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Rohtak: कचहरी के वृक्ष आज भी सुना रहे क्रांतिकारियों की वीरगाथा, 1857 में सार्वजनिक रूप से दी गई थी फांसी

Sun, 13 Aug 2023 02:50 PM IST
भूपेंद्र सिंह ज्ञानेन्द्र कुमार, अमर उजाला ब्यूरो, रोहतक (हरियाणा)
ज्ञानेन्द्र कुमार, अमर उजाला ब्यूरो, रोहतक (हरियाणा) Published by: भूपेंद्र सिंह Updated Sun, 13 Aug 2023 02:50 PM IST
सार

1857 में अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों को सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई थी। जनरल वान कोटलैंड रोहतक आया। उसने विद्रोह में शामिल सैकड़ों लोगों को फंदे पर लटका दिया। रांगड़ समुदाय के लोगों को चुन-चुनकर गोली का निशाना बनाया गया।

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Rohtak: The trees of the court are still telling the heroic story of the revolutionaries
कचहरी के वृक्ष आज भी सुना रहे क्रांतिकारियों की वीरगाथा - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

1857 में दिल्ली में अंग्रेजों का अधिकार होने के बाद क्रांतिकारियों के ऊपर पूरे देश में चौतरफा दमन चक्र चला। लंबे समय तक क्रांतिकारियों को परास्त करने वाले रोहतक में अंग्रेज कहर बनकर टूट पड़े। सितंबर 1857 में जनरल वान कोटलैंड रोहतक आया। उसने विद्रोह में शामिल सैकड़ों लोगों को फंदे पर लटका दिया।

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रांगड़ समुदाय के लोगों को चुन-चुनकर गोली का निशाना बनाया गया। कचहरी के समीप वृक्षों पर सैकड़ों फांसी के फंदे लटक रहे थे जिन पर बारी-बारी से विद्रोहियों को सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई और यह दृश्य दिखाने के लिए लोगों को जबरदस्ती इकट्ठा किया गया। ग्रामीणों की जमीनें जब्त कर ली गईं। 
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अंग्रेजों का कहर ग्रामीणों पर इसलिए टूटा क्योंकि उन्होंने लंबे समय तक ब्रिटिश शासन से माेर्चा लेते हुए उन्हें रोहतक की जमीन से उखाड़ फेंका। दो बार रोहतक शहर के कलक्टर को खदेड़ा और तीसरी बार दिल्ली से आए कैप्टन हड़सन को रोहतक में घुसने नहीं दिया। विद्रोह में रांगड़, राजपूत, जाट, बुनकर, शिल्पकार सभी कूद पड़े। अस्थल बोहर के पास पड़ाव डाले हड़सन से जंगल में छिपकर विद्रोहियों ने छापामार युद्ध किया, जिससे हड़सन को भागना पड़ा।
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पंचायतों और खापों ने भी संभाली थी कमान 
विद्रोहियों के हमले से रोहतक की पंचायतों और खापों ने प्रशासन पर अपना अधिकार जमा लिया और राज प्रबंधन करने लगे। खापों-पंचायतों ने सैनिक दस्ते बनाए। गांव की चौपालों पर चौकीदारों की तैनाती की जो किसी भी खतरे से सचेत करने के लिए नगाड़े बजाते थे। रोहतक पर अधिकार होने के बहुत बाद भी बहुत समय तक यहां के स्वाधीनता प्रेमी लोगों पर ब्रिटिश प्रशासन काबू नहीं कर सका। 

अंग्रेजों ने बारूद की फैक्टरी को उड़ाया, चारों ओर लाशें बिछीं 
दिल्ली से 8 अगस्त को ब्रिगेडियर जनरल निकलसन भारी फोर्स के साथ रोहतक पहुंचा और उसने विद्रोहियों पर हमला बोल दिया। रोहतक शहर में एक बहुत बड़ी बारूद की फैक्टरी थी, जिसमें आग लगने से 500 विद्रोही हताहत हो गए। इसमें ब्रिटिश सैनिक भी थे। चारों तरफ लाशें ही लाशें बिखरी पड़ी थीं फिर भी क्रांतिकारी अडिग रहे। रांगड़ समुदाय के लोग बड़ी संख्या में बाबर खान के नेतृत्व में इकट्ठे हुए और उन्होंने ब्रिटिश सैनिकों से डटकर मुकाबला किया। 

ब्रिटिश सरकार का पत्र व्यवहार 
रोहतक के बागी ब्रिटिश फौजों पर गोलियों से जोरदार हमला कर रहे हैं, लेकिन हमने अपना बचाव किया और कोई खास नुकसान नहीं हुआ। दिनांक 8 अगस्त 1857 को ब्रिगेडियर जनरल निकलसन भारी फौज के साथ पहुंच गए हैं और बागियों पर हमला कर दिया है। शहर में एक बहुत बड़ी बारूद फैक्टरी थी, जिसमें आग लगने से विस्फोट हुआ।

इसमें लगभग 500 बागी हताहत हुए। फिर भी बागी बड़े जोरों से मुकाबला कर रहे हैं। इसमें ब्रिटिश सैनिक भी हताहत हुए हैं। महाराजा जींद से संदेश प्राप्त हुआ है कि वह जल्दी ही रोहतक में ब्रिटिश सहायता के लिए सेना भेज रहे हैं। मेजर वाच हाउस एचएम 24वीं पैदल सेना और कैप्टन पटोनस घुड़सवार सेना के साथ आज प्रात: मियामीर पहुंच गए हैं। 


-12 अगस्त 1857 को चीफ कमिश्नर ऑफिस लाहौर के नाम लेफ्टिनेंट मिलिट्री सेक्रेटरी चीफ कमिश्नर जेडी मैक्फरसन ने लिखा पत्र - संदर्भ : राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली

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