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इंजेक्शन से न घबराएं बच्चे, अब फल खाएंगे और होंगे तंदुरुस्त
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक
Updated Fri, 04 Sep 2015 02:10 AM IST
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जल्द ही बच्चों को इंजेक्शन की पीड़ा से राहत मिलने वाली है। टीकाकरण का दर्द भी उन्हें नहीं सहना पड़ेगा। बच्चे दवायुक्त फल (मेडिकेटिड फ्रूट) खाएंगे और बीमारियों को दूर भगाएंगे। पीजीआई के फार्मेसी विभाग में ऐसे फलों को विकसित करने पर शोध चल रहा हैं जिनमें टीके और दवा के गुण होंगे।
इस फलों का सबसे बड़ा लाभ उन क्षेत्रों में मिलेगा जहां टीकाकरण करना या दवाइयां पहुंचाना संभव नहीं है। देश के जिन हिस्सों में दवाइयां संरक्षित करने के लिए कोल्ड स्टोरेज नहीं हैं, वहां इन फलों का विशेष लाभ मिलेेगा।
हेल्थ विवि की फार्मेस्यूटिकल बॉयोटेकभनोलॉजी विभाग की प्रोफेसर डॉ. नीलू सूद ने बताया कि संस्थान में मेडिकेटिड फ्रूट तैयार करने पर रिसर्च चल रही है। इसके लिए अमेरिकी वैज्ञानिक आंटजन के कांसेप्ट पर काम हो रहा है। शोध अगर कामयाब होता है तो बच्चों को इंजेक्शन लगाने के बजाए उनके पसंदीदा फल या खाद्य सामग्री से ही रोग प्रतिरोधी क्षमता मिल जाएगी। विभिन्न खाद्य सामग्री में टीके और दवा के गुण डालने का प्रयास किए जा रहे हैं।
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एक जैसे गुण वाले कई पौधे हो सकेंगे तैयार
डॉ. नीलू सूद के अनुसार रिसर्च पर आधारित कई तकनीकों पर काम हो रहा है। हम यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि किस तरह के पौधे दवायुक्त फल के लिए सबसे प्रभावी होंगे। हम पौधे मे जींस प्रत्यारोपित करके ट्रांसजेनिक प्लांट तैयार करते हैं। जब पौधा तैयार हो जाता है तो टिशू कल्चर से सॉफ्ट टिशू का क्लीनिकल ट्रायल होता है। इसके बाद टेस्ट ट्यूब प्लांट विधि से एक जैसे गुण वाले लाखों पौधे तैयार किए जा सकेंगे।
यह करना है बाकी
रिसर्च में दवा की डोज कैसे निर्धारित होगी, उम्र का मापदंड क्या होगा, यह दवा बॉयो सेफ्टी के हिसाब से कितनी खरी होगी, इस पर काम करना बाकी है। इसमें जेनेटिक इंजीनियरिंग और मॉलीक्यूलर बायोलॉजी विभाग से सहयोग से काम होगा। इसके लिए तंबाकू, केला, पपीता, मक्की और आलू पर प्रयोग किया जा रहा है। सबसे अहम बात है कि ये सभी पौधे बिना बीज वाले हैं।
बोले अधिकारी
कैथेरंथस रोजियस और विंकस रोजियस जैसे प्रोजेक्ट पर रिसर्च करने के लिए डेढ़ साल पहले कॉलेज को ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेकिभनकल एजुकेशन की ओर से 20 लाख रुपये का बजट मिला है। इस प्रोजेक्ट के लिए तीन साल का समय है। प्रोजेक्ट पर काफी काम हो चुका है, बाकी का कार्य भी पूरा करने का प्रयास जारी है।
- डॉ. गजेंद्र सिंह, डीन, फार्मेसी कॉलेज एवं प्रोजेक्ट इंवेस्टिगेटर।
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इस फलों का सबसे बड़ा लाभ उन क्षेत्रों में मिलेगा जहां टीकाकरण करना या दवाइयां पहुंचाना संभव नहीं है। देश के जिन हिस्सों में दवाइयां संरक्षित करने के लिए कोल्ड स्टोरेज नहीं हैं, वहां इन फलों का विशेष लाभ मिलेेगा।
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हेल्थ विवि की फार्मेस्यूटिकल बॉयोटेकभनोलॉजी विभाग की प्रोफेसर डॉ. नीलू सूद ने बताया कि संस्थान में मेडिकेटिड फ्रूट तैयार करने पर रिसर्च चल रही है। इसके लिए अमेरिकी वैज्ञानिक आंटजन के कांसेप्ट पर काम हो रहा है। शोध अगर कामयाब होता है तो बच्चों को इंजेक्शन लगाने के बजाए उनके पसंदीदा फल या खाद्य सामग्री से ही रोग प्रतिरोधी क्षमता मिल जाएगी। विभिन्न खाद्य सामग्री में टीके और दवा के गुण डालने का प्रयास किए जा रहे हैं।
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एक जैसे गुण वाले कई पौधे हो सकेंगे तैयार
डॉ. नीलू सूद के अनुसार रिसर्च पर आधारित कई तकनीकों पर काम हो रहा है। हम यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि किस तरह के पौधे दवायुक्त फल के लिए सबसे प्रभावी होंगे। हम पौधे मे जींस प्रत्यारोपित करके ट्रांसजेनिक प्लांट तैयार करते हैं। जब पौधा तैयार हो जाता है तो टिशू कल्चर से सॉफ्ट टिशू का क्लीनिकल ट्रायल होता है। इसके बाद टेस्ट ट्यूब प्लांट विधि से एक जैसे गुण वाले लाखों पौधे तैयार किए जा सकेंगे।
यह करना है बाकी
रिसर्च में दवा की डोज कैसे निर्धारित होगी, उम्र का मापदंड क्या होगा, यह दवा बॉयो सेफ्टी के हिसाब से कितनी खरी होगी, इस पर काम करना बाकी है। इसमें जेनेटिक इंजीनियरिंग और मॉलीक्यूलर बायोलॉजी विभाग से सहयोग से काम होगा। इसके लिए तंबाकू, केला, पपीता, मक्की और आलू पर प्रयोग किया जा रहा है। सबसे अहम बात है कि ये सभी पौधे बिना बीज वाले हैं।
बोले अधिकारी
कैथेरंथस रोजियस और विंकस रोजियस जैसे प्रोजेक्ट पर रिसर्च करने के लिए डेढ़ साल पहले कॉलेज को ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेकिभनकल एजुकेशन की ओर से 20 लाख रुपये का बजट मिला है। इस प्रोजेक्ट के लिए तीन साल का समय है। प्रोजेक्ट पर काफी काम हो चुका है, बाकी का कार्य भी पूरा करने का प्रयास जारी है।
- डॉ. गजेंद्र सिंह, डीन, फार्मेसी कॉलेज एवं प्रोजेक्ट इंवेस्टिगेटर।