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एमडीयू में खेल : पद एक-बिना पीएचडी वाले लेक्चरर रखे दो, नियुक्ति फाइल भी गायब

Thu, 26 Feb 2026 12:10 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Thu, 26 Feb 2026 12:10 AM IST
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MDU scam: One post, two lecturers without PhDs, appointment files missing
रोहतक। महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय (एमडीयू) के प्रो. नसीब सिंह गिल की नियुक्ति को फैक्ट फाइंडिंग इनक्वायरी कमेटी ने अयोग्य करार दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 1989 में लेक्चरर का एक पद विज्ञापित किया गया था, भर्ती दो की कर ली गई। योग्यता से भी समझौता हुआ। अब नियुक्ति की फाइल भी गायब है। वहीं, प्रो. गिल ने कमेटी के गठन, रिपोर्ट और कार्रवाई को मनमाना करार दिया है।
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एमडीयू कुलपति रहे प्रो. राजबीर सिंंह ने 37 साल पहले हुई प्रो. गिल की नियुक्ति की जांच के लिए डॉ. पी बापैया की अध्यक्षता में 27 नवंबर 2025 को एक सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग इनक्वायरी कमेटी गठित की थी। इसमें राज्यपाल समेत कई दूसरी जगह से शिकायतें मिलने का जिक्र था। डॉ. बापैया ने 10 जनवरी 2026 को चार पेज की रिपोर्ट सौंपी थी।
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जांच रिपोर्ट के मुताबिक, एमडीयू की डिप्टी रजिस्ट्रार संगीता शर्मा की ओर से उपलब्ध कराए गए दस्तावेज बताते हैं कि यूनिवर्सिटी ने विज्ञापन संख्या 7/89 के तहत कंप्यूटर साइंस एंड एप्लीकेशंस विभाग में लेक्चरर के एक पद के लिए भर्ती निकाली थी। इसकी योग्यता एमफिल या पीएचडी थी। इससे किसी को कोई छूट नहीं मिली।
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बावजूद इसके एमफिल या पीएचडी के बिना ही दो लोगों-प्रो. नसीब सिंह गिल और राजिंदर सिंह की नियुक्ति कर ली गई। अतिरिक्त भर्ती के लिए सक्षम जगह से कोई मंजूरी भी नहीं ली गई। डॉ. बापैया ने रिपोर्ट में लिखा है कि कार्यकारी परिषद (ईसी) की मंजूरी के बिना नियमों में ढील देकर भर्ती नहीं हो सकती थी। शायद ईसी को तथ्य ठीक से बताए नहीं गए।
रिपोर्ट में हाईलाइट किया गया है कि प्रो. गिल ने बताया है कि उन्होंने विज्ञापन संख्या 7/89 के तहत आवेदन ही नहीं किया था। उनकी भर्ती इस विज्ञापन के शुद्धि पत्र के आधार पर हुई थी। प्रो. गिल ने यह भी कहा कि उस वक्त सारे आवेदक बगैर पीएचडी या एमफिल वाले थे। उच्च शिक्षा विभाग ने भी लेक्चरर के लिए अनिवार्य योग्यता पीएचडी नहीं रखी थी।
बकौल डॉ. बापैया, बारंबार मांगने के बावजूद यह शुद्धि पत्र प्रो. गिल पेश कर सके न ही डिप्टी रजिस्ट्रार। उनकी नियुक्ति की मूल फाइल, स्क्रीनिंग व शॉर्ट लिस्टिंग रिकॉर्ड भी गायब बताकर पेश नहीं किए जा सके। इससे स्पष्ट है कि प्रो. गिल भर्ती के वक्त निर्धारित योग्यता नहीं रखते थे।
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प्रो. गिल बोले- मेरी नियुक्ति सही है, पूर्व रजिस्ट्रार ने साजिशन गायब कराए दस्तावेज
प्रो. नसीब सिंह गिल ने फैक्ट फाइंडिंग इनक्वायरी कमेटी के गठन को गलत करार दिया है। कहा, निवर्तमान कुलपति प्रो. राजबीर सिंह उनसे ईर्ष्या रखते थे। उन्हें डीन नहीं बनाया। चहेते लोगों से 37 साल पहले हुई नियुक्ति नियुक्ति को लेकर झूठी शिकायतें कराईं और मनमाने तरीके से अपने दूसरे चहेते को जांच कमेटी का अध्यक्ष बना दिया। मनचाही रिपोर्ट पर निलंबन का मनमाना फैसला थोप दिया। प्रो. गिल के मुताबिक, 23 जनवरी 1990 को साक्षात्कार में चयन समिति ने पात्र मानते हुए ही उनका चयन किया था। नियुक्ति फाइल भी साजिशन गायब कराई गई है। इसके लिए रजिस्ट्रार का प्रभार देखते रहे प्रो. गुलशन लाल तनेजा पर आरोप लगाया है। इस बारे में उन्होंने राज्यपाल से लेकर को पत्र लिखकर निष्पक्ष जांच की मांग की है। कहा है, मेरे शानदार करियर को धूमिल करने के लिए ही यूनिवर्सिटी के कुछ शिक्षकों ने इसकी साजिश रची है।

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बड़ा सवाल...एक पर कार्रवाई, दूसरे पर क्यों नहीं

यूनिवर्सिटी की कार्यकारी परिषद ने 18 फरवरी को फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की जिस रिपोर्ट के आधार पर प्रो. गिल को निलंबित किया, वह भी सवालों से घिरी है। सवाल यह कि इन्हीं की तरह बगैर पीएचडी के भर्ती दूसरे लेक्चरर पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई। दूसरा सवाल यह कि अगर प्रो. गिल सही हैं और यूनिवर्सिटी से दो दर्जन नियुक्तियों की पत्रावलियां गायब हैं तो उस पर यूनिवर्सिटी ने कोई एफआईआर क्यों नहीं लिखाई। इन दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं की।
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