{"_id":"576045fc4f1c1bc61011b95d","slug":"sirsa-hindi-news-dhann-sirsa","type":"story","status":"publish","title_hn":"बारिश का एमएम घटा पर धान का रकबा बढ़ा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बारिश का एमएम घटा पर धान का रकबा बढ़ा
ब्यूरो/अमर उजाला, सिरसा
Updated Tue, 14 Jun 2016 11:29 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पिछले एक दशक से बारिश कम हो रही है, जबकि जिले में धान के रकबे की फसल में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। किसान बारिश का इंतजार न करके धीरे-धीरे ट्यूबवेलों पर निर्भर हो रहे हैं। अगर बारिश इसी तरह होती रही तो वह दिन दूर नहीं जब पानी के लिए हाहाकार मच जाएगा। सबसे अधिक इसका असर कृषि पर पड़ेगा। बिन पानी क्या होगा। अब तो प्रकृति ही इस समस्या से निजात दिला सकती है। वहीं किसान हो या आम आदमी भूजल दोहन तो कर रहा, लेकिन इसके निदान के बारे में कोई सोच नहीं रहा।
पिछले चार दशकों पर नजर डालें तो हर दशक में बारिश कम ही होती जा रही है। 70 के दशक में जिले में 800-1000 एमएम बरसात हर वर्ष होती थी जो कि अब घटकर 150 से 250 एमएम तक रह गई है। इस वर्ष भी बारिश के आंकड़े ने अब तक 40 एमएम को पार नहीं किया है। पानी से ही बेहतर कृषि संभव है। कृषि में बारिश का बहुत बड़ा योगदान है।
वहीं दूसरी ओर जिले में भूजल का दोहन करके लगातार धान के रकबे की फसल ज्यादा बोई जा रही है। इसी कमी को पूरा करने के लिए अंधाधुंध ट्यूबवेल लगाए जा रहे हैं। अब तक जिले में करीब 50 हजार ट्यूबवेल लग चुके हैं। इससे भूजल का दोहन होता है। इसीलिए भूजल स्तर भी वर्ष दर वर्ष नीचे जा रहा है। बरसात कम होने क्रम इसी प्रकार रहा और भूजल स्तर इसी गति से नीचे जाता रहा तो न केवल कृषि के लिए पानी की किल्लत हो जाएगी, बल्कि जीव जंतुओं का जीवन भी खतरे में पड़ जाएगा। गंभीर परिणाम को लेकर अब तक कोई चेता नहीं है। न तो बरसात के पानी का संरक्षण किया जा रहा है। न ही जल बचाने के लिए ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। भूजल को रिचार्ज करने के लिए भी रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं लग रहे हैं। घग्घर नदी के पानी को भी भूजल रिचार्ज के लिए उपयोग में लाया जा सकता है पर इस क्षेत्र में अब तक कोई प्रस्ताव नहीं बन पाया है।
विज्ञापन
जिले में धान का रकबा भी निरंतर बढ़ रहा है जिससे पेयजल संकट और ज्यादा बढ़ सकता है। वर्ष 1975 में जिले में 13000, 1985 में 23000, 1995 में 26000, 2000 में 40000, 2005 में 46000, 2010 में 65000 और 2015 में 90000 हेक्टेयर में धान की बिजाई हुई। धान की खेती में पानी की सबसे अधिक खपत होती है इसीलिए कृषि विभाग द्वारा धान की सीधी बिजाई पर जोर दिया जा रहा है। कृषि उप निदेशक बाबू लाल ने बताया कि धान की सीधी बिजाई करने से पानी की बहुत ज्यादा बचत होती और उत्पादन में कोई फर्क नहीं पड़ता। धान की सीधी बिजाई के लिए विभाग द्वारा किसानों को जागरूक किया जा रहा है। डेमो भी लगाए जा रहे हैं ताकि पानी की अधिक से अधिक बचत हो सके। भूजल कोष के सहायक भूवैज्ञानिक डॉ. विरेंद्र यादव ने कहा कि जिन खंडों में स्थिति बहुत ही गंभीर हो गई हैं उन खंडों में नए ट्यूबवेल लगाने पर पाबंदी लगा दी गई है। उन्होंने बताया कि अब किसी भी भवन का नक्श पास तभी होगा जब रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगा होगा। उन्होंने बताया कि वर्ल्ड बैंक की स्कीम अभी पाइप लाइन में है इसके लागू होने के बाद जिस क्षेत्र में भूजल स्तर अधिक नीचे जा चुका है वहां पर नहरी पानी से भूजल स्तर को रिचार्ज किया जाएगा।
वर्ष धान की बिजाई
1975 में 13000 हेक्टेयर में
1985 में 23000हेक्टेयर में
1995 में 26000 हेक्टेयर में
2000 में 40000 हेक्टेयर में
2005 में 46000 हेक्टेयर में
2010 में 65000 हेक्टेयर में
2015 में 90000 हेक्टेयर में
बरसात का विवरण (एमएम में)
केंद्र का नाम वर्ष 2015 2014 2013 2012 2011 2010
सिरसा 289 320 346 281 478 476
ओटू 138 127 210 161 496 443
पंजुआना 227 215 255 136 376 221
रोड़ी 83 174 266 233 273 252
कालांवाली 123 172 185 144 312 213
