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पीजीआई में हर दूसरे दिन आ रहा आत्महत्या का एक केस
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अवसाद में घिरा व्यक्ति अक्सर अपनी जान दे देता है। यह क्षणिक होता है। इस अवसाद के समय कोई उसे समझा सके या दर्द बांट सके तो वह बच सकता है। यही एक मनोवैज्ञानिक भी करता है। अवसाद के क्षण अकेला पड़ने वाला व्यक्ति खुद से हार जाता है। यही वजह है कि पीजीआई में हर दूसरे दिन आत्महत्या का औसतन एक केस आता है। संस्थान के फोरेंसिक साइंस विभाग के आंकड़े भी कुछ यहीं बया करते हैं। अमर उजाला ने वर्ल्ड सुसाइड प्रीवेंशन डे पर फोरेंसिक साइंस के अध्यक्ष व राज्य मानसिक स्वास्थ्य संस्थान के सीईओ से बातचीत की तो यह सच सामने आया।
स्पर्धा के दौर में तनाव व अवसाद बढ़ता जा रहा है। युवा वर्ग इस दौड़ और तनाव के बीच बुरी तरह पिस रहा है। बेहतर भविष्य के लिए अच्छे अंक लाने का दबाव रहता है तो पढ़ाई के बाद अच्छी नौकरी व सफलता की चाह। नतीजतन 20 से 40 वर्ष के बीच के लोग ज्यादा तनाव में रहते हैं। तनाव के कारण अवसाद में घिरे ये लोग अपनी ही जान ले देते हैं। इसमें 25 से 30 वर्ष के युवा अधिक होते हैं। पीजीआई के फोरेंसिक विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो यहां सबसे ज्यादा जानें जहरीले पदार्थ के सेवन से जाती हैं। इसके बाद फंदा, ट्रेन हादसे व झुलसने से मौत के मामले आते हैं।
हर 40 सेकेंड में एक व्यक्ति करता है आत्महत्या
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, भारत में हर साल एक लाख से ज्यादा लोग विभिन्न कारणों से आत्महत्या करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार दुनिया भर में हर 40 सेकेंड मे एक व्यक्ति आत्महत्या करता है। प्रतिवर्ष दुनिया में लगभग 8 लाख लोगों की जान आत्महत्या की वजह से जाती है।
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जीवन समाप्त कर देता है थोड़ा सा आवेश
डॉ. राजीव गुप्ता ने बताया कि किन्हीं कारणों से व्यक्ति स्वयं अपने जीवन का दुश्मन बनकर आत्महत्या का कदम उठाता लेता है। पिछले कुछ वर्षों में यह समाज के सामने बड़ी समस्या बनकर उभरी है। परिस्थितिवश जीवन को खत्म कर देेने का ख्याल जीने की लाख कोशिशों से कहीं अधिक मजबूत होता है। इसमें थोड़ा सा आवेश उन्हें जीवन खत्म करने के लिए विवश कर देता है। बदलती जीवनशैली एवं कोविड महामारी के चलते आम आदमी की दिनचर्या में काफी बदलाव आया हैै। इसकी वजह से लोग छोटी छोटी बात पर गुस्सा कर बैठते हैं। पारिवारिक परिस्थितियों के चलते लोग आत्महत्या कर रहे हैं। कभी डिप्रेशन में आकर तो कभी भावनात्मक होकर। यदि कुछ क्षणों तक व्यक्ति अपनी भावनाओं पर संयम रख ले तो आत्महत्या की संभावना कम हो जाती है। एक अध्ययन के अनुसार आत्महत्या करने वाले 48 प्रतिशत लोगों की सही समय पर काउंसलिंग उनके विचार को बदल सकती है।
वैश्विक स्तर पर विश्व आत्महत्या बचाव दिवस 10 सितंबर को मनाया जाता है। आत्महत्या की बढ़ती प्रवृति पर रोक लगाने एवं इस बढ़ती समस्या के प्रति लोगों को जागरूक बनाने के उद्देश्य से इंटरनेशनल एसोसिएशन फार सुसाइड प्रीवेंशन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन और विश्व मानसिक स्वास्थ्य महासंघ के साथ समझौते के तहत वर्ष 2003 से यह दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष शुक्रवार को पीजीआईएमएस में लोगों को जागरूक करने के लिए कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। इस वर्ष की थीम कार्य के द्वारा आशा का संचार रखा गया है।
- डॉ. राजीव गुप्ता, निदेशक कम सीईओ, मानसिक स्वास्थ्य संस्थान
