईएनए में भर्ती होकर संभाला तोपखाना
बचन सिंह गिल 1939 में दूसरे विश्वयुद्ध के समय ब्रिटिश फौज में भर्ती हुए। उन्हें सिंगापुर में जापान के खिलाफ लड़ाई के लिए भेजा गया। यहां उन्हें साथियों सहित बंदी बना लिया गया। इसके बाद वे आईएनए में शामिल हो गए। उन्हें तोपखाने मेंं रखा गया। बचन सिंह ने ब्रिटिश फौज पर गोलीबारी कर उन्हें नाकों चने चबा दिया। इसके बाद जापान के आत्मसमर्पण करने के कारण उन्हें बंदी बनाकर जगर गच्छा जेल में रखा गया। समझौते के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। इनका देहांत 18 मार्च 2005 को हुआ। बचन सिंह का पुत्र जसकरण सिंह दिव्यांग है और अविवाहित है। उन्होंने कहा कि उनके पिता स्वतंत्रता सेनानी रहे, लेकिन सरकार ने उनके देहांत के बाद कोई सुध नहीं ली। वह सिर्फ बुढ़ापा पेंशन पर ही आश्रित है।
जगर गच्छा जेल में बंद रहे हरदम सिंह
हरदम सिंंह ने 1945 से 1946 तक आईएनए में शामिल होकर लड़ाई लड़ी। बंदी बनाए जाने के बाद उन्हें जगर गच्छा जेल में रखा गया। हरदम सिंह मलकाना का 13 मार्च 2014 को देहांत हुआ। उनके परिजनों ने बताया कि उनके बुजुर्ग उन्हें विभिन्न जगहों पर हुए युद्धों सहित देशभक्ति की बातें सुनाया करते, लेकिन एक स्वतंत्रता सेनानी होने के बावजूद भी सरकार ने उनकी देहांत के बाद कोई सुध नहीं ली। उन्होंने कहा कि सरकार को चाहिए कि स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर कोई स्मारक बनाया जाए।
अंग्रेजों ने लड़ने भेजा सिंगापुर आजाद हिंद फौज में हो गए भर्ती
मुंशीराम का जन्म सन् 1917 में हिमाचल प्रदेश में हुआ। नंगल डेम बनने के बाद वे ओढां में आ गए। मुंशीराम ने उर्दू की शिक्षा प्राप्त की थी। वे 10 अप्रैल 1941 को ब्रिटिश फौज में भर्ती हुए और उन्हें सिंगापुर भेज दिया गया। वहां उन्हें बंदी बना लिया गया। इसके बाद वे आजाद हिंद फौज मेें भर्ती हुए। यहां उन्हें फिर से बंदी बनाकर जगर गच्छा जेल में भेज दिया गया। मुंशीराम का देहांत 16 जून 2005 को ओढां में हुआ। उनकी पुत्रवधु निर्मला देवी ने अफसोस व्यक्त करते हुए कहा कि उन्हें न ही तो कोई योजना का लाभ दिया गया और न ही उनके नाम से कोई स्मारक या संस्थान का नाम रखा गया।
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ओढां। राजू
ओढां। स्वतंत्रता की लड़ाई में ओढां के सेनानियों ने अपनी अहम भूमिका निभाई। गांव के रतीराम, बचन सिंह, हरदम सिंह व मुंशीराम सुभाष ब्रिगेड में शामिल होकर ब्रिटिश फौज पर गोलीबारी कर उन्हें नाकों चने चबाने पर मजबूर कर दिया था।
परिजनों द्वारा सहज कर रखे गए उनके मेडल व निशानियां आज भी उनकी वीरता की दास्तां को बयां करते हैं।
स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों में कहीं न कहीं नाराजगी देखने को मिल रही है। उनका कहना है कि सरकार ने स्वतंत्रता सेनानियों को भुला दिया है। उनके नाम से न ही तो कोई स्मारक या पार्क बनाया गया और न ही उनके परिजनों को किन्हीं योजनाओं का लाभ दिया गया। परिजनों ने अपनी टीस व्यक्त करते हुए कहा कि जिन स्वतंत्रता सेनानियों की बदौलत हमें आजादी मिली है उन्हें ही समय बीतने के अनुसार भुलाया जा रहा है। संवाद
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15 फरवरी 1942 को आईएनए में शामिल हुए थे रतीराम
