औषधीय पौधों में छिपा है मलेरिया का तोड़: रजिस्टेंस की बढ़ती समस्या में बन सकते हैं सहायक, पढ़ें ये रिपोर्ट
एमडीयू के औषधीय विज्ञान विभाग की मानें तो औषधीय पौधों में मलेरिया का तोड़ छिपा है। हम दो शताब्दी पूर्व मलेरिया का इलाज तलाश चुके हैं। यह इलाज सिनकोना के पौधे से प्राप्त होने वाले कुनैन से संभव है।
विस्तार
मलेरिया की जड़ को समाप्त करने की दिशा में शोध की बड़ी जरूरत है। इसके साथ ही मलेरिया के प्रति बढ़ती रोग प्रतिरोधक क्षमता चिंता का बड़ा विषय है। इस समस्या का समाधान औषधीय पौधों में छिपा है। वैज्ञानिकों ने इस ओर गहन शोध की आवश्यकता जताई है। यही नहीं, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय (एमडीयू) के सेवानिवृत्त प्रोफेसर एसके गक्खड़ मलेरिया समाप्ति को लेकर दो बड़े शोध कर चुके हैं।
मलेरिया ट्रांसमिशन ब्लॉकिंग तकनीक के लिए एंटीजन व एंटी बॉडी पहचाने
इसमें मलेरिया ट्रांसमिशन ब्लॉकिंग मानक के लिए एंटीजन व एंटीबॉडी पहचान व जेनेटिकली मोडिफाइड मॉस्किटो की जीन बदलने के मानक विकसित किए। इसके बाद आगे कदम नहीं बढ़ा है। मलेरिया दिवस से एक दिन पूर्व विशेषज्ञों से अमर उजाला ने बात की तो यह सच सामने आया।
जेनेटिकली मोडिफाइड मॉस्किटो की जीन बदलने के मानक किए विकसित
एमडीयू के औषधीय विज्ञान विभाग की मानें तो औषधीय पौधों में मलेरिया का तोड़ छिपा है। हम दो शताब्दी पूर्व मलेरिया का इलाज तलाश चुके हैं। यह इलाज सिनकोना के पौधे से प्राप्त होने वाले कुनैन से संभव है। वर्ष 1970 में आर्टिमिसिया से आर्टेमिसिनिन नई दवा खोज की गई है। इसके अलावा क्रिप्टोलेपिस, तबेबुइया जेनेरा, गिलोय और अन्य औषधीय गुणों वाले पौधों से मलेरिया की दवा प्राप्त की जा सकती है। उपचार के लिए इन पौधे के मॉलिक्यूल का मलेरिया के परजीवी (पैरासाइट) पर प्रभाव जानना होगा। ये भविष्य के बेहतर विकल्प हैं। एमडीयू के औषध विज्ञान विभाग के प्रो. मुनीष गर्ग ने कहा कि मलेरिया की नई दवा की तलाश जरूरी है।
मलेरिया से बचाव की वैक्सीन संभव
एमडीयू के बायोटेक्नोलॉजी विभाग से सेवानिवृत्त प्रो. एसके गक्खड़ ने बताया कि मलेरिया शारीरिक रूप से ही नहीं, समाज व देश को आर्थिक रूप से भी प्रभावित करता है। इसीलिए मलेरिया जागरूकता के तहत मलेरिया दिवस मनाया जा रहा है। इस बार का थीम शून्य मलेरिया देने का समय : निवेश करें, नवाचार करें, लागू करें। यह दुनिया के हर हिस्से को बेहतर बनाने का प्रयास है। मलेरिया प्लाजमोडियम परजीवी से होता है। प्लाजमोडियम फाल्सीपैरम खतरनाक होता है। इसे दिमागी बुखार भी कह देते हैं।
मादा एनाफिलीज मच्छर ही मलेरिया का कारक बनती
प्लामोडियम वाइवैक्स सामान्य है। इसका बचाव और उपचार संभव है। वर्ष 2021 में दुनिया में 247 मिलियन लोग मलेरिया से प्रभावित हुए। यह सीधे तौर पर लोगों को आर्थिक रूप से भी प्रभावित करता है। मादा एनाफिलीज मच्छर ही मलेरिया का कारक बनती है। यह अपने 30 दिन के जीवन में दो से चार बार साफ पानी पर अंड़े देती है।
कुनैन की दवा उपलब्ध
मादा एनाफिलीज बीमार को काटते यानी खून चूसते समय प्लाजमोडियम अंदर ले जाती है। किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटने पर यह प्लाजमोडियम उसमे छोड़ देती है। इससे वह संक्रमित हो जाता है। मलेरिया से बचाव के लिए हमारे यहां कुनैन की दवा उपलब्ध है। इसके अलावा और वैक्सीन बनाना भी संभव है। मलेरिया वैक्सीन व जीन बदलने के मानक दिए हैं। अब इससे आगे शोध की जरूरत है।
शोध में पहचाने ये दो अहम मानक
मलेरिया से निपटने के लिए दो तरह की वैक्सीन पर दुनिया में काम चल रहा है। इनमें से एक मानव शरीर में मलेरिया का परजीवी विकसित ही न हो और दूसरा तरीका वैक्सीन लगवाने वाले को मच्छर काटने के बाद किसी अन्य को मलेरिया नहीं होगा। इसके अलावा तीसरा तरीका शोधार्थी खोजने में जुटे हैं। इसे जीएमएम यानी जेनेटिकली मोडिफाइड मॉस्किटो कहा गया है। इसमें मच्छर के जीन को बदल दिया जाता है। ऐसे मच्छर की प्रजाति या नई पीढ़ी मलेरिया फैलाने लायक ही नहीं रहेगी।