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Rohtak News: जब मदद करने वाले ही दो वक्त की रोटी के मोहताज हो गए थे
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विभाजन के समय भारत आए केएल मल्होत्रा परिवार के साथ। स्रोत : परिवार
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रोहतक। पाकिस्तान के शोराकोट चक 478 में शान से जीवन यापन कर रहे केएल मल्होत्रा ने सोचा भी नहीं था कि देश का विभाजन होगा और वह अर्श से फर्श पर आ जाएंगे। जिस पाकिस्तान में बगैर किसी का धर्म पूछे लोगों की हर तरह से मदद करते थे, वही परिवार दो वक्त की रोटी का मोहताज हो जाएगा पता नहीं था। उन्हीं लोगों से डर लगने लगेगा जिनकी कभी मदद की। हालात बदलते ही व्यवहार ऐसा बदला कि उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
यह दर्द बयां किया है शहर के वरिष्ठ अधिवक्ता केएल मल्होत्रा ने। भारत-पाक विभाजन के समय जब हिंदुस्तान आए तो जान बचाना ही मुश्किल था। वर्ष 1947 से 1950 तक परिवार ने मौत का तांडव देखा। जीजा के बड़े भाई, मामा, मामी, मामा के बड़े लड़के को मौत की नींद सुला दिया गया। उस समय जन संघ के युवाओं ने बचे हुए लोगों के प्राणों की रक्षा की। उन्होंने पाकिस्तान में रह रहे कई हिंदू परिवारों को बचाया। वह स्वयं जन संघ की शाखा में जाते थे, पहले सबकुछ सही था। बंटवारे के बाद ही सारी मारकाट हुई, इससे पहले सभी में भाईचारा था। लेकिन हालत ऐसे हुए कि परिवार के 30 सदस्य पहने हुए कपड़ों में ही चाचा चिमनलाल के साथ हिंदुस्तान आ गए। इसके अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था, पाकिस्तान में रहने के लिए मुसलमान बनना अनिवार्य था। जो उनकी बात नहीं मान रहा था, उनको मारा जा रहा था। हिंदुस्तान आकर शुरू से मेहनत करनी पड़ी, परिवार पालने के लिए और उन्हें शिक्षित करने के लिए सभी प्रयास किए। मेहनत कर पेट पाला और शिक्षा ग्रहण कर जीवन स्तर को ऊपर उठाने का प्रयास किया। दिन रात मेहनत कर परिवार को मोती की माला की तरह पिरोया। बच्चों को शिक्षा दी कि कठिन परिस्थितयों से लडे़, डरें नहीं।
आंधियां गम की यूं चली कि बाग उजड़ गए...
आंधियां गम की यूं चली कि बाग उजड़ गए, सब कुछ लुटा कर होश में आए तो क्या आए...पंक्तियों के साथ अधिवक्ता केएल मल्होत्रा की आंखें भर आती हैं। अतीत का डर उनकी आंखों में आज भी है। शायद इसीलिए वह बच्चाें को सिर्फ शिक्षा पर ध्यान देने को कहते हैं। क्योंकि यही एक ऐसी चीज है, जिसे कभी लूटा नहीं जा सकता। जहां भी रहोगे यही काम आएगी। मल्होत्रा ने बताया कि उन्होंने करीबन 58 साल वकालत की और आज भी जरूरत पड़ने पर कोर्ट में जाते हैं। पाकिस्तान में उनका आढ़त का अच्छा काम था। घटनाक्रम और जरूरतों को देखते हुए उन्होंने बच्चों को पढ़ाया और उन्हें भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने को कहा। इसी का नतीजा है कि आज उनकी बेटी डॉ. अलका छाबड़ा अग्रोहा मेडिकल कॉलेज में निदेशक, बड़ा बेटा नवीन मल्होत्रा पीजीआईएमएस में काार्डिक एनेस्थिसिया में एचओडी व पेन क्लीनिक सेंटर के प्रभारी है और उनकी पत्नी डॉ. राखी निजी क्लीनिक चलाती हैं। डॉ. प्रवीण मल्होत्रा पीजीआईएमएस गेस्ट्रोएंट्रोलॉजी विभागाध्यक्ष और उनकी पत्नी डॉ. वाणी मल्होत्रा महिला रोग विभाग में प्रोफेसर हैं। उनका एक पोता डॉ. नमन मुंबई में सर्जरी से एमएस कर रह है तथा पोता प्रणव व पोती नव्या एमबीबीएस अंतिम वर्ष में है।
