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बंटवारे का दर्द: आंखों देखी दास्तां... न तो सरहद का पता था न अंजाम का बस भागते रहे और भागते रहे
Sun, 14 Aug 2022 11:43 PM IST
भूपेंद्र सिंह
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा (हरियाणा)
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा (हरियाणा)
Published by: भूपेंद्र सिंह
Updated Sun, 14 Aug 2022 11:43 PM IST
सार
75 साल बाद बंटवारे का दर्द जो 83 वर्षीय डॉ. सुरेंद्र मल्होत्रा के दिल में था वो जुबां पे आया है। डॉ. सुरेंद्र मल्होत्रा ने कहा कि आज जिन्हें शरणार्थी कहा जाता है उनके पास पाकिस्तान में काफी जमीनें थीं और कई लोग बहुत अमीर थे।
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डॉ. सुरेंद्र मल्होत्रा
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
आजादी के 75 वर्ष बाद भी बंटवारे के दौरान हुए खूनी मंजर की याद जेहन में आती है, तो आंखों से आंसू बहने लगते हैं। अपनों को खोया सो खोया, बचपन में साथ खेले उन दोस्तों को मरते और बहनों की आबरू लुटती देखी। उसकी टीस अब भी मन को विचलित करती है। अपना मकान और अपनी जमीन छूटने का दर्द कैसा होता है ये हमसे बेहतर कौन जानता होगा। यह दर्द विभाजन की दास्तां सुनाते हुए करीब 83 वर्षीय डॉ. सुरेंद्र मल्होत्रा ने बयां किया।
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डॉ. सुरेंद्र मल्होत्रा ने बताया कि 1940 में मेरा जन्म पाकिस्तान में हुआ था। वर्ष 1947 में जब देश आजाद हुआ तो उम्र महज 7 वर्ष थी। घर में बड़े भाई की शादी होने वाली थी, लेकिन तभी बंटवारे का समय आ चुका था। चारों तरफ मारकाट चल रही थी। हालात ऐसे थे की यह यकीन करना मुश्किल था अब जिंदा भी रह पाएंगे या नहीं। उन्होंने कहा कि बंटवारे के दौरान न तो सरहद का पता था न अंजाम का बस भागते रहे और भागते रहे।
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इत्तफाक से दादी पीछे छूट गई, मुड़कर देखा तो इंसानों के भेष में दरिंदों ने उन्हें ही मार डाला था। उनका दाह संस्कार करने के बाद आगे बढ़े तो और यहां भारत में पहुंच गए। उन्होंने कहा कि बचपन से जिन्हें देखते थे वो मर चुके थे, यहां तक की बहन-बेटियां भी नहीं बच पाई थीं। इज्जत बचाने के लिए परिवार की बेटियों को कुएं में धकेल रहे थे।
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यह मंजर आज भी याद आता है, तो आंखों से आंसू बहने लगते हैं। यह दर्द वाजिब है क्योंकि घर में एक वृद्ध व्यक्ति की मौत हो जाती है तो भी उसकी याद हमें हमेशा रुलाती रहती है। यहां तो आंखों ने जवान और वृद्ध लोगों को दर्दनाक मौत मिलते हुए देखा। उन्होंने कहा कि देश में अपनों के बीच में रहते हुए भी लोग शंका की निगाहों से देखते रहे और हमेशा शरणार्थी कहलाए।
जिन्होंने मेहनत की वो करोड़पति बन गए
डॉ. सुरेंद्र मल्होत्रा ने कहा कि आज जिन्हें शरणार्थी कहा जाता है उनके पास पाकिस्तान में काफी जमीनें थीं और कई लोग बहुत अमीर थे। यहां आने के बाद कुछ परिवारों ने छोटा काम करने में शर्म महसूस की वो आज बेहतर स्थिति में नहीं हैं और जिन्होंने लगातार मेहनत की वो आज करोड़पति बन चुके हैं। इसलिए मेहनत से बढ़कर कुछ नहीं है।