पीजीआई में आत्महत्या का हर दूसरे दिन एक केस सामने आ रहा है। इसमें जहर से जान देने वाले सबसे ज्यादा हैं। इसके बाद फंदा लगाकर, ट्रेन से कटकर व आग में झुलसकर मरने वाले हैं। ऐसे लोगों को अवसाद या तनाव के समय समझा कर आत्महत्या की ओर बढ़ता कदम रोका जा सकता है। यही काम मनोचिकित्सक करते हैं।
- डॉ. एसके धतरवाल, एचओडी, फोरेंसिक विभाग, पीजीआईएमएस
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स्पर्धा के दौर में तनाव व अवसाद बढ़ता जा रहा है। युवा वर्ग इस दौड़ और तनाव के बीच बुरी तरह पिस रहा है। बेहतर भविष्य के लिए अच्छे अंक लाने का दबाव रहता है तो पढ़ाई के बाद अच्छी नौकरी व सफलता की चाह। नतीजतन 20 से 40 वर्ष के बीच के लोग ज्यादा तनाव में रहते हैं। तनाव के कारण अवसाद में घिरे ये लोग अपनी ही जान ले देते हैं। इसमें 25 से 30 वर्ष के युवा अधिक होते हैं। पीजीआई के फोरेंसिक विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो यहां सबसे ज्यादा जानें जहरीले पदार्थ के सेवन से जाती हैं। इसके बाद फंदा, ट्रेन हादसे व झुलसने से मौत के मामले आते हैं।
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हर 40 सेकेंड में एक व्यक्ति करता है आत्महत्या
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, भारत में हर साल एक लाख से ज्यादा लोग विभिन्न कारणों से आत्महत्या करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार दुनिया भर में हर 40 सेकेंड मे एक व्यक्ति आत्महत्या करता है। प्रतिवर्ष दुनिया में लगभग 8 लाख लोगों की जान आत्महत्या की वजह से जाती है।
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जीवन समाप्त कर देता है थोड़ा सा आवेश
डॉ. राजीव गुप्ता ने बताया कि किन्हीं कारणों से व्यक्ति स्वयं अपने जीवन का दुश्मन बनकर आत्महत्या का कदम उठाता लेता है। पिछले कुछ वर्षों में यह समाज के सामने बड़ी समस्या बनकर उभरी है। परिस्थितिवश जीवन को खत्म कर देेने का ख्याल जीने की लाख कोशिशों से कहीं अधिक मजबूत होता है। इसमें थोड़ा सा आवेश उन्हें जीवन खत्म करने के लिए विवश कर देता है। बदलती जीवनशैली एवं कोविड महामारी के चलते आम आदमी की दिनचर्या में काफी बदलाव आया हैै। इसकी वजह से लोग छोटी छोटी बात पर गुस्सा कर बैठते हैं। पारिवारिक परिस्थितियों के चलते लोग आत्महत्या कर रहे हैं। कभी डिप्रेशन में आकर तो कभी भावनात्मक होकर। यदि कुछ क्षणों तक व्यक्ति अपनी भावनाओं पर संयम रख ले तो आत्महत्या की संभावना कम हो जाती है। एक अध्ययन के अनुसार आत्महत्या करने वाले 48 प्रतिशत लोगों की सही समय पर काउंसलिंग उनके विचार को बदल सकती है।
वैश्विक स्तर पर विश्व आत्महत्या बचाव दिवस 10 सितंबर को मनाया जाता है। आत्महत्या की बढ़ती प्रवृति पर रोक लगाने एवं इस बढ़ती समस्या के प्रति लोगों को जागरूक बनाने के उद्देश्य से इंटरनेशनल एसोसिएशन फार सुसाइड प्रीवेंशन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन और विश्व मानसिक स्वास्थ्य महासंघ के साथ समझौते के तहत वर्ष 2003 से यह दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष शुक्रवार को पीजीआईएमएस में लोगों को जागरूक करने के लिए कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। इस वर्ष की थीम कार्य के द्वारा आशा का संचार रखा गया है।
- डॉ. राजीव गुप्ता, निदेशक कम सीईओ, मानसिक स्वास्थ्य संस्थान
पीजीआई में आत्महत्या का हर दूसरे दिन एक केस सामने आ रहा है। इसमें जहर से जान देने वाले सबसे ज्यादा हैं। इसके बाद फंदा लगाकर, ट्रेन से कटकर व आग में झुलसकर मरने वाले हैं। ऐसे लोगों को अवसाद या तनाव के समय समझा कर आत्महत्या की ओर बढ़ता कदम रोका जा सकता है। यही काम मनोचिकित्सक करते हैं।
- डॉ. एसके धतरवाल, एचओडी, फोरेंसिक विभाग, पीजीआईएमएस