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यह दर्द बयां किया है शहर के वरिष्ठ अधिवक्ता केएल मल्होत्रा ने। भारत-पाक विभाजन के समय जब हिंदुस्तान आए तो जान बचाना ही मुश्किल था। वर्ष 1947 से 1950 तक परिवार ने मौत का तांडव देखा। जीजा के बड़े भाई, मामा, मामी, मामा के बड़े लड़के को मौत की नींद सुला दिया गया। उस समय जन संघ के युवाओं ने बचे हुए लोगों के प्राणों की रक्षा की। उन्होंने पाकिस्तान में रह रहे कई हिंदू परिवारों को बचाया। वह स्वयं जन संघ की शाखा में जाते थे, पहले सबकुछ सही था। बंटवारे के बाद ही सारी मारकाट हुई, इससे पहले सभी में भाईचारा था। लेकिन हालत ऐसे हुए कि परिवार के 30 सदस्य पहने हुए कपड़ों में ही चाचा चिमनलाल के साथ हिंदुस्तान आ गए। इसके अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था, पाकिस्तान में रहने के लिए मुसलमान बनना अनिवार्य था। जो उनकी बात नहीं मान रहा था, उनको मारा जा रहा था। हिंदुस्तान आकर शुरू से मेहनत करनी पड़ी, परिवार पालने के लिए और उन्हें शिक्षित करने के लिए सभी प्रयास किए। मेहनत कर पेट पाला और शिक्षा ग्रहण कर जीवन स्तर को ऊपर उठाने का प्रयास किया। दिन रात मेहनत कर परिवार को मोती की माला की तरह पिरोया। बच्चों को शिक्षा दी कि कठिन परिस्थितयों से लडे़, डरें नहीं।
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आंधियां गम की यूं चली कि बाग उजड़ गए...
आंधियां गम की यूं चली कि बाग उजड़ गए, सब कुछ लुटा कर होश में आए तो क्या आए...पंक्तियों के साथ अधिवक्ता केएल मल्होत्रा की आंखें भर आती हैं। अतीत का डर उनकी आंखों में आज भी है। शायद इसीलिए वह बच्चाें को सिर्फ शिक्षा पर ध्यान देने को कहते हैं। क्योंकि यही एक ऐसी चीज है, जिसे कभी लूटा नहीं जा सकता। जहां भी रहोगे यही काम आएगी। मल्होत्रा ने बताया कि उन्होंने करीबन 58 साल वकालत की और आज भी जरूरत पड़ने पर कोर्ट में जाते हैं। पाकिस्तान में उनका आढ़त का अच्छा काम था। घटनाक्रम और जरूरतों को देखते हुए उन्होंने बच्चों को पढ़ाया और उन्हें भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने को कहा। इसी का नतीजा है कि आज उनकी बेटी डॉ. अलका छाबड़ा अग्रोहा मेडिकल कॉलेज में निदेशक, बड़ा बेटा नवीन मल्होत्रा पीजीआईएमएस में काार्डिक एनेस्थिसिया में एचओडी व पेन क्लीनिक सेंटर के प्रभारी है और उनकी पत्नी डॉ. राखी निजी क्लीनिक चलाती हैं। डॉ. प्रवीण मल्होत्रा पीजीआईएमएस गेस्ट्रोएंट्रोलॉजी विभागाध्यक्ष और उनकी पत्नी डॉ. वाणी मल्होत्रा महिला रोग विभाग में प्रोफेसर हैं। उनका एक पोता डॉ. नमन मुंबई में सर्जरी से एमएस कर रह है तथा पोता प्रणव व पोती नव्या एमबीबीएस अंतिम वर्ष में है।
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