खुईयां 129 130 190 119 294 226
अबूब शहर 131 112 111 141 299 155
गोलेवाला 121 143 218 119 218 208
भूजल स्तर मीटर में
खंड का नाम वर्ष 2016 2015 2014 2013 2012
बड़ागुढा 9.27 9.16 9.01 9.02 8.81
डबवाली 12.17 12.10 11.43 11.25 10 .77
नाथूसारी चौपटा 9.99 10.34 10.69 10.18 9.04
ऐलनाबाद 25.08 24.97 23.66 21.52 20.43
ओढां 12.04 12.12 12.04 12.15 12.10
सिरसा 43.75 37.91 38.07 37.24 37.69
रानियां 27.36 26.36 25.07 23.06 22.43
विज्ञापन
पिछले चार दशकों पर नजर डालें तो हर दशक में बारिश कम ही होती जा रही है। 70 के दशक में जिले में 800-1000 एमएम बरसात हर वर्ष होती थी जो कि अब घटकर 150 से 250 एमएम तक रह गई है। इस वर्ष भी बारिश के आंकड़े ने अब तक 40 एमएम को पार नहीं किया है। पानी से ही बेहतर कृषि संभव है। कृषि में बारिश का बहुत बड़ा योगदान है।
विज्ञापन
वहीं दूसरी ओर जिले में भूजल का दोहन करके लगातार धान के रकबे की फसल ज्यादा बोई जा रही है। इसी कमी को पूरा करने के लिए अंधाधुंध ट्यूबवेल लगाए जा रहे हैं। अब तक जिले में करीब 50 हजार ट्यूबवेल लग चुके हैं। इससे भूजल का दोहन होता है। इसीलिए भूजल स्तर भी वर्ष दर वर्ष नीचे जा रहा है। बरसात कम होने क्रम इसी प्रकार रहा और भूजल स्तर इसी गति से नीचे जाता रहा तो न केवल कृषि के लिए पानी की किल्लत हो जाएगी, बल्कि जीव जंतुओं का जीवन भी खतरे में पड़ जाएगा। गंभीर परिणाम को लेकर अब तक कोई चेता नहीं है। न तो बरसात के पानी का संरक्षण किया जा रहा है। न ही जल बचाने के लिए ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। भूजल को रिचार्ज करने के लिए भी रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं लग रहे हैं। घग्घर नदी के पानी को भी भूजल रिचार्ज के लिए उपयोग में लाया जा सकता है पर इस क्षेत्र में अब तक कोई प्रस्ताव नहीं बन पाया है।
विज्ञापन
जिले में धान का रकबा भी निरंतर बढ़ रहा है जिससे पेयजल संकट और ज्यादा बढ़ सकता है। वर्ष 1975 में जिले में 13000, 1985 में 23000, 1995 में 26000, 2000 में 40000, 2005 में 46000, 2010 में 65000 और 2015 में 90000 हेक्टेयर में धान की बिजाई हुई। धान की खेती में पानी की सबसे अधिक खपत होती है इसीलिए कृषि विभाग द्वारा धान की सीधी बिजाई पर जोर दिया जा रहा है। कृषि उप निदेशक बाबू लाल ने बताया कि धान की सीधी बिजाई करने से पानी की बहुत ज्यादा बचत होती और उत्पादन में कोई फर्क नहीं पड़ता। धान की सीधी बिजाई के लिए विभाग द्वारा किसानों को जागरूक किया जा रहा है। डेमो भी लगाए जा रहे हैं ताकि पानी की अधिक से अधिक बचत हो सके। भूजल कोष के सहायक भूवैज्ञानिक डॉ. विरेंद्र यादव ने कहा कि जिन खंडों में स्थिति बहुत ही गंभीर हो गई हैं उन खंडों में नए ट्यूबवेल लगाने पर पाबंदी लगा दी गई है। उन्होंने बताया कि अब किसी भी भवन का नक्श पास तभी होगा जब रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगा होगा। उन्होंने बताया कि वर्ल्ड बैंक की स्कीम अभी पाइप लाइन में है इसके लागू होने के बाद जिस क्षेत्र में भूजल स्तर अधिक नीचे जा चुका है वहां पर नहरी पानी से भूजल स्तर को रिचार्ज किया जाएगा।
वर्ष धान की बिजाई
1975 में 13000 हेक्टेयर में
1985 में 23000हेक्टेयर में
1995 में 26000 हेक्टेयर में
2000 में 40000 हेक्टेयर में
2005 में 46000 हेक्टेयर में
2010 में 65000 हेक्टेयर में
2015 में 90000 हेक्टेयर में
बरसात का विवरण (एमएम में)
केंद्र का नाम वर्ष 2015 2014 2013 2012 2011 2010
सिरसा 289 320 346 281 478 476
ओटू 138 127 210 161 496 443
पंजुआना 227 215 255 136 376 221
रोड़ी 83 174 266 233 273 252
कालांवाली 123 172 185 144 312 213
खुईयां 129 130 190 119 294 226
अबूब शहर 131 112 111 141 299 155
गोलेवाला 121 143 218 119 218 208
भूजल स्तर मीटर में
खंड का नाम वर्ष 2016 2015 2014 2013 2012
बड़ागुढा 9.27 9.16 9.01 9.02 8.81
डबवाली 12.17 12.10 11.43 11.25 10 .77
नाथूसारी चौपटा 9.99 10.34 10.69 10.18 9.04
ऐलनाबाद 25.08 24.97 23.66 21.52 20.43
ओढां 12.04 12.12 12.04 12.15 12.10
सिरसा 43.75 37.91 38.07 37.24 37.69
रानियां 27.36 26.36 25.07 23.06 22.43