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ऐलनाबाद उपचुनाव : जाट बाहुल्य क्षेत्र में नेता बैठा रहे जातीय समीकरण
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सिरसा। ऐलनाबाद उपचुनाव में भले ही कृषि कानून का मुद्दा छाया हुआ है, लेकिन जातीय समीकरण भी अहम भूमिका निभाएंगे। ऐलनाबाद विधानसभा क्षेत्र में सबसे अधिक 54 फीसदी मतदाता सामान्य जाति के हैं और इसमें भी अकेले जाट समाज के लोगों का वोट 37 फीसदी है। पिछड़ा वर्ग के 24 फीसदी जबकि अनुसूचित जाति वर्ग के 22 फीसदी मतदाता हैं। ये सभी मिलकर ऐलनाबाद के प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला करेंगे कि कौन उनका प्रतिनिधि बनकर विधानसभा में जाएगा। इस बीच रूठों को मनाने के लिए जद्दोजहद शुरू हो गया है।
ऐलनाबाद विधानसभा क्षेत्र में शुरू से इनेलो का दबदबा रहा है। हर बार जाट उम्मीदवार ही मैदान में बाजी मारता रहा है। हालांकि कांग्रेस भी जाट उम्मीदवार को ही मैदान में उतारती है। इस बार इनेलो-कांग्रेस को छोड़ दें तो भाजपा ने बनिया बिरादरी से उम्मीदवार मैदान में उतारा है। इनेलो से अभय सिंह चौटाला, कांग्रेस से पवन बैनीवाल जबकि भाजपा-जजपा गठबंधन से गोबिंद कांडा चुनाव मैदान में है। जहां एक ओर इनेलो प्रत्याशी कृषि कानून को लेकर इस्तीफा देकर दोबारा मैदान में है वहीं दूसरी ओर भाजपा विकास के मुद्दे पर चुनाव में उतरी है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही इनेलो पर तीखे प्रहार करते हुए कहते हैं कि उन्होंने ये कहकर इस्तीफा दिया था कि जब तक कानून रद्द नहीं हो जाते, तब तक विधानसभा नहीं जाएंगे। जबकि इनेलो का मानना है कि उन्होंने ऐलनाबाद विधानसभा की जनता से पूछकर इस्तीफा दिया था और उन्हीं से पूछकर दोबारा चुनाव मैदान में हैं। हर वर्ग के वोटर पर प्रत्याशियों की निगाह है। (संवाद)
महत्वपूर्ण है जातीय समीकरण
सामान्य वर्ग में जाट समुदाय के सबसे अधिक 37 फीसदी मतदाता हैं। इसके बाद जट सिख वर्ग के 7 प्रतिशत, ब्राह्मण 3 फीसदी, अरोड़ा खत्री 3 फीसदी, वैश्य महाजन भी 3 फीसदी मतदाता हैं। राजपूत एक प्रतिशत हैं। इसके अलावा पिछड़ा वर्ग में भी खाती 4 प्रतिशत, कुम्हार 5 फीसदी, नाई 2 फीसदी, सुनार 1 फीसदी, कंबोज 5 प्रतिशत, सैनी, मुस्लिम और राय सिख 1-1 प्रतिशत मतदाता हैं। इसी प्रकार अनुसूचित जाति वर्ग में भी चमार 9 प्रतिशत, धानक 4 प्रतिशत, वाल्मीकि और बावरिया, नायक, बाजीगर समाज के 2-2 प्रतिशत और मजहबी सिख समाज के एक प्रतिशत मतदाता हैं।
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कई पार्टियों ने किया उपचुनाव से किनारा
ऐलनाबाद उपचुनाव में बेशक भाजपा, कांग्रेस और इनेलो के प्रत्याशी मुख्य रूप से मैदान में हैं। लेकिन कई पार्टियां ऐसी हैं जिन्होंने इस उपचुनाव से किनारा कर अपने प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारे। इनमें मुख्य रूप से आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी हैं। ये पार्टियां इन क्षेत्रों में सक्रिय हैं और कई कार्यक्रम भी करती रहती हैं। बसपा ने तो पिछले चुनावों में अपना उम्मीदवार मैदान में उतारा था। इस चुनाव में हालांकि भारतीय संतमत पार्टी, पीपल पार्टी और राइट टू रिकॉल पार्टी ने अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं।
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ऐलनाबाद विधानसभा क्षेत्र में शुरू से इनेलो का दबदबा रहा है। हर बार जाट उम्मीदवार ही मैदान में बाजी मारता रहा है। हालांकि कांग्रेस भी जाट उम्मीदवार को ही मैदान में उतारती है। इस बार इनेलो-कांग्रेस को छोड़ दें तो भाजपा ने बनिया बिरादरी से उम्मीदवार मैदान में उतारा है। इनेलो से अभय सिंह चौटाला, कांग्रेस से पवन बैनीवाल जबकि भाजपा-जजपा गठबंधन से गोबिंद कांडा चुनाव मैदान में है। जहां एक ओर इनेलो प्रत्याशी कृषि कानून को लेकर इस्तीफा देकर दोबारा मैदान में है वहीं दूसरी ओर भाजपा विकास के मुद्दे पर चुनाव में उतरी है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही इनेलो पर तीखे प्रहार करते हुए कहते हैं कि उन्होंने ये कहकर इस्तीफा दिया था कि जब तक कानून रद्द नहीं हो जाते, तब तक विधानसभा नहीं जाएंगे। जबकि इनेलो का मानना है कि उन्होंने ऐलनाबाद विधानसभा की जनता से पूछकर इस्तीफा दिया था और उन्हीं से पूछकर दोबारा चुनाव मैदान में हैं। हर वर्ग के वोटर पर प्रत्याशियों की निगाह है। (संवाद)
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महत्वपूर्ण है जातीय समीकरण
सामान्य वर्ग में जाट समुदाय के सबसे अधिक 37 फीसदी मतदाता हैं। इसके बाद जट सिख वर्ग के 7 प्रतिशत, ब्राह्मण 3 फीसदी, अरोड़ा खत्री 3 फीसदी, वैश्य महाजन भी 3 फीसदी मतदाता हैं। राजपूत एक प्रतिशत हैं। इसके अलावा पिछड़ा वर्ग में भी खाती 4 प्रतिशत, कुम्हार 5 फीसदी, नाई 2 फीसदी, सुनार 1 फीसदी, कंबोज 5 प्रतिशत, सैनी, मुस्लिम और राय सिख 1-1 प्रतिशत मतदाता हैं। इसी प्रकार अनुसूचित जाति वर्ग में भी चमार 9 प्रतिशत, धानक 4 प्रतिशत, वाल्मीकि और बावरिया, नायक, बाजीगर समाज के 2-2 प्रतिशत और मजहबी सिख समाज के एक प्रतिशत मतदाता हैं।
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कई पार्टियों ने किया उपचुनाव से किनारा
ऐलनाबाद उपचुनाव में बेशक भाजपा, कांग्रेस और इनेलो के प्रत्याशी मुख्य रूप से मैदान में हैं। लेकिन कई पार्टियां ऐसी हैं जिन्होंने इस उपचुनाव से किनारा कर अपने प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारे। इनमें मुख्य रूप से आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी हैं। ये पार्टियां इन क्षेत्रों में सक्रिय हैं और कई कार्यक्रम भी करती रहती हैं। बसपा ने तो पिछले चुनावों में अपना उम्मीदवार मैदान में उतारा था। इस चुनाव में हालांकि भारतीय संतमत पार्टी, पीपल पार्टी और राइट टू रिकॉल पार्टी ने अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं।