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कागजों में दौड़ा रिफ्यूज कंपेक्टर, लाखों का तेल पिया
ब्यूरो / अमर उजाला , सिरसा
Updated Wed, 27 Jul 2016 12:53 AM IST
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- फोटो : Desk
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नगर पालिका घोटालों में हर दिन परत दर परत मामले का खुलासा हो रहा है। वर्ल्ड बैंक से मिली सहायता राशि से खरीदे गए उपकरणों में ही नहीं, बल्कि उनको चलाने में भी घोटाला हुआ है। रिफ्यूज कंपेक्टर करीब तीन साल तक नगर पालिका के कागजों में खूब दौड़ा और लाखों रुपये का डीजल पी गया। जबकि हकीकत यह है कि तीन सालों में बहुत ही कम मौके थे, जब लोगों ने इसे सड़कों पर देखा। आखिर तेल कहां गया, डीसी रेट पर नियुक्त ड्राइवर की तनख्वाह किसके पास जाती रही। अब इस पहलू पर जांच चल रही है।
इतना ही नहीं सीएम फ्लाइंग जांच में सामने आया है कि वर्ष 2012 में खरीदे गए रिफ्यूज कंपेक्टर की वास्तविक कीमत से करीब साढ़े नौ लाख रुपये का ज्यादा भुगतान हुआ। इसकी पुष्टि होने के साथ-साथ फ्लाइंग इस बिंदु की जांच करना भूल ही गई कि यह चला भी है या नहीं। वर्ष 2012 से अब तक का रिकॉर्ड देखा जाए तो बताता है कि यह हर माह दौड़ा है। कई माह तो ऐसे हैं, जिनमें यह लगातार दौड़ता नजर आता है। वह भी सिर्फ कागजों में। ऐसे में यह लाखों रुपये तेल पी गया। आदमकद का यह उपकरण शहर की गलियों में जाने में असमर्थ हैं। यहां तक की शहर की सड़कों पर भी नहीं चल सकता, जबकि रिकॉर्ड में वह हर रोज यह 30 से 120 किलोमीटर चलता था। वहीं शहरवासी रिकॉर्ड को चैलेंज कर रहे हैं। यहां तक की जिन पार्षदों के समय इसकी खरीद की गई थी, वे भी हैरत में हैं। आखिर जब यह चला ही नहीं, तो लाखों रुपये का तेल कैसे पी गया। नगर पालिका रिकॉर्ड में साफ दर्ज है कि इस रिफ्यूज कंपेक्टर की खपत दो किलोमीटर प्रति लीटर है। यह भी जांच का विषय है कि इस उपकरण को कागजों में किसने दौड़ाया।
यह है हकीकत
हकीकत यह है कि रिफ्यूज कंपेक्टर कम्यूनिटी हाल में सफेद हाथी बनकर खड़ा है। इस पर डीसी रेट पर नियुक्त चालक अधिकारियों की गाड़ी चलाता था। चूंकि कंपेक्टर को चलाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन जैसा है। चूंकि बड़े आकार का होने के कारण यह गलियों में प्रवेश नहीं कर पाता। अगर सड़क पर चलता है तो जाम जैसी स्थिति हो जाती है।
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चार सालों में मैंने 10 या 12 बार इसे सड़कों पर चलता हुआ देखा होगा। मैं पिछली बार भी हाउस का सदस्य था।
विनोद बांसल, पार्षद, वार्ड नं. 14, डबवाली
मैंने चार साल में एक बार भी इसे चलता हुआ नहीं देखा। मैं चार माह तक लगातार सफाई अभियान से जुड़ा रहा। मैंने रिफ्यूज कंपेक्टर को बाहर लाने के लिए कहा। मुझे बताया गया कि इसका पिछला पार्ट ऑपरेशनल नहीं है। खरीद में घोटाला करने वालों के साथ तेल पीने वालों का चेहरा बेनकाब होना चाहिए। इनकी करतूत से शहर के माथे पर कलंक लगा है।
वियोगी हरि शर्मा, समाजसेवी
रिफ्यूज कंपेक्टर डस्टबिन में भरी गंदगी को जलदी-जल्दी समेटने के लिए खरीदा गया था। इसमें लगभग काफी डस्टबिन की गंदगी भरकर फेंकने की क्षमता थी। मैंने आज तक रिफ्यूज कंपेक्टर को सड़क पर नहीं देखा। मैं भी हाऊस का सदस्य रहा हूं।