गांव के रतीराम गोदारा दूसरे विश्वयुद्ध के समय ब्रिटिश फौज में भर्ती कर सिंगापुर में लड़ने के लिए गए थे। फरवरी 1942 में ब्रिटिश फौज ने जापान के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। उन्हें साथियों सहित बंदी बना लिया गया। इसके बाद रतीराम 15 फरवरी 1942 को आईएनए में शामिल हो गए। जून 1943 में जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस जर्मनी से जापान आए और आईएनए को दोबारा तरतीब दी तो रतीराम को सुभाष ब्रिगेड में शामिल कर लिया गया। उन्होंने पॉपाहिल सहित अन्य जगहों पर युद्ध में भाग लिया। 1945 में जापान के पतन के कारण आईएनए ने भी समर्पण कर दिया। रतीराम को बंदी बना लिया गया। उन्हें जगर गच्छा जेल में रखा गया। बाद में समझौता होने पर उन्हें रिहा कर दिया गया। 19 नवंबर 2004 उनको देहांत गया। रतीराम के बेटे रामप्रसाद व रामचंद ने बताया कि सरकार ने उनके पिता या अन्य स्वतंत्रता सैनानियों के नाम से कोई स्मारक नहीं बनाया और न ही उन्हें विभागीय योजनाओं का लाभ मिला।
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बचन सिंह गिल ने आईएनए में भर्ती होकर संभाला तोपखाना
बचन सिंह गिल 1939 में दूसरे विश्वयुद्ध के समय ब्रिटिश फौज में भर्ती हुए। उन्हें सिंगापुर में जापान के खिलाफ लड़ाई के लिए भेजा गया। यहां उन्हें साथियों सहित बंदी बना लिया गया। इसके बाद वे आईएनए में शामिल हो गए। उन्हें तोपखाने मेंं रखा गया। बचन सिंह ने ब्रिटिश फौज पर गोलीबारी कर उन्हें नाकों चने चबा दिया। इसके बाद जापान के आत्मसमर्पण करने के कारण उन्हें बंदी बनाकर जगर गच्छा जेल में रखा गया। समझौते के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। इनका देहांत 18 मार्च 2005 को हुआ। बचन सिंह का पुत्र जसकरण सिंह दिव्यांग है और अविवाहित है। उन्होंने कहा कि उनके पिता स्वतंत्रता सेनानी रहे, लेकिन सरकार ने उनके देहांत के बाद कोई सुध नहीं ली। वह सिर्फ बुढ़ापा पेंशन पर ही आश्रित है।
जगर गच्छा जेल में बंद रहे हरदम सिंह
हरदम सिंंह ने 1945 से 1946 तक आईएनए में शामिल होकर लड़ाई लड़ी। बंदी बनाए जाने के बाद उन्हें जगर गच्छा जेल में रखा गया। हरदम सिंह मलकाना का 13 मार्च 2014 को देहांत हुआ। उनके परिजनों ने बताया कि उनके बुजुर्ग उन्हें विभिन्न जगहों पर हुए युद्धों सहित देशभक्ति की बातें सुनाया करते, लेकिन एक स्वतंत्रता सेनानी होने के बावजूद भी सरकार ने उनकी देहांत के बाद कोई सुध नहीं ली। उन्होंने कहा कि सरकार को चाहिए कि स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर कोई स्मारक बनाया जाए।
अंग्रेजों ने लड़ने भेजा सिंगापुर आजाद हिंद फौज में हो गए भर्ती
मुंशीराम का जन्म सन् 1917 में हिमाचल प्रदेश में हुआ। नंगल डेम बनने के बाद वे ओढां में आ गए। मुंशीराम ने उर्दू की शिक्षा प्राप्त की थी। वे 10 अप्रैल 1941 को ब्रिटिश फौज में भर्ती हुए और उन्हें सिंगापुर भेज दिया गया। वहां उन्हें बंदी बना लिया गया। इसके बाद वे आजाद हिंद फौज मेें भर्ती हुए। यहां उन्हें फिर से बंदी बनाकर जगर गच्छा जेल में भेज दिया गया। मुंशीराम का देहांत 16 जून 2005 को ओढां में हुआ। उनकी पुत्रवधु निर्मला देवी ने अफसोस व्यक्त करते हुए कहा कि उन्हें न ही तो कोई योजना का लाभ दिया गया और न ही उनके नाम से कोई स्मारक या संस्थान का नाम रखा गया।