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Sirsa News: मंडी में धान बेचने पहुंचे किसान बोले- समय पर नहीं होती पराली से बनाई गांठ की उठान, गेहूं की बिजाई में होती है देरी

Tue, 22 Oct 2024 03:29 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा Updated Tue, 22 Oct 2024 03:29 AM IST
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Farmers who came to sell paddy in the market said that the bundles made of straw are not lifted on time, there is a delay in sowing wheat
अनाज मंडी सिरसा में धान की फसल में छंटाई करते हुए। संवाद
संवाद न्यूज एजेंसी
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सिरसा। पराली प्रबंधन को लेकर किसानों में जागरूकता देखने को मिल रही है। मंडी में आने वाले अधिकतर किसान पराली प्रबंधन की बात कहते हुए नजर आए, जबकि कुछ किसानों ने पराली को जलाने को अपनी मजबूरी बताया।

किसानों ने बताया कि पराली की बनाई गांठ का समय पर उठान नहीं होने के कारण उन्हें गेहूं की बिजाई करने में परेशानी आती है। पराली प्रबंधन के लिए पंजीकरण करवाने में भी समस्या का सामना करना पड़ता है। पंजीकरण को लेकर ग्रामीण स्तर पर कैंप या अन्य प्रबंध न होने के कारण वे प्रोत्साहन राशि से वंचित रह जाते हैं। दूसरी ओर सोमवार को मंडी में बड़े स्तर धान की आवक हुई। सभी मंडियों में बने शेड धान से भरे नजर आए। किसानों ने सड़कों पर अपनी फसल उतारी।
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किसानों के अनुसार इस सप्ताह में बड़ी तेजी से धान की उपज मंडी में आएगी। उठान धीमी होने के कारण किसानों को परेशानी उठानी पड़ रही है। किसानों को सड़कों और फुटपाथ पर उपज डालनी पड़ रही है। किसान कृष्ण लाल ने बताया कि मंडी में बेसहारा पशुओं की संख्या बहुत है। पूरा दिन पशुओं को हटाने का ही काम रहता है। प्रशासन ओर से बेसहारा पशुओं को लेकर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। किसानों की सारे साल की मेहनत की कमाई तो ऐसे ही बर्बाद हो रही है। मंडी में बड़े स्तर बेसहारा पशु घूमते हैं।
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तीन सालों से पराली प्रबंधन कर रहा हूं। मेरी फसल मेरा ब्योरा पर पंजीकरण करवाया। मेरा आज तक पैसा नहीं आया तो जब अधिकारियों से पूछा तो बताया कि पंजीकरण नहीं हो रहा है। खेत में पराली की गांठ बनाते हैं। तीन से चार हजार रुपये खर्चा बनता है। सरकार से एक हजार रुपये मिलता है। रोशन लाल, किसान, गांव रसूलपुर।




आग लगाए बिना कैसे समय पर गेहूं की फसलों की बिजाई करें। पराली का प्रबंधन हमारे लिए समस्या है और न जलाए तो कहां जाए। अभी तक पराली प्रबंधन का कोई पैसा नहीं मिला है। पिछले साल भी पराली की गांठ बनाई थी। लेकिन किसी ने नहीं खरीदी। मजबूरन आखिर में आग लगानी पड़ी। देसराज, किसान गांव रसूलपुर।
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