सुखविंद्र सरां, पूर्व पार्षद
जुलाई 2013 में मैंने डबवाली में चार्ज संभाला था। हर माह तीन या चार बार कंपेक्टर को चलाता था। इससे पहले क्या हुआ मुझे मालूम नहीं। अब जून 2015 से ड्राइवर की मंजूरी नहीं मिली है। रिकॉर्ड में क्या दर्ज कर रखा है, इसके बारे में संबंधित शाखा इंचार्ज ही बता सकते हैं।
जयवीर डुडी, एमई, नगर परिषद, डबवाली
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इतना ही नहीं सीएम फ्लाइंग जांच में सामने आया है कि वर्ष 2012 में खरीदे गए रिफ्यूज कंपेक्टर की वास्तविक कीमत से करीब साढ़े नौ लाख रुपये का ज्यादा भुगतान हुआ। इसकी पुष्टि होने के साथ-साथ फ्लाइंग इस बिंदु की जांच करना भूल ही गई कि यह चला भी है या नहीं। वर्ष 2012 से अब तक का रिकॉर्ड देखा जाए तो बताता है कि यह हर माह दौड़ा है। कई माह तो ऐसे हैं, जिनमें यह लगातार दौड़ता नजर आता है। वह भी सिर्फ कागजों में। ऐसे में यह लाखों रुपये तेल पी गया। आदमकद का यह उपकरण शहर की गलियों में जाने में असमर्थ हैं। यहां तक की शहर की सड़कों पर भी नहीं चल सकता, जबकि रिकॉर्ड में वह हर रोज यह 30 से 120 किलोमीटर चलता था। वहीं शहरवासी रिकॉर्ड को चैलेंज कर रहे हैं। यहां तक की जिन पार्षदों के समय इसकी खरीद की गई थी, वे भी हैरत में हैं। आखिर जब यह चला ही नहीं, तो लाखों रुपये का तेल कैसे पी गया। नगर पालिका रिकॉर्ड में साफ दर्ज है कि इस रिफ्यूज कंपेक्टर की खपत दो किलोमीटर प्रति लीटर है। यह भी जांच का विषय है कि इस उपकरण को कागजों में किसने दौड़ाया।
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यह है हकीकत
हकीकत यह है कि रिफ्यूज कंपेक्टर कम्यूनिटी हाल में सफेद हाथी बनकर खड़ा है। इस पर डीसी रेट पर नियुक्त चालक अधिकारियों की गाड़ी चलाता था। चूंकि कंपेक्टर को चलाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन जैसा है। चूंकि बड़े आकार का होने के कारण यह गलियों में प्रवेश नहीं कर पाता। अगर सड़क पर चलता है तो जाम जैसी स्थिति हो जाती है।
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चार सालों में मैंने 10 या 12 बार इसे सड़कों पर चलता हुआ देखा होगा। मैं पिछली बार भी हाउस का सदस्य था।
विनोद बांसल, पार्षद, वार्ड नं. 14, डबवाली
मैंने चार साल में एक बार भी इसे चलता हुआ नहीं देखा। मैं चार माह तक लगातार सफाई अभियान से जुड़ा रहा। मैंने रिफ्यूज कंपेक्टर को बाहर लाने के लिए कहा। मुझे बताया गया कि इसका पिछला पार्ट ऑपरेशनल नहीं है। खरीद में घोटाला करने वालों के साथ तेल पीने वालों का चेहरा बेनकाब होना चाहिए। इनकी करतूत से शहर के माथे पर कलंक लगा है।
वियोगी हरि शर्मा, समाजसेवी
रिफ्यूज कंपेक्टर डस्टबिन में भरी गंदगी को जलदी-जल्दी समेटने के लिए खरीदा गया था। इसमें लगभग काफी डस्टबिन की गंदगी भरकर फेंकने की क्षमता थी। मैंने आज तक रिफ्यूज कंपेक्टर को सड़क पर नहीं देखा। मैं भी हाऊस का सदस्य रहा हूं।
सुखविंद्र सरां, पूर्व पार्षद
जुलाई 2013 में मैंने डबवाली में चार्ज संभाला था। हर माह तीन या चार बार कंपेक्टर को चलाता था। इससे पहले क्या हुआ मुझे मालूम नहीं। अब जून 2015 से ड्राइवर की मंजूरी नहीं मिली है। रिकॉर्ड में क्या दर्ज कर रखा है, इसके बारे में संबंधित शाखा इंचार्ज ही बता सकते हैं।
जयवीर डुडी, एमई, नगर परिषद, डबवाली