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राम ने सुबाहु व ताड़का का वध कर ऋषियों को किया भय मुक्त : दाधीच
Sun, 18 Feb 2024 12:11 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा
Updated Sun, 18 Feb 2024 12:11 AM IST
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कथावाचन करते शास्त्री जयदेव दाधीच व उपस्थित श्रद्धालु।
ओढां। गांव पन्नीवाला मोटा में स्थित कृष्ण गोशाला में चल रही रामकथा का श्रद्धालु भरपूर लाभ उठा रहे हैं। चौथे दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने पहुंचकर कथा का श्रवण किया। कथा में बिजली मंत्री चौधरी रणजीत सिंह के पौत्र सूर्य प्रकाश ने विशेष रूप से शिरकत की। कथावाचक शास्त्री जयदेव दाधीच ने श्रद्धालुओं को भगवान की गुरुकुल की शिक्षा, ताड़का व सुबाहु वध तथा अहिल्या के उद्धार का प्रसंग सुनाया।
कथावाचक ने सुनाया कि राम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न को गुरुकुल में ऋषि वशिष्ठ के आश्रम में शिक्षा लेने के लिए भेज दिया जाता है। गुरुकुल में राम अपनी बाल लीलाओं व बेहद शालीन स्वभाव के चलते सबके प्रिय थे। शिक्षा संपन्न होने के बाद चारों भाई वापस अयोध्या लौटे। कथावाचक ने सुनाया कि एक बार ऋषि विश्वामित्र अयोध्या पहुंचे और महाराज दशरथ से उनके पुत्र राम और लक्ष्मण को यज्ञ की रक्षा के लिए उनके साथ भेजने के लिए कहते हैं, लेकिन महाराज दशरथ कहते हैं राम और लक्ष्मण अभी बाल्यावस्था में है इसलिए वे उनकी जगह उनकी सेना को ले जाएं।
लेकिन ऋषि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को ही मांगते हैं। महाराज दशरथ ऋषि विश्वामित्र को इन्कार नहीं सके और राम और लक्ष्मण को उनके साथ भेज दिया। फिर ऋषि विश्वामित्र व अन्य ऋषि-मुनि मिलकर यज्ञ शुरू करते हैं और राम और लक्ष्मण यज्ञ की रक्षा के लिए वहां पहरा देने लग गए। जैसे ही राक्षस हवन भंग करने के लिए आए तो दोनों भाइयों ने उनका वध कर दिया।
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कथावाचक ने सुनाया कि राम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न को गुरुकुल में ऋषि वशिष्ठ के आश्रम में शिक्षा लेने के लिए भेज दिया जाता है। गुरुकुल में राम अपनी बाल लीलाओं व बेहद शालीन स्वभाव के चलते सबके प्रिय थे। शिक्षा संपन्न होने के बाद चारों भाई वापस अयोध्या लौटे। कथावाचक ने सुनाया कि एक बार ऋषि विश्वामित्र अयोध्या पहुंचे और महाराज दशरथ से उनके पुत्र राम और लक्ष्मण को यज्ञ की रक्षा के लिए उनके साथ भेजने के लिए कहते हैं, लेकिन महाराज दशरथ कहते हैं राम और लक्ष्मण अभी बाल्यावस्था में है इसलिए वे उनकी जगह उनकी सेना को ले जाएं।
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लेकिन ऋषि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को ही मांगते हैं। महाराज दशरथ ऋषि विश्वामित्र को इन्कार नहीं सके और राम और लक्ष्मण को उनके साथ भेज दिया। फिर ऋषि विश्वामित्र व अन्य ऋषि-मुनि मिलकर यज्ञ शुरू करते हैं और राम और लक्ष्मण यज्ञ की रक्षा के लिए वहां पहरा देने लग गए। जैसे ही राक्षस हवन भंग करने के लिए आए तो दोनों भाइयों ने उनका वध कर दिया।
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