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Rohtak News: किसानों के लिए मुसीबत बन रही साझे की खेवट
Sun, 02 Apr 2023 11:19 PM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रोहतक
संवाद न्यूज एजेंसी, रोहतक
Updated Sun, 02 Apr 2023 11:19 PM IST
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महम। किसानों के खेतों की साझे की खेवट के चलते उनको काफी परेशानियों का सामना करना करना पड़ा रहा है। काफी किसान तो इसको लेकर जागरूक ही नहीं है। इसके कारण खेवट में साझीदार बढ़ते चले जा रहे हैं।
साझे की खेवट होने से भू मालिकों के सामने अनेक प्रकार की मुसीबत आड़े आ रही हैं। सबसे ज्यादा परेशानी उस समय आती है जब किसान मेरी फसल मेरा ब्योरा पोर्टल पर अपनी फसल का पंजीकरण कराने जाता है। उस सूरत में अगर उसी किला नंबर से अन्य साझीदार ने पहले पंजीकरण करा लिया है तो दूसरे साझीदार अब पंजीकरण से वंचित रह जाते हैं। इसके अलावा अगर कोई किसान अपने खेत में मकान बनाने से लेकर अन्य कोई कारोबार करना चाहता है या सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण किए जाने के बाद जमीन किसी एक की चली जाती है जबकि रकम सभी हिस्सेदारों को मिलती है। किसी को नाली या रास्ते को लेकर भी परेशानी है तो ऐसे में साझे की खेवट मुसीबत बनकर रह जाती हैं।
जानें...क्या है साझे की खेवट
महम के नायब तहसीलदार दीपक धांगड़ ने बताया कि साझे की खेवट में सभी भू मालिक संयुक्त रूप से भागीदार होते हैं। उस खेवट में सभी भू मालिकों का अपने अपने अनुपात में हिस्सेदारी होती है। खेवट के किसी भी हिस्सेदार को नंबर विशेष किले का मालिक नहीं माना जा सकता। ऐसे में आगे जाकर झगड़े बढ़ जाते हैं। इसलिए भू मालिकों को सर्वसम्मति से अपनी खेवट अलग कराने में रुचि दिखानी चाहिए। अलग खेवट के काफी फायदे होते हैं।
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सरकार के आदेश भी नहीं आए काम
आज से तीन साल पहले सरकार द्वारा प्रशासन को पंजाब भू राजस्व अधिनियम 2020 (हरियाणा संशोधन) की धारा 111 (क) (1) के अनुसार सहमति से खेवट विभाजन के लिए नागरिकों को नोटिस जारी करने के आदेश जारी कर रखे हैं। आम नागरिकों के पास अभी भी यह अच्छा मौका है कि वे अपनी जमीन की खेवट को अलग करवा लें, ताकि भविष्य में किसी प्रकार का विवाद न रहे। इसमें आपसी सहमति से अपनी भूमि के बंटवारे के लिए भू मालिकों को मौका दिया गया है। सरकार द्वारा राजस्व विभाग को विशेष अभियान चलाकर संयुक्त जमीन के मालिकों को नोटिस भेजने को आदेश दिया गया है। उसके बाद इस अधिनियम के तहत आपसी सहमति से भूमि का विभाजन करके अलग-अलग खेवट बनाने का निर्देश जारी किया गया है। लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद भी इस योजना पर कार्य नहीं हो सका है।
भू मालिक नहीं दिखा रहे रुचि
तहसीलदार मदनलाल के मुताबिक सरकार के दिशा निर्देश के बावजूद भी इस पर अभी तक कुछ भी कार्य नहीं हो सका है। उनका मानना है कि इसमें संयुक्त खेवट धारक रुचि नहीं दिखा रहे हैं । ज्यादातर केस असहमति के आते हैं उनका निपटारा कोर्ट केस चलाकर किया जाता है । जो एक लंबी प्रक्रिया है। उसमें केस डालना पड़ता है । उसमें दूसरा पक्ष कोर्ट के सामने पेश नहीं होता है । वकीलों के बीच मामला फंसने से प्रक्रिया लंबी हो जाती है। इसलिए लोगों से अपील की जाती है कि सभी खेवट के हिस्सेदार सर्वसम्मति से आकर अपनी अपनी खेवट अलग करांए। अगर भू मालिक इसमें रुचि नहीं दिखाएंगे तो प्रशासन अपनी शक्तियों का प्रयोग कर खुद खेवट अलग कर सकता है उसके बाद उनकी सुविधानुसार अगर कुछ हल नहीं होता है या उसके बाद कुछ परेशानी होती है तो इसके लिए वे स्वयं जिम्मेदार होंगे।
पांच साल से चक्कर काट रहे किसान
मोखरा के किसान जगबीर मलिक ने बताया कि उनकी खेवट के साझेदारों में आपसी सहमति नहीं बन सकी तो उन्होंने तहसीलदार की कोर्ट में खेवट अलग करने के लिए याचिका दायर की थी। लेकिन पांच साल से सिर्फ तारीख पे तारीख दी जा रही हैं। बार बार तहसीलदार की कोर्ट में आकर परेशान हो चुका है। अभी तक प्रक्रिया पूरी नहीं की गई है।
स्थायी तहसीलदार न होने के कारण भी लंबी हो रही प्रक्रिया
एडवोकेट रोहतास राठी का कहना है कि तहसील कार्यालय में लंबे समय से स्टाफ की कमी चली आ रही है। तहसील के 32 पटवार सर्कलों में 12 सर्कलों पर पटवारी न होना भी कार्यों में देरी का कारण बनता जा रहा है। तहसीलदार के पद पर भी पिछले कई सालों से अस्थायी रूप से कलानौर के तहसीलदार को अतिरिक्त कार्यभार दिया गया है वह सप्ताह में दो दिन ही कार्य कर पाते हैं। जिसके कारण यहां के लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
