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बोहर अठगामा करेगा औघड़ पीर मठ का संचालन, महंत जयनाथ फिर गद्दीनशीन

Thu, 22 Jul 2021 01:18 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Thu, 22 Jul 2021 01:18 AM IST
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Bohar Athgamma will run the Oghad Pir Math, Mahant Jaynath then reigns
अस्थल बोहर स्थित औघड़ पीर डेरे के महंत। अमर उजाला
अस्थल बोहर स्थित बाबा औघड़ पीर मठ विवाद का निपटारा हो गया है। एसडीएम कोर्ट के फैसले के छह दिन बाद बुधवार को अठगामा बोहर ने महंत जयनाथ को फिर गद्दीनशीन कर दिया। हालांकि मिशन एकता समिति की अध्यक्ष कांता अलाड़िया का कहना है कि वे एसडीएम कोर्ट के फैसले को अदालत में चुनौती देंगी। साथ ही जनता के बीच भी लड़ाई लड़ेंगी।
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औघड़ पीर मठ के महंत शीशराम नाथ के 2016 में चोला छोड़ने के बाद महंत रमेशनाथ को गद्दी पर बैठाया गया था। 27 मार्च को अठगामा बोहर ने महंत रमेशनाथ की जगह महंत जयनाथ को गद्दीनशीन कर दिया। इसका रमेशनाथ ने विरोध किया। दोनों पक्षों की तरफ से आईएमटी थाने में शिकायत दी गई। मामला एसडीएम के पास पहुंचा। एसडीएम ने पुलिस जांच अधिकारी की सिफारिश पर दोनों पक्षों के बीच तनाव के चलते सीआरपीसी की धारा 145 के तहत मठ को नियंत्रण में ले लिया था। साथ ही तहसीलदार रोहतक को मठ का रिसीवर नियुक्त किया था। एमडीएम कोर्ट में तभी से मामला चल रहा था। अब 15 जुलाई को अदालत ने तहसीलदार की रिपोर्ट को आधार बनाकर आदेश दिए कि मठ का प्रबंधन अठगामा बोहर व अनुयायियों के हाथ में है। यह मामला मठ पर कब्जे का न होकर महंत हटाने व लगाने से जुड़ा है। ऐसे में तहसीलदार मठ को संबंधित संस्था को विधिवत तौर पर सौंप दें। बुधवार को प्रशासन ने अठगामा बोहर को नियंत्रण दे दिया। अठगामा बोहर व ग्रामीणों ने महंत जयनाथ को गद्दीनशीन किया।
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एसडीएम कोर्ट ने कहा, विवाद मठ पर कब्जे का नहीं, बल्कि महंत लगाने व हटाने का
एसडीएम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि अदालत में तहसीलदार की तरफ से जो रिपोर्ट दाखिल की गई है, उसमें लिखा हुआ है कि महंत शीशराम के चोला छोड़ने के बाद अठगामा के गणमान्य लोगों व संत समाज के महात्माओं ने 6 जुलाई 2016 को महंत रमेेश नाथ को अस्थायी तौर पर महंत घोषित किया था और श्री सिद्द बाबा सूरतनाथ जी औघड़ पीर की गद्दी पर गद्दीनशीन किया था। महंत किसी धार्मिक संस्था का मुखिया होता है, जो बतौर ट्रस्टी कार्य करता है। संस्था की संपत्ति के प्रबंधन की भी प्रत्यक्ष जिम्मेदारी होती है। महंत का पद स्थायी नहीं है। महंत अगर संस्था की देखरेख व प्रबंधन में असफल रहता है तो संस्था नियमानुसार व रीति अनुसार उसे पद से हटा सकती है। उक्त मामले में अठगामा व अनुयायियों द्वारा महंत को हटाकर किसी अन्य महंत को गद्दीनशीन करना व्यक्तिगत मामला है। अगर किसी व्यक्ति को संस्था, अनुयायियों के निर्णय पर आपति है तो अदालत में जा सकता है। संस्था के निर्णय पर प्रश्नचिह्न लगाना इस न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर है। यह मामला संस्था पर कब्जे का न होकर महंत को हटाने व लगाने का है।
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एसडीएम कोर्ट के फैसले केे अदालत में दूंगी चुनौती, जनता के बीच भी लड़ूंगी लड़ाई
मिशन एकता समिति प्रदेश अध्यक्ष कांता आलड़िया का कहना है कि वे एसडीएम कोर्ट के निर्णय को अदालत में चुनौती देंगी। साथ ही जनता के बीच जाकर भी लड़ाई लड़ेंगी। क्योंकि उनके साथ अन्याय हुआ है। उनको यह तक नहीं बताया गया कि तहसीलदार को कब रिसीवर नियुक्त किया गया। तथ्यों की अनदेखी की गई है। प्रशासन ने सीआरपीसी की धारा 145 के तहत मठ को नियंत्रण में ले रखा था। 15 जुलाई को निर्णय सुनाया गया, लेकिन उनको अब कॉपी दी गई है। गद्दी के असली हकदार महंत रमेशनाथ है, जिनका एसडीएम द्वारा धारा 145 की कारवाई में जिक्र भी किया गया है। बुधवार की कार्रवाई के बारे में औघड़ पीर डेरे अनुयायियों को न तो कोई नोटिस दिया गया और न ही इस बारे में कुछ बताया गया। जल्द समाज के संगठनों की बैठक बुलाई गई है।

एसडीएम कोर्ट ने बोहर अठगामा के हक में निर्णय लिया है। बोहर अठगामा ने मार्च माह में महंत रमेश नाथ की जगह जयनाथ को गद्दीनशीन किया था। बाद में प्रशासन ने सीआरपीसी की धारा 145 लगा दी। अब कोर्ट के आदेश पर मठ के रिसीवर तहसीलदार ने विधिवत तौर पर मठ का संचालन बोहर अठगामा को दिया है। महंत जयनाथ फिर से गद्दीनशीन हो गए हैं, जो महंत शीशराम ट्रस्ट के अध्यक्ष भी हैं।
- कृष्ण नांदल, उपाध्यक्ष महंत शीशराम ट्रस्ट
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