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पीजीआई में नवजात और बच्चों को टीबी होने का खतरा
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक
Updated Tue, 13 Oct 2015 02:08 AM IST
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प्रदेश के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान यहां स्थित पीजीआई में व्यवस्थाएं सुधरने का नाम नहीं ले रही हैं।
पीजीआई की सीआरएस ओपीडी में बच्चों को आठ जानलेवा बीमारियों से बचाने के लिए किया जा रहा टीकाकरण कभी भी जानलेवा बन सकता है।
यहां टीबी के गंभीर मरीजों का मोनटोक्स टेस्ट और नवजात से लेकर 16 साल तक के बच्चों का टीकाकरण एक ही छोटे से कमरे में होता है। पीजीआई की यह लापरवाही कभी भी जान पर भारी पड़ सकती है।
ओपीडी के द्वितीय तल पर कमरा नंबर 206 में टीकाकरण किया जाता है। वहीं 204 नंबर कमरे में मोनटोक्स टेस्ट होता है। 204 नंबर कमरे को स्टाफ की कमी का हवाला देकर बंद रखा जाता है और 206 में ही सारा काम किया जाता है।
कमरा नंबर 206 के रोजाना के आंकड़ों की बात करें तो यहां 150 से 200 बच्चों का टीकाकरण होता है। साथ ही टीबी के 50 से 60 रोगियों का मोनटोक्स टेस्ट भी होता है।
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इस जांच में मरीज के हाथ में दवा छोड़ कर एक घेरा बना कर छोड़ दिया जाता है और उसे बाद में बुलाया जाता है। यहां टीबी के औसतन प्रतिदिन 120 मरीज पहुंचते हैं।
इनके मुंह पर न रुमाल और न ही कोई मास्क होता है। ऐसी स्थिति में नवजात व छोटे बच्चे टीबी के संक्रमण से कितना सुरक्षित हैं, इसका जवाब खुद प्रबंधन के पास भी नहीं है। जबकि यह जांच तृतीय तल पर टीबी विभाग में होनी चाहिए।
वर्जन
छोटे बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी कम होती है। इसलिए टीबी वाले मरीजों की जांच भी बच्चों के साथ एक ही कमरे में होना काफी गंभीर है। बच्चों में इससे संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है।
- डॉ. गीता गठवाला, बाल रोग विभागाध्यक्ष, पीजीआई, रोहतक।
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पीजीआई की सीआरएस ओपीडी में बच्चों को आठ जानलेवा बीमारियों से बचाने के लिए किया जा रहा टीकाकरण कभी भी जानलेवा बन सकता है।
यहां टीबी के गंभीर मरीजों का मोनटोक्स टेस्ट और नवजात से लेकर 16 साल तक के बच्चों का टीकाकरण एक ही छोटे से कमरे में होता है। पीजीआई की यह लापरवाही कभी भी जान पर भारी पड़ सकती है।
ओपीडी के द्वितीय तल पर कमरा नंबर 206 में टीकाकरण किया जाता है। वहीं 204 नंबर कमरे में मोनटोक्स टेस्ट होता है। 204 नंबर कमरे को स्टाफ की कमी का हवाला देकर बंद रखा जाता है और 206 में ही सारा काम किया जाता है।
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कमरा नंबर 206 के रोजाना के आंकड़ों की बात करें तो यहां 150 से 200 बच्चों का टीकाकरण होता है। साथ ही टीबी के 50 से 60 रोगियों का मोनटोक्स टेस्ट भी होता है।
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इस जांच में मरीज के हाथ में दवा छोड़ कर एक घेरा बना कर छोड़ दिया जाता है और उसे बाद में बुलाया जाता है। यहां टीबी के औसतन प्रतिदिन 120 मरीज पहुंचते हैं।
इनके मुंह पर न रुमाल और न ही कोई मास्क होता है। ऐसी स्थिति में नवजात व छोटे बच्चे टीबी के संक्रमण से कितना सुरक्षित हैं, इसका जवाब खुद प्रबंधन के पास भी नहीं है। जबकि यह जांच तृतीय तल पर टीबी विभाग में होनी चाहिए।
वर्जन
छोटे बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी कम होती है। इसलिए टीबी वाले मरीजों की जांच भी बच्चों के साथ एक ही कमरे में होना काफी गंभीर है। बच्चों में इससे संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है।
- डॉ. गीता गठवाला, बाल रोग विभागाध्यक्ष, पीजीआई, रोहतक।