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स्पाइनल मस्कुलर बीमारी से ग्रस्त कंचन की लिखी रचनाएं पढ़ते हैं 30 लाख लोग

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 10 Nov 2021 11:33 PM IST
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30 lakh people read the writings of Kanchan suffering from spinal muscular disease
कंचन महक सुथार - फोटो : Sirsa
सिरसा। जब हौसला बना लिया ऊंची उड़ान का, फिर देखना फिजूल है कद आसमान का। ऐसे ही जज्बे की धनी है कंचन महक सुथार। जो दुर्लभ बीमारी स्पाइनल मस्कुलर से ग्रस्त होकर भी अपने हौसले के बलबूते आसमां की ऊंचाई को नापती जा रही है। करीब 15 वर्ष से इस असहनीय पीड़ा को झेल रही कंचन ने कभी जीवन को बोझ की नजर से नहीं देखा, अपितु भविष्य के प्रति एक सकारात्मक नजरिया बनाकर हमेशा आगे बढ़ने का निश्चय किया। संघर्ष और इच्छाशक्ति से उसने कवियित्री के रूप में अपनी एक अलग पहचान बनाई। जिसके चलते आज उसके एक मशहूर एप प्रतिलिपि पर साढ़े 12 हजार फोलोअर्स व 30 लाख पाठकों के साथ-साथ कूकू एफएम ऑडियो पर एक हजार फोलोअर्स और 2.80 लाख श्रोता हैं। कंचन अब तक 300 से ज्यादा रचनाएं लिख चुकी हैं, जो समाज में विघटित हो रही घटनाओं के इर्द-गिर्द घूमती हैं।
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कंचन जिले के गांव गोरीवाला में एक बहुत ही साधारण परिवार की बेटी है। पिता प्रेम कुमार कारपेंटर का काम करते हैं और मां रोशनी देवी गृहिणी हैं। 4 भाई-बहनों में सबसे बड़ी कंचन जब 9 वर्ष की थी तब उसे स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी नामक बीमारी ने घेर लिया था।
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कंचन के मामा डॉ. गौतम सुथार बताते हैं कि जब उसे उपचार के लिए चिकित्सकों के पास ले गए तो हर डॉक्टर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह लाइलाज बीमारी है, जिसमें बच्चा 12 साल तक ही जीवित रहता है। उम्मीद की किरण टूटने लगी थी। लेकिन कंचन ने हिम्मत नहीं हारी। बेशक उसके हाथ-पांव साथ नहीं दे रहे थे, फिर भी उसने जीवन में आई विकट संकट के बीच नई राह की तलाश शुरू कर दी।
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कंचन का हौसला फिर ले आया स्कूल
कंचन बताती हैं कि उसे हमेशा से ही पढ़ने का शौक रहा है। शरीर में पीड़ा बहुत होती थी, लेकिन मन में ख्याल था कि पढ़ना तो है ही। उपचार के दौरान एक बार सोलन शहर, हिमाचल प्रदेश के एक नामी अस्पताल में जाना हुआ, जहां के चिकित्सकों ने मुझे इतना मोटिवेट किया कि मेरी हिम्मत बढ़ गई। मैंने देखा कि वहां पर मुझसे भी ज्यादा बीमार बच्चे हंसी-खुशी जीवन जीने का प्रयास कर रहे हैं। तब मैंने ठान लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए, जो जीवन मिला है, उसको आत्म संतुष्टि के साथ जीना है। सोशोलॉजी व पंजाबी में ग्रेजुएशन कर चुकी कंचन महक ने दसवीं व बारहवीं 90 प्लस ग्रेडिंग से पास की। लड़खड़ाते हाथों से पैन पकड़कर जब वह लिखना शुरू करती है तो फिर रुकने का नाम नहीं लेती। हालांकि परीक्षा में उसे एक घंटा अतिरिक्त समय मिलता रहा है, लेकिन इस दुर्लभ बीमारी में अव्वल श्रेणी में जगह बनाना भी अपने आप में दुर्लभ है।

मोबाइल से पकड़ी साहित्य की राह, मिली नई पहचान
मां रोशनी देवी बताती हैं कि जब कंचन बीए प्रथम वर्ष में थी तो उसे टच स्क्रीन वाला फोन दिला दिया था। ताकि वह खाली समय में अपना मन बहला सके। लेकिन कंचन ने बिना किसी मदद के मोबाइल फोन से खुद में छिपी कला को निखारना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे टाइपिंग सीखती गई और शेरो-शायरी व छोटी रचनाएं लिखने लगी। कंचन ने बताया कि मैंने जब पहली बार रचना लिखी तो बड़ी खुशी हुई। मेरी अधिकतर रचनाएं वास्तविकता से जुड़ी हुई हैं। मोबाइल फोन से मुझे प्रतिलिपि एप व कूकू एफएम एप के बारे जानकारी मिली। मैंने अपनी रचनाएं इन एप को भेजी तो उन्होंने इनको प्रकाशित और प्रसारित कर दिया। अब तक 300 से ज्यादा रचनाएं इन दोनों एप के द्वारा कई लाख पाठकों तक पहुंच चुकी हैं। कूकू एफएम मुझे रिवॉर्ड भी देती है, जिससे पढ़ाई का खर्च मैं खुद उठाने लगी हूं। कंचन को पुस्तकें पढ़ने का बहुत शौक है।

माता पिता के बीच बैठी हुई कंचन

माता पिता के बीच बैठी हुई कंचन- फोटो : Sirsa

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