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साझे की खेवट होने से भू मालिकों के सामने अनेक प्रकार की मुसीबत आड़े आ रही हैं। सबसे ज्यादा परेशानी उस समय आती है जब किसान मेरी फसल मेरा ब्योरा पोर्टल पर अपनी फसल का पंजीकरण कराने जाता है। उस सूरत में अगर उसी किला नंबर से अन्य साझीदार ने पहले पंजीकरण करा लिया है तो दूसरे साझीदार अब पंजीकरण से वंचित रह जाते हैं। इसके अलावा अगर कोई किसान अपने खेत में मकान बनाने से लेकर अन्य कोई कारोबार करना चाहता है या सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण किए जाने के बाद जमीन किसी एक की चली जाती है जबकि रकम सभी हिस्सेदारों को मिलती है। किसी को नाली या रास्ते को लेकर भी परेशानी है तो ऐसे में साझे की खेवट मुसीबत बनकर रह जाती हैं।
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जानें...क्या है साझे की खेवट
महम के नायब तहसीलदार दीपक धांगड़ ने बताया कि साझे की खेवट में सभी भू मालिक संयुक्त रूप से भागीदार होते हैं। उस खेवट में सभी भू मालिकों का अपने अपने अनुपात में हिस्सेदारी होती है। खेवट के किसी भी हिस्सेदार को नंबर विशेष किले का मालिक नहीं माना जा सकता। ऐसे में आगे जाकर झगड़े बढ़ जाते हैं। इसलिए भू मालिकों को सर्वसम्मति से अपनी खेवट अलग कराने में रुचि दिखानी चाहिए। अलग खेवट के काफी फायदे होते हैं।
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सरकार के आदेश भी नहीं आए काम
आज से तीन साल पहले सरकार द्वारा प्रशासन को पंजाब भू राजस्व अधिनियम 2020 (हरियाणा संशोधन) की धारा 111 (क) (1) के अनुसार सहमति से खेवट विभाजन के लिए नागरिकों को नोटिस जारी करने के आदेश जारी कर रखे हैं। आम नागरिकों के पास अभी भी यह अच्छा मौका है कि वे अपनी जमीन की खेवट को अलग करवा लें, ताकि भविष्य में किसी प्रकार का विवाद न रहे। इसमें आपसी सहमति से अपनी भूमि के बंटवारे के लिए भू मालिकों को मौका दिया गया है। सरकार द्वारा राजस्व विभाग को विशेष अभियान चलाकर संयुक्त जमीन के मालिकों को नोटिस भेजने को आदेश दिया गया है। उसके बाद इस अधिनियम के तहत आपसी सहमति से भूमि का विभाजन करके अलग-अलग खेवट बनाने का निर्देश जारी किया गया है। लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद भी इस योजना पर कार्य नहीं हो सका है।
भू मालिक नहीं दिखा रहे रुचि
तहसीलदार मदनलाल के मुताबिक सरकार के दिशा निर्देश के बावजूद भी इस पर अभी तक कुछ भी कार्य नहीं हो सका है। उनका मानना है कि इसमें संयुक्त खेवट धारक रुचि नहीं दिखा रहे हैं । ज्यादातर केस असहमति के आते हैं उनका निपटारा कोर्ट केस चलाकर किया जाता है । जो एक लंबी प्रक्रिया है। उसमें केस डालना पड़ता है । उसमें दूसरा पक्ष कोर्ट के सामने पेश नहीं होता है । वकीलों के बीच मामला फंसने से प्रक्रिया लंबी हो जाती है। इसलिए लोगों से अपील की जाती है कि सभी खेवट के हिस्सेदार सर्वसम्मति से आकर अपनी अपनी खेवट अलग करांए। अगर भू मालिक इसमें रुचि नहीं दिखाएंगे तो प्रशासन अपनी शक्तियों का प्रयोग कर खुद खेवट अलग कर सकता है उसके बाद उनकी सुविधानुसार अगर कुछ हल नहीं होता है या उसके बाद कुछ परेशानी होती है तो इसके लिए वे स्वयं जिम्मेदार होंगे।
पांच साल से चक्कर काट रहे किसान
मोखरा के किसान जगबीर मलिक ने बताया कि उनकी खेवट के साझेदारों में आपसी सहमति नहीं बन सकी तो उन्होंने तहसीलदार की कोर्ट में खेवट अलग करने के लिए याचिका दायर की थी। लेकिन पांच साल से सिर्फ तारीख पे तारीख दी जा रही हैं। बार बार तहसीलदार की कोर्ट में आकर परेशान हो चुका है। अभी तक प्रक्रिया पूरी नहीं की गई है।
स्थायी तहसीलदार न होने के कारण भी लंबी हो रही प्रक्रिया
एडवोकेट रोहतास राठी का कहना है कि तहसील कार्यालय में लंबे समय से स्टाफ की कमी चली आ रही है। तहसील के 32 पटवार सर्कलों में 12 सर्कलों पर पटवारी न होना भी कार्यों में देरी का कारण बनता जा रहा है। तहसीलदार के पद पर भी पिछले कई सालों से अस्थायी रूप से कलानौर के तहसीलदार को अतिरिक्त कार्यभार दिया गया है वह सप्ताह में दो दिन ही कार्य कर पाते हैं। जिसके कारण यहां के लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।